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जन संसद

Posted On October - 14 - 2019

प्याज संकट के सबक

स्थाई समाधान हो
देश में प्याज की मांग बारह माह रहती है। लेकिन बारिश के कारण फसल नष्ट हो जाने से अचानक प्याज की कीमतें आसमान छूने लग जाती हैं। ऐसी स्थिति होने पर तत्काल प्याज के निर्यात पर रोक लगाने, कीमतों पर अंकुश लगाने व इसके भंडारण की सीमा तय कर दी जाती है। यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। दरअसल, देश में प्याज के भंडारण की आधुनिक व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण किसानों के सामने प्याज खराब होने पर उन्हें सड़कों पर फेंकने की नौबत आती है। हमें आग लगने पर कुआं खोदने की प्रवृत्ति से बाज आकर इस समस्या की गहराई में जाकर योजना बनानी होगी।

देवेन्द्रराज सुथार, जालोर, राजस्थान

सख्त कार्रवाई करें
प्याज के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि कोई नई बात नहीं। हर साल बारिश के कारण प्याज खराब होता है और फिर महंगाई आसमान चढ़ कर बोलने लगती है। सरकार ऐसे मौकों पर कई वादें कर देती है लेकिन फिर भी ऐसी समस्या से जनता जूझती रहती है। सरकार ऐसी स्थिति आने से पूर्व समय पर प्याज के भंडारण पर बल दे। वहीं प्याज की कीमतों में वृद्धि न हो, इसके लिए जमाखोरों पर सख्त कार्रवाई करे ताकि जनता को महंगाई का सामना न करना पड़े। प्याज के निर्यात पर रोक लगे।

मनकेश्वर भट्ट, मधेपुरा, बिहार

ठोस योजना बनाएं
वर्ष 1980 के दशक से ही प्याज संकट पर सरकारें बनाने बिगाड़ने की हद तक राजनीतिक उठापटक के बावज़ूद शासन-प्रशासन कोई सबक लेता प्रतीत नहीं होता। नीति-निर्माताओं के पास कोई ठोस योजना नहीं है। प्याज जैसे अन्य संकटों से बचने के लिए कृषि नीति-निर्माता को ठोस एवं दीर्घकालिक सार्थक योजना बनाते समय अनुदान, सब्सिडी, भंडारण, मूल्य निर्धारण, निर्यात की सीमा आदि पहलुओं को शामिल करना चाहिए। प्रशासन को भी कालाबाजारी, अवैध भंडारण को रोकते हुए उचित एवं तय मूल्य पर इसकी उपलब्धता करवानी चाहिए।

राजकुमार, राजौंद

प्रशासन ध्यान दे
प्याज की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसा नहीं है कि प्याज संकट पहली बार आया है, बल्कि कई बार लोगों ने इस संकट को झेला है। दरअसल, जमाखोरी के कारण ऐसा संकट आता है और सरकार को जमाखोरी के खिलाफ सख्त कदम उठाने चाहिए। लेकिन सरकार के पास भी कृषि के लिए कोई ठोस नीति नहीं है। प्याज के बढ़ते दाम के लिए भंडारण क्षमता, आयात-निर्यात पैमाना, किसानों के हित, नीतियां स्पष्ट नहीं हैं। प्याज के बिना खाना बेस्वाद होता है, इसलिए इसके दामों पर नियंत्रण के लिए सरकार को ही सोचना ही होगा।

ज़फर अहमद, रामपुर डेहरू, मधेपुरा

सरकार पर सवाल
सरकार को मालूम था कि प्याज की फसल खराब हुई है तो मांग एवं आपूर्ति में असंतुलन पैदा होगा, और मुनाफाखोरी के चलते दाम आसमान छू सकते हैं। लेकिन सरकार के पास प्याज के पर्याप्त भंडारण की मौजूदगी के बावजूद आम जनता को महंगाई से जूझने पर मजबूर किया गया? समय रहते निर्यात और जमाखोरी पर पाबंदी क्यों नहीं लगाई गई। सरकार की लापरवाही का खमियाजा जनता को क्यों भुगतना पड़ा? सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठना स्वाभाविक हो जाता है। सरकार को जनता के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है।

रूप सिंह नेगी, सोलन

शासन की नाकामी
प्याज के दाम बढ़ने से आम जनता में रोष व्याप्त है। विपक्ष को सरकार पर निशाना साधने का मौका मिल गया है। गौरतलब है कि प्याज़ के बढ़ते दाम चिंता का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर भी लोग सवाल उठाने लगे हैं, वहीं विपक्षी नेता भी सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। हालांकि, ये दाम कब तक नीचे आएंगे, इसका अभी कोई जवाब मिलता नज़र नहीं आ रहा है। सरकार ने दावा किया था कि प्याज की जमाखोरी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ दिख नहीं रहा है। यानी सरकार की नाकामी ही झलकती है। खपत के मुकाबले आवक कम होने से प्याज की कीमतें बढ़ रही हैं।

अमन सिंह, प्रेमनगर, बरेली,उ.प्र.

सरकारी उदासीनता
जमाखोरी, अतिवृष्टि से महाराष्ट्र के किसानों की प्याज की खेती नष्ट होने के बाद सरकार कुंभकर्णी नींद से जागी है। अब आनन-फानन में जमाखोरों पर कार्रवाई करने, अफगानिस्तान से प्याज आयात करने, केन्द्र सरकार द्वारा अपना रिजर्व स्टॉक खोलना और निर्यात को बंद करने जैसे ‘प्राथमिक उपचार’ शुरू हुए हैं। आखिर ऐसा क्यों? किसी समस्या को पहले बढ़ाओ, जनता को खूब रूलाओ फिर जागो’ वाली नीति क्यों? प्याज की कीमतों में वृद्धि की प्रवृत्ति पहले भी कई बार हो चुकी हैं फिर बार-बार इसकी पुनरावृत्ति क्यों? समय पर समाधान क्यों नहीं होता? ये कुछ अनुत्तरित प्रश्न हैं जो सरकार के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार को दर्शाता है।

निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद


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