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ढलती उम्र में अपनों का संत्रास

Posted On October - 7 - 2019

हम अपने सांस्कृतिक विकास और सभ्याचारक प्रगति के संक्रांत काल में जी रहे हैं। समाज के स्थापित मूल्य टूट रहे हैं, नये मूल्य उनका स्थान नहीं ले रहे। पश्चिम में आपदाकाल में आमजन के लिए सरकारी स्तर पर सामाजिक सुरक्षा देने का प्रावधान रहा है। भारत उन देशों में एक रहा, जिनका सामाजिक ढांचा ही उनके आम आदमी को सामाजिक सुरक्षा देता रहा। संयुक्त परिवार प्रणाली बहुत दिन तक परिवार के मुखिया को एक गरिमापूर्ण स्थान देकर, परिवार के किसी अंग के साथ कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घट जाने के बाद, किसी औरत के विधवा हो जाने या बच्चों के मां-बाप गुजर जाने के बाद उन्हें आर्थिक व सामाजिक संरक्षण देती रही।
बदलते वक्त के तकाजों में संयुक्त परिवार प्रथा टूट गयी है और एकल परिवार प्रथा उभरी है। अब ऐसे एकल परिवारों में कभी पति का साया हट जाये, पत्नी कामकाजी न हो, तो परिवार बिल्कुल संरक्षणहीन हो आर्थिक सहयोग अथवा आश्रय के लिए सामाजिक सुरक्षा अधिनियमों का ही सहारा तलाश करता है। सरकार विधवाओं और अनाथ बच्चों के लिए आर्थिक अनुदान की घोषणाएं करती है, लेकिन वे लालफीताशाही के मकड़जाल में उलझी रहती है।

