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जलता रावण हंसता रावण

Posted On October - 6 - 2019

सुधीश पचौरी
यहां रावण-वहां रावण-जिधर देखो उधर रावण-एक से एक ऊंचे लंबे-चौड़े दस-दस सिर वाले, मूंछों वाले दशानन! दशकंधर!
एक से एक चमकीले रंगबिरंगे कागजों, फट्टियों और पटाखों से बने रावण! दस रावण, बीस रावण, सौ रावण, हजार रावण, लाख रावण—न जाने कितने रावण दशहरे पर जलते हैं।
पूरे देश में दशहरे पर कुल कितने रावण जलाए जाते हैं, इसका कोई पक्का आंकड़ा नहीं मिलता।
एक मोटे अनुमान के अनुसार रामलीला किसी न किसी रूप में भारत भर में मनाई जाती है। दशहरा भी किसी न किसी रूप में पूरे भारत में मनाया जाता है और उत्तर पश्चिम एवं मध्य भारत के हर गांव, कस्बे, नगर, महानगर के हर गली मोहल्ले में लोग अपनी-अपनी ‘रामलीला’ करते हैं। उसके लिए वे नाना किस्म की ‘रामलीला कमेटियां’ बनाते हैं और दशहरे के दिन किसी मैदान में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाते हैं।
रामलीला की लीला निराली
हर कमेटी के पास एक बड़ा फंड होता है और हर कमेटी इस होड़ में रहती है कि पड़ोस की कमेटी की रामलीला से उसकी रामलीला बड़ी हो और रावण का पुतला भी बड़े से बड़ा हो-अगर पड़ोस का रावण दस फुट ऊंचा है तो हमारा बीस फुट का हो, अगर उनका पचास फुट ऊंचा है तो उनका अस्सी फुट का हो। देश में रावण के छोटे-बड़े लाखों पुतले बनाए, बेचे और खरीदे जाते हैं और दशहरे के दिन जला दिए जाते हैं। रामलीला भारत की सबसे बड़ी ‘पॉपुलर कल्चर’ है। उसका नाम ही ‘रामलीला’ है। ‘लीला’ का मतलब है नाटक, मेला, खानपान, शो यानी मनोरंजन भी!
इन दिनों की रामलीलाएं ‘लीला’ की अपेक्षा ‘शो’ अधिक होती हैं। नाना चैनल और सोशल मीडिया पर इनका लाइव प्रसारण या इनकी ‘स्ट्रीमिंग’ होती है- इनमें आपस में भी बड़ा कंपीटीशन रहता है।
एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में कोई पचास लाख रामलीलाएं तो होती ही होंगी। इस अर्थ में रामलीलाएं खासी बड़ी ‘उपभोक्ता इकोनॉमी’ को बनाती हैं, लेकिन रामकथा और रामलीला हमेशा ‘एक रूप’ वाली नहीं रही-उसका ‘रूप’ देशकाल के बदलाव के अनुसार बदलता रहा है।
जब रावण पैदा हुआ तब ‘त्रेता युग’ था और वह मरा भी त्रेता युग में। त्रेता युग न जाने कब का चला गया उसके बाद का द्वापर युग भी बीत गया और कलियुग आ गया लेकिन रामकथा किसी न किसी रूप में आज तक चली आयी है।
राम कथा के बारे में कहा जाता है कि वह एक ‘अमरकथा’ है जो सबके लिए ‘कल्याणकारी’ है। वह हर समय हर दिशा में हर युग में कही-सुनी जाती है। त्रेता युग में तो राम को अवतार लेना पड़ा था लेकिन कलियुग में राम कथा के सुनने मात्र से ही प्राणी पापों से मुक्त हो जाता है। शायद इसीलिए कलियुग में रामलीलाएं बड़ी संख्या में आयोजित की जाती हैं!
