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गमन

Posted On October - 12 - 2019

शारा
मुस्लिम तहज़ीब के महीन रेशों से बुनी रेखा अभिनीत बेहद संजीदा फिल्म ‘उमराव जान’ के निर्देशक मुजफ्फर अली ने ‘गमन’ फिल्म से बॉलीवुड में डेब्यू किया था और पहली फिल्म से ही ख्याति के ऊपरी पायदान पर जा बैठे। वजह टोकरी भर-भर पुरस्कार जीतने वाली इस फिल्म को बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी वर्ग के दर्शकों ने देखा। यह फिल्म 1978 में रिलीज हुई थी। यह वह दशक था जब प्रगतिशील अदाकारी वाले चेहरे सिनेमा में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। नसीरुद्दीन शाह, शबाना आज़मी के साथ-साथ स्मिता पाटिल, ओमपुरी, फारूख शेख आदि ने दर्शकों का एक अलग वर्ग तैयार किया। यह वह वर्ग था जो यथार्थ सिनेमा में कमर्शियल सिनेमा के मुकाबले ज्यादा रुचि दिखाने लगा। ढेरों आर्ट फिल्में बनीं और उन्होंने पुरस्कार भी जीते तथा सिनेमा हॉल भी भरे। गमन भी उन फिल्मों में से एक थी, जिसने मुजफ्फर अली को ‘उमराव जान’ फिल्म का निर्माण करने पर विवश किया।
दर्शक मुजफ्फर अली होने का मतलब जानते थे, इसलिए बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी चिंता की बात नहीं थी। वह लेखक, प्रोड्यूसर, गीतकार, संगीतकार, आर्टिस्ट सभी कुछ थे। इसलिए उनकी फिल्म में कोई भी मीन-मेख का सवाल ही पैदा नहीं होता। उन्होंने गमन फिल्म में सारी सिचुएशन असली फिल्मायी। फिल्म में उत्तर प्रदेश के कोटवाड़ा गांव का जिक्र है। फिल्म की शूटिंग वहीं हुई थी। सारे सैट एकदम असली। पाठकों को बता दें कि फिल्मी हस्ती के बावजूद मुजफ्फर अली कोटवाड़ा रियासत के राजा भी रह चुके हैं। उनका बेटा शाद अली, रानी अभिनीत साथिया व बंटी और बबली, ओके जानू जैसी फिल्मों का डायरेक्टर रह चुका है। यह शाद अली उनकी पहली पत्नी सुभाषिनी अली सहगल से बेटा है जो फिल्मों में एक्टिंग से जुड़ी रही हैं। सुभाषिनी अली लक्ष्मी सहगल की बेटी हैं जो आजाद हिंद फौज में सेना की कमान संभाले हुए थीं। उनकी दूसरी पत्नी मीरा अली हैं जो कॉस्ट्यूम करती हैं। इस फिल्म से बहुत से चेहरों ने डेब्यू किया। नाना पाटेकर और सतीश शाह की यह पहली फिल्म थी। हरिहरण ने फिल्मों में गाने की शुरुआत गमन से ही की थी। लगभग सभी चेहरे नये ही थे लेकिन अभिनय में बेजोड़। जितने सुंदर गीत मखदूम और शहरयार ने रचे, उन्हें उतनी ही खूबसूरती से गाया भी गायकों ने। सारी फिल्म के नेपथ्य में चलने वाली ठुमरी ‘रातभर आपकी याद आती रही’ के लिए छाया गांगुली को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। शायद ही स्मिता पाटिल फिल्म में कोई संवाद बोली हों, यह ठुमरी ही उसके जज्बातों का बताने के लिए पर्याप्त थी। गांव का मकान, दालान, कमरा, रसोई, किवाड़ और नेपथ्य में छाया गांगुली की आवाज़। क्या सुंदर रचना की है जयदेव ने। जिंदगी की जद्दोजहद में लगे फारूख शेख के जरिये मुंबई के हर कामगार की संवेदनाओं की व्याख्या करता ‘सीने में जलन’ गीत शहर की दशा बयान कर देता है। संगीत रचना के लिए जयदेव को भी 1978 का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। गमन से पूर्व जयदेव को रेशमा और शेरा को बढ़िया म्यूजिक देने के लिए पुरस्कार मिल चुका था और ठुमरी सीन-दर-सीन चलती है ‘आजा तोहे गरबा लगा लूं, रस के भरे तोरे नैन।’ इसे हीरा देवी मिश्रा ने गाया है। हीरा देवी मिश्रा शास्त्रीय गायन से भी जुड़ी हैं और अभिनय से भी। सीने में जलन गीत सुरेश वाडेकर ने गाया है। इस फिल्म ने कई कलाकारों को फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया।