सुरेश सेठ

चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार का दावा तो केंद्र सरकार ने आयुष्मान योजना को लागू करके किया है। देश के लगभग पचास करोड़ लोगों को पांच लाख रुपये तक का चिकित्सा बीमा घोषित करके सरकार अपनी पीठ थपथपाती है। पिछली जनगणना के मुताबिक इस समय देश में ग्यारह करोड़ बूढ़े हैं। देश की औसत आयु बढ़ रही है। पहले सामान्य भारतीय वृद्ध की औसतन उम्र सत्तर बरस थी। व्यक्ति की आयु जब सत्तर पार होती तो वह प्राय: कहता कि मैं तो अब अपने जीवन के बोनस वर्ष जी रहा हूं।
संयुक्त परिवार बीते वक्त की बात हो गये। परिवार का मुखिया होने का अस्तित्व उनसे छिन गया। टूटते-बिखरते परिवारों में एकल परिवारों की जो संज्ञा उभरी है, उनमें उनकी गरिमा बने रहने की तो क्या, दुत्कार की नौबत आ गयी है। अपने मन की बात वे किससे कहें? उनके नैतिक मूल्य, आस्था, विश्वास और प्राथमिकताएं, महानगरीय बोध के किसी सांचे में फिट नहीं बैठतीं। पारिवारिक शुचिता की जगह संबंधों के पराभव का बोलबाला हो गया है। रिश्तों की स्निग्धता के बीच भौतिकवाद के वर्चस्व का बेलौस ठण्डापन आ ठहर गया है। परिवार की नयी पीढ़ी से उनका कोई संवाद नहीं रह गया। बच्चों के लिए उन्हें अपने साथ रखना बोझ बन गया।
बी.आर. चोपड़ा की फिल्म ‘बागबान’ जैसी स्थितियां इस वृद्ध पीढ़ी के साथ रोज घटती हैं। बच्चे हैं, अपने-अपने परिवारों के साथ अलग-अलग जीते हुए। चूल्हे चौके की परम्परा ‘जोमैटो’ और ‘स्विगी’ की खाना पहुंचाने की सुविधा ने ले ली। रसोई घर की धारणा जंक फूड ने ले ली और अब गृहिणियों के रूप में अन्नपूर्णा का वेष कहां तलाश करोगे? शरत की नायिकायें जो दूसरों को खिलाकर ही अपना पेट भरा मान लेती थीं, आज बीते युग का सच हो गयीं। आज के स्पूतनिक नहीं तो वाल्वो युग की गति से दौड़ते हुए भारत में चूल्हे-चौके का झंझट कौन करे? कंप्यूटर और इंटरनेट युग में व्यावसायिक युग के वैश्विक हो जाने के बाद समय का बोध भी खत्म हो गया है। काम के घंटे दिन से रात तक खिंच गये हैं। ऐसे में घर में बैठे बूढ़े मां-बाप खाने की मेज पर बैठे अपनी कामकाजी सन्तान, पुत्र, बहू, पोते-पोती का इंतजार कब तक करें?
दिनचर्या बदल गयी और बदल गये इस कंप्यूटर युग के सुबह और शाम। देश के ग्यारह करोड़ वृद्ध अपनी उम्र में ही नहीं, एकाकीपन में भी वृद्धि पाते हैं। अपने में व्यस्त, अपनी प्राथमिकताओं का अभ्यस्त परिवार अपने बुजुर्गों को सहने के लिए तैयार नहीं। बेटों, बेटियों में बारियां बंध गयी हैं कि वर्ष में कितने महीने अपने बुजुर्गों को पास रखने का उनका समां होगा।
भारत सरकार ने वृद्धों के संरक्षण के लिए अनेक कानून बना दिये हैं। इसके बावजूद वृद्ध देश में सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं और उनकी अवहेलना लगातार बढ़ रही है। अपनी संतति के साथ रहते हुए गाली-गलौज और मारपीट तक की नौबत आ जाती है। कुल वृद्धों के मात्र पांच प्रतिशत को नियमित पेंशन का सहारा है। उम्रभर की बचत पर अगर बंधी हुई ब्याज आय पर वे जीते हैं। मगर सरकार की बदलती मौद्रिक नीति में जमा दरों पर ब्याज दर के निरन्तर घटते जाने के साथ-साथ उनकी आय भी घटती चली जाती है। जिस अनुपात में उनकी आय घटती है, उसी अनुपात में उनकी परवाह भी घटती जाती है। मध्यम वर्ग के उन बूढ़ों का हाल तो और भी दयनीय हो जाता है, जिन्होंने उम्रभर की कमाई से अपने लिए एक मकान या थोड़ी-सी सम्पत्ति बना ली थी। साथ ही मोहवश अपनी सन्तति के नाम वह संपत्ति कर दी। अब वही उन्हें इस घर से बाहर निकालने पर आमादा हो गये।
सरकारी कानूनों का क्या करें? वे तो वृद्धों की घरेलू प्रताड़ना के विरुद्ध फतवा जारी करते हैं। अवहेलना करने वाली सन्तान को उनके लिए बंधी रकम का महीना बांधने की बात करते हैं। मोहवश अपनी संपदा सन्तान के नाम कर दी तो उसे वापस दिलाने की सुरक्षा देते हैं, या अभी बने कानूनों में संपदा जीवनभर बूढ़ों के पास रहे, मरने पर ऋण राशि काटकर उत्तराधिकारियों को मिले। कानून बन गये, लेकिन दुर्व्यवहार होने पर भी इनका आसरा लेने का साहस भारतीय बुजुर्ग नहीं करते। अपने परिवार या खानदान की पगड़ी उछल जाने का भय उन पर इस कदर हावी रहता है कि वे अपने ही बच्चों के विरुद्ध कोर्ट-कचहरी और थाना जाने का साहस नहीं कर पाते। बरसों इसी अन्याय, अलगाव और उपेक्षा के नर्क को झेलते रहते हैं।
स्नेह और सम्मान की नदियां सूख गयीं और अपनेपन का एहसास किसी अजनबियत की मरु भूमि में खो गया। देश में युवा पीढ़ी के लिए काम नहीं, इसलिए वरिष्ठ नागरिकों की सेवानिवृत्त पीढ़ी की नब्बे प्रतिशत संतानें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। देश उनकी समझ और अनुभव का कोई लाभ नहीं उठा पाता। कालांतर में बुजुर्गों को बुढ़ापा पहाड़ जैसा कठिन बोझ लगने लगता है। बीमारियां, अपंगता और अस्वस्थता तो परेशान किये ही रहती हैं, उनके विचारों और समझ को भी समयानुकूल न जानकर दुत्कार मिलती है। देश के वृद्ध वर्ग और युवा पीढ़ी के बीच संवाद की समस्या पैदा हो गयी है।
नि:संदेह जरूरी है कि हर जिले, हर तहसील में  इनके लिए वृद्धाश्रमों का गठन किया जाए, जहां वे अपने लोगों के साथ संवाद करते हुए आखिरी दम तक उपयोगी जीवन जीते। वे एकाकी संताप न जीते, एकालाप के प्रलाप में न बहते। लेकिन यहां भी संक्रान्त मूल्य बीच में आ ठिठक गये। अभी भी लोग देश में वृद्धाश्रमों का दर्जा मजबूरी गृहों से अधिक नहीं मानते और इनमें भद्रजन अपने बुजुर्गों को भेजना अपनी गरिमा से नीचे समझते हैं। देश के वृद्ध समाज को जीने का उतना ही अधिकार है, जितना कि डिस्को से रैप संगीत तक भटकती युवा पीढ़ी को। यह अधिकार उन्हें कब मिलेगा?

लेखक साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।


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