राम कथा सनातन कथा है। राम कथा कहने-सुनने की परंपरा बहुत पहले शुरू हुई बताई जाती है, जो आज तक जारी है लेकिन एक लीला या नाटक के रूप में रामलीला की शुरुआत का श्रेय रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास को दिया जाता है, जिन्होंने अपने समय में रामकथा को नाटक का रूप दिया और जो ‘रामलीला’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
अब तक तीन सौ से अधिक रामायण लिखी जा चुकी हैं। रामलीला थाईलैंड, इंडोनेशिया, नेपाल, बांग्लादेश समेत विश्व के आठ आसियान देशों में खेली जाती है लेकिन रामलीला की और रावण-दहन की जैसी ‘उपयोगितावादी व्याख्या’ अपने यहां मिलती है वैसी अन्यत्र नहीं मिलती। अपने यहां रामलीला को ‘रामलीला’ की तरह नहीं रहने दिया गया। आजकल बहुत से लोग उसका ‘आनंद’ लेने की जगह उसे अपनेे हितों के लिए दुहते हैं। पिछले दो-तीन दशकों से तो उसे नए किस्म के राजनीतिक सत्तात्मक विमर्श का एक बड़ा औजार ही बना डाला गया है।
शायद इसीलिए जब भी दशहरा आता है और रावण जलाया जाता है तब हमारे नेता और ज्ञानीजन कुछ ‘शाश्वत सत्य’ छाप ‘सूक्तियां’ कहते देखे जाते हैं। जैसे कि
-दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है!
-दशहरा पाप पर पुण्य की जीत का प्रतीक है!
-दशहरा असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है!
इस तरह, हर बार हमें ‘बुराई’ हारती बताई और दिखाई जाती है और ‘अच्छाई’ विजयी होती दिखाई जाती है। इसी तरह हर बार ‘असत्य’ पर ‘सत्य’ की ‘विजय’ दिखाई जाती है,‘पापी’ को हारता बताया जाता है और ‘पुण्यात्मा’ को जीतता दिखाया जाता है, लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा होता नहीं दिखता बल्कि उल्टा ही होता दिखता है। साक्षात जीवन में तो हर ‘बुरा’, ‘झूठा’ और ‘पापी’ हंसता हुआ विजयी होता दिखता है और हर अच्छा निष्पाप प्राणी मार खाता दिखता है।
अगर बुराई पर अच्छाई की इस कदर जीत होती तो हम सब अब तक पुण्यात्मा हो जाते, धरती स्वर्ग बन जाती, सृष्टि में इतनेे पापात्मा न होते, सब सत्यवादी हरिश्चंद्र होते, कोई ‘फेक न्यूज़वादी’ न होता। जाहिर है कि ऐसा न हुआ और शायद इसी ‘कड़वे सच’ को छिपाने के लिए हमने दशहरे को ऐसे कुछ मायने दे दिए हैं ताकि समाज की हकीकत न नज़र आए। शायद इसीलिए हम ऐसे अवसर को ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ की तरह बेचने लगे हैं।
ऐसे ‘आप्त वचन’ जब भी कोई बोलता है तो ऐसा महसूस होता है मानो ऐसे वचन बोलने वाला तो ‘अच्छाई’ की ‘प्रतिमूर्ति’ है और बुराइयों का अधिष्ठान कोई दूसरा है-इसी कारण हम अपने को ‘पुण्यात्मा’ और बाकी को शुद्ध ‘पापात्मा’ मानते हैं।
इसीलिए, शुरू में जो ‘राम की लीला’ थी, उसमें हमने अपनी ‘निजी लीला’ को ‘मिक्स’ कर दिया है-रामकथा में अंतर्निहित ‘लीला-तत्व’ को अपने ‘पर्सनल शो’ में बदलकर और ‘अपने फायदे का तमाशा’ बनाकर हमने उसे अपनी ‘राजनीति का एक उपयोगी औजार’ बना डाला है। असली ‘रामलीला’ तो सभी के आनंद और कल्याण के लिए थी। वह राम के चरित्र के गुणों को दिखाने-बखानने के लिए थी, जिनको सुन-देख हम राम के प्रति श्रद्धा से भर उठें और उनकी उपासना कर सकें, उनके निकट पहुंचने की कोशिश कर सकें, उनकी कृपा प्राप्त कर सकें और संसार के प्रति अपने मिथ्या माया-मोह, अहंकार और दंभादि को अपने से दूर कर सकें लेकिन ऐसा हो कहां सका और हम भी कब चाहते थे, या चाहते हैं कि सचमुच ऐसा हो और हम राम के अच्छे और सच्चे भक्त बन जाएं!
