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ग्रामीण आर्थिकी सुधरने से दूर होगी सुस्ती

Posted On October - 11 - 2019

जयश्री सेनगुप्ता
दुनियाभर में कई देश आर्थिक मंदी का सामना कर रहे हैं और आर्थिकी को फिर से सुदृढ़ करने हेतु अनेक राहतें दे रहे हैं। चीन ने नीचे जाते अपने बुनियादी निर्माण ढांचे को आर्थिक मदद देने की घोषणा की है ताकि ग्राहकों की क्रय शक्ति में वृद्धि हो सके। वहां बैंकों को अपने कुल पैसे का 0.5 प्रतिशत बचाकर एक तरफ रखना अनिवार्य है लेकिन इस मुद्रा बचत अनुपात (कैश रिजर्व रेशो) में कमी की गई है, जिसके चलते चीन के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी 126 बिलियन डॉलर धन लोगों को कर्ज लेने के लिए उपलब्ध हो सकेगा। थाईलैंड सरकार पहले ही कृषि सब्सिडी, पर्यटन क्षेत्र और निम्न आय वालों के लिए कैश राहतों के लिए 14 बिलियन डॉलर जारी कर चुकी है। उधर पश्चिमी जगत में यूरोपियन सेंट्रल बैंक ने मौद्रिक-तरलता बनाने के अलावा ब्याज दर को 0.5 प्रतिशत कम किया है ताकि यूरो जोन के अंतर्गत आते देशों की आर्थिकी में नई जान फूंकी जा सके।
मंदी के लिए हर देश की अपनी अलग किस्म की समस्याओं के लिए जिम्मेवार है। भारत में आर्थिक मंदी की जड़ में ग्रामीण आर्थिकी में आई गिरावट है। राजग सरकार हालांकि मांग में बढ़ोतरी हेतु अनेक तरह के राहत उपाय लेकर आई है। इसके तहत सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग क्षेत्र, वाहन उद्योग और निर्यात क्षेत्र को दी गई राहतें भी शामिल हैं। बिल्डरों के रुके पड़े मकानों को पूरा करने हेतु 20,000 करोड़ का फंड बनाया गया है। इसके अतिरक्त सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग, वाहन उद्योग और निर्यात क्षेत्र से भी वादा किया गया है कि उनकी समस्याओं का निदान जल्द किया जाएगा और वस्तु एवं सेवा कर मद वापसी के अंतर्गत पड़ा उनका बकाया 30 दिनों के अंदर वापस कर दिया जाएगा।
वस्तु एवं सेवा कर की वापसी पूरी तरह ऑनलाइन तरीके से होगी और चार महानगरों में मेगा शॉपिंग मेले आयोजित किए जाएंगे। सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों को सरल बनाने और अनुबंध निर्माण, कोयला खनन में किए बाहर से आने वाले निवेश को स्वतः मंजूरी देने का प्रावधान किया है। सिंगल ब्रांड उत्पादों के ऑनलाइन खुदरा क्रय के लिए बने नियमों को सरल किया है। सरकार की जिस एक घोषणा से स्टॉक मार्किट और उद्योगपति एक समान खुश हुए हैं, वह है मौजूदा और नए बनने वाले कॉर्पोरेट्स के टैक्स को क्रमशः 22 और 17 प्रतिशत करना। उसे उम्मीद है कि अकेले इस उपाय से ही चमत्कारिक फर्क पड़ेगा। इसका मतलब है 1.45 लाख करोड़ मूल्य की विदेशी मुद्रा का आगमन और यह कदम उत्पादन क्षेत्र में शिद्दत से वांछित उत्प्रेरक का काम करेगा।
हालांकि, घोषित किए गए उपाय लंबे समय तक जारी रखने होंगे, खासकर बैंकिंग से संबंधित क्षेत्र में, इसके तहत बैंकों को पुनः तरल-पूंजी मुहैया करवाने के लिए 70,000 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों और चुनिंदा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों की मार्फत देश के 400 जिलों में कृषि क्षेत्र को संबल दिया जाएगा। हालांकि, बहुत कुछ कॉर्पोरेट क्षेत्र की कारगुजारी पर निर्भर करेगा कि कैसे वह सरकार को करों के माध्यम से मिले धन का सदुपयोग करते हुए निवेश में बढ़ावा कर पाएगा ताकि आगे बाजार में मांग बढ़े और नई नौकरियों का सृजन हो सके। दरअसल, सरकार ने ग्रामीण क्षेत्र पर उद्योगों के बराबर ध्यान नहीं दिया है, जबकि यह क्षेत्र बहुत संत्रास में है और साल की पहली तिमाही में इसमें केवल 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अंतर्राष्ट्रीय वस्तु कीमतों में कमी के चलते भारत में कृषि उत्पादों की बाजार में कम कीमत मिल रही है और किसान अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहे हैं। कृषि क्षेत्र में आमदनी एक जगह आकर अटक गई है। इस किस्म के शोचनीय हालातों के मद्देनजर इस बात की उम्मीद नहीं की जा सकती कि दोपहिया वाहन, ट्रैक्टर, साइकिलें और रोजमर्रा इस्तेमाल की चीजों की मांग में वृद्धि हो पाएगी। ऐसी खबरें आ रही हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में लोग गैर-कृषि वैकल्पिक आमदनी के अभाव में जरूरी इस्तेमाल की वस्तुओं जैसे कि टूथपेस्ट, शैंपू और यहां तक कि मामूली कीमत वाले खाद्य पदार्थ जैसे कि पारले-जी बिस्कुट अपनी रोजाना जिंदगी से हटाने लगे हैं।
नौकरी के अभिलाषी ग्रामीणों में अधिकांश कम पढ़े-लिखे या स्कूल बीच में छोड़ने वाले हैं। इसके पीछे कारण है गांवों में प्राथमिक शिक्षा के शोचनीय हालात। हालांकि सरकार ने रोजगार पाने में सहायक कौशल संवर्धन कार्यक्रम चला रखे हैं, लेकिन इस तरह के प्रशिक्षण केंद्रों से निकले बहुत कम विद्यार्थी सरकारी या निजी क्षेत्र में नौकरी पाने में सफल रहते हैं। कौशल में यह कमी उन्हें शहरों और कस्बों में स्थाई नौकरी पाने के आड़े आती है। ऐसे में अधिकांश केवल अाप्रवासी अस्थाई मजदूर के रूप में दिहाड़ीदार बन जाते हैं, जिनके पास अपना श्रम बेचने के अलावा और कुछ नहीं होता। आर्थिक मंदी का सबसे ज्यादा असर इसी वर्ग को झेलना पड़ा है और नौकरी गंवाने के बाद अपने गांवों को लौटने लगे हैं। अगर ग्रामीण आर्थिकी में बहुत सारी नौकरियों की उपलब्धता हो या वहां व्यापार की बेहतर संभावनाएं हों तो युवा अपने गांवों में ही रहना पसंद करेंगे।

