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चीनी मिठास

Posted On October - 10 - 2019

बेहतर संबंधों की जगी आस
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की चीन यात्रा के दौरान चीन का जो बयान कश्मीर को लेकर आया है, वह भारत की रीति-नीति के अनुरूप उत्साहवर्धक है। वहीं इमरान खान के लिये यह स्थिति असहज है। चीन का कहना है कि कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद उत्पन्न तनाव को दूर करने के लिये दोनों देशों को आपस में बातचीत करके मामले को सुलझाना चाहिए। चौंकाने वाली बात यह है कि अब तक कश्मीर को लेकर चीन के कड़े बयान ही आये थे और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वह पाक के सुर में सुर मिलाता नजर आ रहा था। नि:संदेह यह भारत की कूटनीतिक उपलब्धि ही कही जा सकती है। हालांकि, एक हकीकत यह भी है कि इस सप्ताह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो दिवसीय दौरे पर भारत आ रहे हैं। इस बयान को उनके दौरे से पहले सामान्य स्थिति बनाने की दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए। दूसरे अमेरिका के साथ जारी व्यापार युद्ध में कारोबारी नुकसान की पूर्ति चीन भारत के साथ व्यापार बढ़ाकर भी करना चाहता है। आने वाले दिनों में दीवाली का त्योहार भी चीनी कारोबारियों के लिये एक उत्सव जैसा ही होता है। यही वजह है कि कल तक कश्मीर विवाद का समाधान यूएन चॉर्टर के तहत करने की बात कहने वाला चीन अब इसे द्विपक्षीय बातचीत के जरिये सुलझाने की बात कर रहा है। अब सावधानी से देखना होगा कि आने वाले समय में चीन के रुख में क्या बदलाव आता है। चीन में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता का भी कहना है कि कश्मीर मुद्दे पर हमारी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है, हमारा मानना है कि भारत व पाक अन्य मुद्दों के साथ कश्मीर समस्या को भी द्विपक्षीय बातचीत के जरिये सुलझाएं। इससे दोनों देशों के बीच विश्वास की बहाली होगी और रिश्तों में सुधार आयेगा।
याद रहे कि कुछ सप्ताह पूर्व पाक में चीनी राजदूत ने कई असहज करने वाले बयान दिये थे और कश्मीर मुद्दे पर पाक के साथ खड़े होने की बात दोहरायी थी। हो सकता है कि यह चीन की मजबूरी रही हो, क्योंकि चीन ने महत्वाकांक्षी ‘वन बेल्ट,वन रोड’ परियोजना के तहत पाक में भारी निवेश किया है। ग्वादर बंदरगाह के जरिये व्यापार के नये रास्ते चीन ने तलाशे हैं,  जिसके सुचारु संचालन के लिये वह पाक को नाराज नहीं कर सकता। मगर एक हकीकत यह भी है कि भारत उसका बड़ा पड़ोसी है और दोनों के कारोबार में फिलहाल काफी वृद्धि हुई है। दोनों एशिया की बड़ी शक्तियां हैं। दोनों ही देश विकासशील देश हैं और दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। दोनों ही बड़ी उभरती अर्थव्यवस्था व बाजार हैं। हाल के दिनों में तमाम कड़वाहटों के बावजूद तनाव को टालने के प्रयास हुए हैं। बीते वर्ष वुहान में भारत व चीन के मध्य रिश्तों को सुधारने की जो पहल हुई है, उसके सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं। कई क्षेत्रों में दोनों देशों की भागीदारी बढ़ी है। नि:संदेह वक्त की जरूरत है कि दोनों देशों के मध्य दशकों के चले आ रहे विवादों को संवेदनशील ढंग से सुलझाने का प्रयास किया जाये। इक्कीसवीं सदी में युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। कारोबार से ही दोनों देश करीब आ सकते हैं। चीन को भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत 1962 से बहुत आगे निकल चुका है। भारत न केवल सामारिक दृष्टि से बल्कि कूटनीतिक दृष्टि से भी एक विश्व शक्ति के रूप में उभरा है। चीनी राजदूत द्वारा दशहरे पर भारतीयों को बधाई देना संबंधों की संवेदनशीलता को दर्शाता है। इतना ही नहीं चीनी राजदूत ने पंचशील सिद्धांत को मौजूद विश्व समस्याओं के समाधान में सहायक बताया है, जिसके आधार पर भारत व चीन अपने व अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर सहमति बना सकते हैं।


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