सच बात तो यह है कि हम ऐसा होने भी नहीं देना चाहते! हम जान गए हैं कि आज के समय में अच्छाई अपनाकर, सहनशील बनकर, सत्यवादी बनकर, ठुकाई के अलावा कुछ भी नहीं मिलने वाला। हम जितने बुरे बनेंगे, उतना ही आगे जाएंगे। इसीलिए हमने दशहरे को अपने लिए, अपनी ताकत के प्रदर्शन और अपने फायदे के लिए ‘एक उत्तम अवसर’ बना डाला है। इसी कारण अब हम अपनी-अपनी ‘रामलीला’ में बड़े नेता, बड़े वीआईपी, बड़ी सेलिब्रिटी आदि को बुलाते हैं ताकि इसी बहाने उनसे हमारा संपर्क बने और उनसे लेन-देन बढ़े। हमने बुलाया, वे हमें बुलाएं। हमारा नाम याद रखें। हमारे काम आएं। इस तरह के ‘लेन-देन’ के अलावा यह जिदंगी है ही क्या?
सुनहरे अवसर बन रहे ऐसे आयोजन
यही वजह है कि आज रामलीला और दशहरा हमारे लिए सिर्फ ‘एक सुनहरा अवसर’ है, जिसके ज़रिए हम अपने को ‘लॉन्च’ कर सकते हैं, अपना ‘पव्वा’, अपना ‘रुतबा’ अपनी ‘पावर’ बढ़ा सकते हैं और किसी बड़े सत्ता-तंत्र के नेटवर्क का हिस्सा बनकर अपना ‘करिअर’ बना सकते हैं।
यकीन न हो तो रामलीला कमेटियों, उनके आयोजकों को देख लें जो किसी वीआईपी या राम-लक्ष्मण के ‘स्वरूपों’ (अभिनेताओं) के संग अपना फोटो खिंचवाने, उनके साथ ‘सेल्फी’ लेने में उसे फेसबुक पर सजा सकते हैं-पर्चों, पोस्टरों और विज्ञापनों में अपना नाम बड़े अक्षरों में फोटो समेत छाप सकते हैं। वीडियो बनाकर यू-ट्यूब पर डाल सकते हैं व्हाट्सएप पर अपनी मित्रमंडली में सर्कुलेट कर सकते हैं और इस तरह अपने लाइक्स का जुगाड़ करके उसे किसी दल या नेता को बेच सकते हैं ताकि अगले चुनाव के लिए टिकट पक्का हो जाये!
क्यों हंसता है रावण
इसीलिए रावण न जलाने से पूरी तरह जलता है, न मारने से पूरी तरह मरता है बल्कि और भी ताकतवर होकर उभरता है और हमारेे अंदर बैठता जाता है। इसी कारण रावण मरते वक्त भी और भी जोर का अट्टहास लगाता हुआ नज़र आता है।
यह एक सर्वप्रिय वार्षिक कर्मकांड है-एक नियत तिथि को हम रामलीला कराते हैं। रावण, मेघनाद, कुंभकर्ण के पुतले मैदानों में खड़ा करवाते हैं। उनके शरीर में तरह-तरह के पटाखे लगवाते हैं और जब राम उसकी नाभि में बाण मारते हैं तो रावण का शरीर पटाखों से जलने लगता है। रावण जलता हुआ लेकिन हंसता हुआ गिरता है-पटाखों के कारण उसके दांत देर तक खिले दिखते हैं, जिनसे लगता है मानो वह हंस रहा हो। लोग इस तरह के रावण के मरने के अंतिम सीन का इंतजार करते हैं। जलते हुए उसकी हंसी देखकर ताली बजाते हैं। जो पुतला जितना उंचा होता है, वह उतनी ही देर तक जलता है और उतनी ही देर तक रावण हंसता दिखता है। उसकी बत्तीसी देर तक खिली रहती है जो रात के अंधेरेेेेेे में और भी आकर्षक लगती है। रावण का पुतला बनाने वाले भी इस बात का खास ख्याल रखते हैं कि जब वह गिरे तो पटाखे उसे हंसता हुआ दिखाएं। वह गिरे तो हंसता हुआ ही गिरे!