जयश्री सेनगुप्ता

गांवों की औरतों के लिए, फिर भी रोजगार की स्थिति बहुत दयनीय है। अनेक महिलाएं अतिरिक्त आमदनी इसलिए नहीं बना पाती क्योंकि गांवों में परिवहन और आवाजाही के साधन पर्याप्त नहीं हैं। सरकार बेशक ब्लॉक विकास कार्यक्रम की मार्फत हस्तकला और हथकरघा विकास के लिए अनुदान देती है परंतु इसे और ज्यादा किए जाने की जरूरत है। अधिकांशतः इस क्षेत्र में कच्चे माल की कमी और माकूल तकनीक की कमी है, जिससे उत्पादकता प्रभावित होती है, लागत बढ़ती है और आमदनी सीमित होकर रह जाती है।
सरकार के सामने अब काम ग्रामीण आर्थिकी में फिर से जान फूंकने का है और गैर-कृषि रोजगार जैसे कि खाद्य-प्रसंस्करण एवं सहायक इकाइयों के सृजन में सरकारी मदद की बहुत जरूरत है। प्रधानमंत्री किसान योजना के जरिए छोटे और हाशिए पर बैठे किसानों को साल की 6000 रुपये आमदनी की गारंटी भले ही कुछ राहत देगा, लेकिन किसानों की मांगें पूरी करने में बहुत ज्यादा धन की जरूरत है। इसके लिए सरकार को अपने पूंजी व्यय में बढ़ोतरी करनी होगी और ऐसे आधारभूत ढांचे में निवेश करना होगा, जिससे ग्रामीण अंचल में नौकरियों का सृजन हो सके। सुरक्षित पेयजल उपलब्धता कार्यक्रम पर भी पूरी तरह अमल करना होगा और इसके लिए हर गांव के प्रत्येक घर में पाइपों के माध्यम से पेयजल पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है। हालांकि इसको अंजाम देने में नई नौकरियां निकलेंगी। प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता से बेहतर कौशल वाली श्रमशक्ति का विकास हो पाएगा, जिससे उद्योग-धंधों में रोजगार जल्द मिल पाएगा। बाजार की मांग बढ़ाने के लिए रोजगार उपलब्धता और इसकी सुरक्षा यकीनी बनाना सबसे महत्वपूर्ण है। यह ध्येय सरकार के बुनियादी ढांचा निर्माण कार्यक्रम के जरिए सृजनात्मक गतिविधियां पैदा करके प्राप्त किया जा सकता है। इस साल सितंबर माह में बेरोजगारी की हालत और खराब हुई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आंकड़ों के मुताबिक यह 7.57 फीसदी हो गई है, जो एक भयावह चिन्ह है।

लेखिका ऑब्जर्वर रिसर्च फांउडेशन में वरिष्ठ शोधकर्ता हैं।


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