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छोटू का संकल्प

Posted On October - 27 - 2019

गोविन्द भारद्वाज

‘अरे छोटू जरा बाहर जाकर पटाखे फोड़ो़… मेरा दम घुट रहा है।’ छोटू के दादाजी ने लम्बी- लम्बी सांसें लेते हुए कहा। ‘दादाजी आप तो हर दीवाली पर ऐसा ही कहते हो। पिछली बार भी आप मेरे पीछे यूं ही पड़े थे। कुछ हुआ क्या आपको?’ छोटू ने नाक सिकोड़ते हुए कहा। उनकी बातें सुनकर छोटू के पापा आ गये। उन्होंने छोटू को डांटते हुए कहा, ‘क्या बहस कर रहे हो अपने दादाजी से। ये ठीक ही तो कह रहे हैं। इनको दमे की बीमारी है। तुम जानते हो कि दमे के मरीज़ों को पटाखों के धुएं से बहुत परेशानी होती है।’ ‘अरे भई इसे डांटो मत.. सिर्फ समझाओ। बच्चा है इसे भी चाव है पटाखों का।’ दादाजी ने छोटू के पापा को समझाते हुए कहा। छोटू नाराज़ होकर अपने दोस्तों को लेकर घर से बाहर निकल गया।
कुछ देर बाद छोटू का एक दोस्त दौड़ता हुआ आया। उसने हांफते हुए कहा, ‘छो… छोटू.. छोटू तेरे दादाजी की तबीयत ज्यादा खराब हो गयी है। उन्हें तेरे पापा अस्पताल लेकर गये हैं। जल्दी चल तेरी मम्मी ने बुलाया है।’ छोटू ने उसकी बात सुनकर कहा,’क्या हो गया दादाजी को… अभी तो मैं उन्हें ठीक-ठाक छोड़ कर आया था।’ ‘बहस मत कर, जल्दी चल।’ दोस्त ने कहा। छोटू अपने बचे खुचे पटाखों को समेट कर तुरंत घर की तरफ भागा। घर पहुंचकर उसने मम्मी से पूछा, ‘मम्मी…मम्मी क्या हुआ है दादाजी को?’ ‘तुझ से कह तो रहे थे वो कि बाहर पटाखे चला… बस पटाखों के प्रदूषण से उनको सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। इसलिए अस्पताल लेकर गये हैं तेरे पापा और एक-दो पड़ोसी।’ उसकी मम्मी ने उसे शिकायत के लहजे में कहा। उसने पूछा, ‘पर मम्मी मैं तो घर से दूर चला गया था। फिर कैसे तकलीफ हो गयी उनको?’ मम्मी ने पलट कर कहा, ‘तेरे एक दूर चले जाने क्या हुआ.. पूरे मोहल्ले के बच्चे एक जगह जमा होकर बड़े-बड़े बम-पटाखे चला रहे थे। बस हो गयी तकलीफ।’
छोटू मन ही मन खुद को कोस रहा था। वह बहुत दुखी हुआ। वह अपनी मम्मी के साथ दादाजी से मिलने अस्पताल पहुंचा। अस्पताल में दादाजी को आईसीयू में भर्ती कर रखा था। कोई उनसे मिल नहीं सकता था। उसके पापा ने उसकी तरफ गुस्से से देखते हुए कहा, ‘मिल गयी न तुझे तसल्ली। कितनी बार कहा कि पटाखे मत चलाया कर, इससे वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण बढ़ता है। बीमार और बुजुर्गों को बहुत तकलीफ होती है। अब अपने दादाजी को ही देख।’ ‘सॉरी पापा… अब कभी मैं घर के आसपास पटाखे नहीं चलाऊंगा। मुझे माफ कर दो।’ छोटू ने रुआंसा होते हुए कहा।
उसी समय वहां से एक डॉक्टर साहब गुज़रे। उन दोनों की बातें सुन डॉक्टर ने पूछा, ‘क्यों भाई बच्चे को क्यों डांट रहे हो। इसमें बच्चे का कसूर नहीं है। कसूर है आपका। जैसे पटाखे लाओगे आप वैसे ही तो पटाखे फोड़ेंगे बच्चे।’ ‘क्या मतलब डॉक्टर साहब?’ छोटू के पापा ने पूछा। ‘यही कि इनको ग्रीन पटाखे लाकर दो…जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते हैं। आजकल बहुत बढ़िया पटाखे आ रहे हैं बाज़ारों में। हल्की आवाज़ वाले और धुआं रहित।’ डॉक्टर ने बताया। छोटू की तरफ देखते हुए उसके पापा ने कहा, ‘ठीक है बेटा… मैं ग्रीन पटाखे लाकर दूंगा तुम्हें।’ ‘नहीं पापा… आज के बाद मैं कैसे भी पटाखे नहीं चलाऊंगा। बेकार में पैसों का भी धुआं तो होता ही है, साथ में बड़े बुजुर्गों और बीमार लोगों की तबीयत भी खराब होती है।’ छोटू ने बड़ों जैसी बात कही। थोड़ी देर बात डॉक्टर ने बताया कि चिंता की बात नहीं है। कल सुबह तक छुट्टी मिल जाएगी।
अब सबके चेहरे पर मुस्कान लौट आयी। छोटू ने घर आते ही सारे पटाखे फेंक दिये। उसने संकल्प किया कि वह पटाखों रहित दीवाली मनायेगा।


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