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देशभर में दशहरे के कई रूप

Posted On October - 6 - 2019

योगेश कुमार गोयल
दशहरा यानी विजयादशमी मनाया तो देशभर में जाता है, लेकिन इसे मनाए जाने के तौर-तरीकों में काफी भिन्नता है। कुल्लू का दशहरा देशभर में ही नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान बना चुका है। इसे देखने के लिए देश-विदेश से हजारों लोग कुल्लू पहुंचते हैं। कुल्लू के दशहरे में न तो रामलीलाएं होती हैं और न ही रावण का पुतला जलाया जाता है। बल्कि इस अवसर पर कुल्लू के विशाल मैदान में रघुनाथ जी का दरबार लगता है। कुल्लू घाटी के लोग अपने-अपने देवी-देवताओं के रथ सजाकर रघुनाथ जी के दरबार में पहुंचते हैं। दशहरे के दिन रघुनाथ जी की रथयात्रा निकाली जाती है। मान्यता है कि कुल्लू के देवी-देवता रावण के अत्याचारों से बहुत त्रस्त थे। रघुनाथ जी ने रावण का वध करके इन देवी-देवताओं पर बहुत बड़ा उपकार किया था, इसलिए उनके प्रति आभार प्रकट करने के लिए इस दिन यहां के सभी देवी-देवता रघुनाथ जी के दरबार में उपस्थित होते हैं। विशेष बात यह है कि जिस दिन देशभर में दशहरा मनाए जाने के साथ ही इस उत्सव का समापन होता है, उसी दिन कुल्लू के दशहरे की शुरुआत होती है और यह आयोजन 7 दिन चलता है। मान्यता है कि इसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी में राजा जगत सिंह ने की थी।

लाठियाें से पीटते हैं रावण को
राजस्थान में दशहरे को ‘वीरों का पर्व’ भी कहा जाता है। इस अवसर पर यहां शस्त्र पूजा भी होती है और शमी के वृक्षों का भी पूजन किया जाता है। माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने भी शमी के वृक्ष की पूजा की थी और पूजा से प्रसन्न होकर वृक्ष ने उन्हें रावण जैसे महाबलशाली राक्षसों पर विजयी होने का वरदान दिया था। राजस्थान के हाड़ोती में मनाए जाने वाले दशहरे का स्वरूप तो बिल्कुल भिन्न है। यहां मिट्टी के रावण को लाठियों से पीटा जाता है। शाम के समय लोग इकट्ठे होते हैं और मिट्टी से बने रावण के पुतले पर पहले तो पूरी ताकत के साथ एक-एक पत्थर फेंककर मारते हैं, उसके बाद श्रीराम की पूजा की जाती है और फिर लाठियों से रावण के पुतले को पीटा जाता है। इस बारे में लोगों की यही धारणा है कि ऐसा करने से बीमारियां नहीं होतीं। ऐसी मान्यता है कि 13वीं सदी से दशहरे का आयोजन यहां इसी तरह हो रहा है।

रावण दहन के बाद देते हैं सोना पत्ती
महाराष्ट्र में इस दिन शस्त्रों की पूजा होती है। रावण दहन के बाद लोग मित्रों व रिश्तेदारों को सोना पत्ती (शमी नामक वृक्ष की पत्तियां) देकर उनसे गले मिलते हैं। इस संबंध में कहा जाता है कि रावण के वध के बाद जब विभीषण को लंका का राजा बनाया गया था तो उन्होंने वहां का सारा सोना लोगों में बांट दिया था। यह भी कहा जाता है कि पांडवों ने अपने हथियार अज्ञातवास के दौरान शमी वृक्ष के नीचे ही छिपाए थे। वहीं, मुंबई में तो इस तरह के सभी त्योहारों पर अलग ही धूम होती है। वहां बिना गरबा और डिस्को-डांडिया के तो कोई भी पर्व संपन्न ही नहीं होता। कई जगह रामलीलाओं का भव्य मंचन होता है तो कई पंडालों में दुर्गा पूजा होती है। दशहरे के दिन दुर्गा प्रतिमाओं का समुद्र अथवा नदी में विसर्जन किया जाता है।

दक्षिण में गुड़िया और नृत्य
दक्षिण भारत में रामायण अलग-अलग नाम से प्रचलित है। तमिलनाडु में रामकथा को ‘कम्ब रामायण’ के नाम से जाना जाता है, आंध्र प्रदेश में रंगनाथ रामायण और कर्नाटक में पम्पा रामायण। इन राज्यों में लकड़ी और चिकनी मिट्टी से बनी गुडि़यों को महिलाएं घर के खास स्थान पर सजाती हैं। गुडि़यों के बीच एक कलश रखा जाता है, जो शक्ति व उर्वरता का प्रतीक माना जाता है।
नौ दिनों तक इसकी पूजा होती है और दसवें दिन दशहरे की पूजा के बाद गुडि़यों को कपड़े में लपेटकर रख दिया जाता है और अगले वर्ष इन्हें फिर से उपयोग किया जाता है। दशहरे पर इन गुडि़यों की प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। तमिलनाडु में रामकथा को पुतलियों के नृत्य के जरिये प्रस्तुत किया जाता है, जिसे ‘बोम्बलाट्टम नृत्य’ कहते हैं। केरल में रामकथा का प्रस्तुतीकरण कथकली नृत्य के माध्यम से होता है।


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