हर बरस ऐसा ही होता है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक, पूर्व से लेकर पश्चिम तक। यानी पूरे देश में लाखों रामलीलाएं होती हैं और दशहरे के दिन लाखों रावण जलते हैं और हंसते हुए मरते हैं।
रामलीला मनाने वाले हम लोग आए बरस रावण को इसी तरह हंसते हुए जलता छोड़कर, दश्ाहरे के मेले का आनंद लेकर, चाट, पकौड़ी खाकर निकल जाते हैं लेकिन यह कभी नहीं सोचते कि रावण जब मरता है तो हमें हंसता हुआ क्यों दिखता है?
रावण माने ‘बुराई’ और राम माने ‘अच्छाई’ और रावण का मरना यानी बुराई का हारना और अच्छाई का जीतना! लेकिन बुराई पर अच्छाई की यह कैसी जीत है कि जो हार रहा होता है, जो जल रहा होता है, जो सरेआम मर रहा होता है, वह हंस रहा होता है और जो अपने को जीतता कहते हैैं, वे कभी हंसते नहीं दिखते!
कायदे से तो जीतने वाले को प्रसन्न दिखना चाहिए लेकिन हमने तो मंच परे बैठे किसी भी नगर के या गांव के वीआईपी चेहरों में एक भी चेहरे को अच्छाई की जीत पर प्रसन्न होते नहीं देखा!
शायद इनके चेहरों को देखकर ही रावण जलते हुए हंसता है और शायद मन ही मन कहता है कि जिस अहंकार और जिस दंभ के लिए राम ने मुझे मारा तो लोगों ने समझा होगा कि मेरे मरने के साथ मेरा अहंकार और मेरा दंभ भी मर गया है लेकिन मेरा शरीर मरा। मेरी सूक्ष्म आत्मा यानी मेरा अहंकार नहीं मरा। दंभ नहीं मरा। मरा तो सिर्फ ‘रावण’ मरा। मेरा ‘रावणत्व’ नहीं मरा और वही सब लोगों में फैलकर अमर हो गया।
भगवान राम ने मुझे मारा तो मैं ऊपर से मरा। मेरा शरीर तो मरा लेकिन अंदर से सब में फैलकर अमर हो गया और आज तक सब में जीवित हूं। इसी कारण मरते वक्त भी हंसता रहता हूं।
वो त्रेता युग था जब रावण था और शिवजी से अमरता का वरदान प्राप्त करने के लिए उसने सौ साल तक कठिन तप किया था। कहते हैं कि उसने अपने सिर को अपने ही हाथों से दस बार काट-काट कर शिवजी के चरणों में अर्पित करके उनसे अमरता का वरदान पाया था। शायद इसी वजह से रावण को हंसता देखकर हमें लगता है कि शिवजी का दिया हुआ अमरता का वरदान व्यर्थ नहीं गया। रावण सचमुच में ‘अमर’ है क्योंकि वह सब में अहंकार के रूप में, ‘ईगो’ के रूप में, ‘दंभ’ के रूप में, ‘ताकत’ की अंध पूजा के रूप में, दूसरे के प्रति असहनशीलता और घृणा के रूप में, वैर और बदले और हिंसा की भावना के रूप में बैठा रहता है। अब से कुछ पहले तक तो कुछ शर्म बची रहती थी। आदमी अपने अहंकार को दबाए रहता था लेकिन आजकल तो हर बंदा अपने को रावण का बाप समझता है! कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम सब छोटे-छोटे रावण बन चले हैं। किसी को सिर्फ ‘शक’ के आधार पर लिंच कर डालना, कानून को अपने हाथ में ले लेना, किसी भी कमजोर को ठोक देना, अपने अलावा किसी को भी मनुष्य न मानना, सिर्फ अपनी चलाना, किसी दूसरे की न चलने देना, असहनशील और बदलाखोर होना—इन सबमें रावण का ही तो निवास है! इसीलिए जलते हुए भी और मरते हुए भी रावण हंसता रहता है क्योंकि वह वह जानता है कि राम बनना बहुत कठिन ही नहीं, असंभव भी है जबकि ‘रावण’ बनना आसान है। आज हम सब छोटे-छोटे रावण बन चले हैं!


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