अभावों से दो-चार रहे गुलाम हसन (फारूख शेख) अपनी नवौढ़ा पत्नी खैरून (स्मिता) और अपनी बीमार बुजुर्ग मां के साथ रहता है। कितनी भी कतरब्योंत करो बामुश्किल से दो जून की रोटी ही हासिल होती है गांव में। लेकिन उन सपनों का क्या जो नवौढ़ा पत्नी खैरून तथा बीमार मां के अच्छे इलाज के लिए देखता है? क्या वह उन सपनों को साथ लिये मर जाएगा? जब अपनी दिक्कतों का रोना वह लालूलाल तिवारी (जलाल आगा) के आगे रोता है तो लालू उसे अपने साथ बम्बई ले जाता है। अवसरों के शहर में उसे टैक्सी ड्राइवर की नौकरी तो मिल जाती है और वह थोड़े-थोड़े करके पैसे घर भी भेजता है लेकिन उसे लगता है कि पैसे की खातिर उसने उन संवेदनाओं की हत्या की है जो कि जिंदगी के लिए उतनी लाजिमी हैं, जितनी कि रोटी-पानी। उसे अपनी पत्नी की पल-पल याद आती है लेकिन नवब्याहता खैरून को अपने पति का संसर्ग चाहिए। जबकि गुलाम हसन सालोंसाल लगाकर इतने पैसे जमा नहीं कर सकता कि अपने परिवार के पास पहुंच सके। वह पैसे कमाने के फेर में ऐसा फंस जाता है कि चाहकर भी नहीं निकल पाता। यही निर्देशक दिखाना चाहता है कि प्रस्थान करके आये बाहरी लोगों के लिए मुंबई कितनी बेदर्द है? गमन ऐसा हुआ कि हीरो अपनी दुल्हन का मुंह देखने को तरस गया। इस फिल्म में जो गांव के किरदार हैं, वे वहीं के लोग हैं। इसलिए यह फिल्म यथार्थपरक सिनेमा की श्रेणी में आता है। अब मुंबई का सीन देखिए—लालू को वहां रहते हुए कई साल गुजर गए हैं लेकिन वह आज तक अपना घर नहीं बना सका है। वह अपनी गर्लफ्रेंड यशोधरा (गीता सिद्धार्थ) के साथ रहता है। लेकिन हालत ऐसी है कि एक अपार्टमेंट भी किराये पर नहीं ले सकता। वह वहां झुग्गी-झोपड़ी में रहता है, जिस पर हमेशा ही म्युनिसिपल की तलवार लटकी रहती है। विडंबना देखिए कि यशोधरा के घरवाले नहीं चाहते कि वह लालू से शादी करे क्योंकि वही परिवार का भरण-पोषण करती है। जब वह शादी का फैसला करके लालू के साथ गांव जाने के लिए तैयार हो जाती है तो उसी के ही परिवार वाले उसकी और लालू की हत्या कर देते हैं। जिंदगी की मसखरी देखिए, दोस्त की हत्या के बाद गुलाम हसन गांव लौटना चाहता है मगर उसके हालात उसे ऐसा नहीं करने देते। लोगों को यह फिल्म थोड़ी स्लो लगेगी लेकिन यथार्थपरक फिल्में ऐसी ही होती हैं।

टीम
प्रोड्यूसर एवं निर्देशक :मुजफ्फर अली
पटकथा, मूलकथा : मुजफ्फर अली
संवाद लेखक : हृदय लानी
पटकथा विस्तार : असगर वजाहत
सिनेमैटोग्राफी : नदीम खान
कॉस्टयूम डिजाइनर : सुभाषिनी अली
गीतकार : मखदूम, शहरयार
संगीतकार : जयदेव
सितारे : फारूख शेख, स्मिता पाटिल, गीता सिद्धार्थ, जलाल आगा, नाना पाटेकर।

गीत
आपकी याद आती रही : छाया गांगुली
सीने में जलन, आंखों में तूफान : सुरेश वाडेकर
अजीब-सा नेहा मुझ पर गुजर : हरिहरण
रस के भरे तोरे नैन : हीरा देवी मिश्रा


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