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कानूनी तौर पर सिर्फ एक लाख सुरक्षित

Posted On October - 12 - 2019

अर्थमंत्र

आलोक पुराणिक
बाजार में निवेश के कई मौके उपलब्ध हैं। पर देखने की बात यह है कि किसी को भी अपना सारा निवेश किसी एक माध्यम या किसी एक योजना में नहीं डालना चाहिए। जैसे बैंकों में पैसा लगाना बहुत लोकप्रिय माध्यम है। ऐसा आमतौर पर माना जाता है कि बैंक में रकम लगाने का मतलब है कि पैसा एकदम सुरक्षित है, कभी डूबेगा नहीं। समझने की बात यह है कि यह बात पीएमसी बैंक के डिपाजिटर भी समझते थे। जब वो अपनी रकम बैंक से निकालने गये तो पता चला कि वह अपनी मर्जी के हिसाब से अपनी सारी रकम नहीं निकाल सकते और पीएमसी बैंक यानी पंजाब-महाराष्ट्र कोआपरेटिव बैंक के कामकाज पर अब रिजर्व बैंक की सख्त पहरेदारी है। हालांकि केंद्रीय वित्तमंत्री ने पीएमसी बैंक के डिपाजिटरों को आश्वासन दिया है कि वो रिजर्व बैंक के गवर्नर से बात करेंगी और डिपाजिटरों की रकम वापसी सुनिश्चित करायेंगी। पर फिलहाल सच्चाई यह है कि पीएमसी बैंक के सारे डिपाजिटर अपनी मर्जी से सारी रकम वापस नहीं निकाल सकते।
पीएमसी बैंक यानी पंजाब एंड महाराष्ट्र कोआपरेटिव बैंक समस्या में है। मूल समस्या यह है कि बैंक ने जो कुल कर्ज दिये हैं-8880 करोड़ रुपये के, उनमें से 6500 करोड़ रुपये यानी करीब 73 प्रतिशत तो एक ऐसी कंपनी एचडीआईएल को दिये हैं, जो खुद विकट समस्याओं में है। पिछले कुछ सालों में जो बैंक डूबे हैं, उनका ताल्लुक सहकारिता से रहा है। कोआपरेटिव बैंक में ज्यादा जोखिम, सहकारिता बैंकिंग में प्रशासन-प्रबंधन के स्तर पर पेचीदगियां है। प्रशासनिक स्तर पर बहुत कनफ्यूजन है-कोआपरेटिव बैंक एक तरह से रिजर्व बैंक के अधीन पूरे तौर पर नहीं आते हैं, पर एक तरह से रिजर्व बैंक के अधीन भी आते हैं। यानी एक तरफ तो सहकारिता वाले बैकों के गठन, इनके निदेशक मंडल के गठन में राज्य सरकार और केंद्र सरकार के विभागों का रोल होता है। दूसरी तरफ सहकारिता बैंकों के बैंकिंग कामकाज को सीमित तरीके से चेक करने का हक रिजर्व बैंक का भी है। रिजर्व बैंक आफ इंडिया के पूर्व डिप्टी गवर्नर आर. गांधी ने एक साक्षात्कार में जो कहा था, उसका आशय है कि कोआपरेटिव बैंकों के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में हितों का टकराव होता है। जो लोग कर्ज लेते हैं वही बतौर अंशधारक कोआपरेटिव बैंकों का प्रबंधन चुनते हैं। यानी दूसरे शब्दों में लेने वाले भी वही, जो लोग देने का फैसला करेंगे, उन्हेे चुनने वाले भी हैं। ऐसी सूरत आम निजी और सरकारी बैंकों में नहीं होती। आर. गांधी ने इस बात की ओर इशारा कई सालों पहले किया था।
वित्तीय साक्षरता का स्तर बहुत कम है हमारे मुल्क में। कानूनी तौर पर अगर सरकारी बैंक भी डूब जाये तो हर डिपाजिटर को हद से हद एक लाख रुपये ही मिल सकेंगे। डिपाजिट गारंटी के चलते एक लाख रुपये तक की गारंटी है। पर आम जनता यही समझती है कि बैंक का मतलब सेफ्टी, वह सरकारी बैंकों और कोआपरेटिव बैंकों को समान स्तर का सुरक्षित समझती है। रिजर्व बैंक के अधिकारियों की अपनी सोसायटी के करीब 105 करोड़ रुपये पीएमसी में जमा हैं। यानी ज्यादा जोखिम वाले सहकारिता बैंक थोड़ा ज्यादा ब्याज देकर कई डिपाजिटधारकों को आकर्षित कर लेते हैं। बाद में इनके डूबने के वक्त पता लगता है कि रिजर्व बैंक का दखल इनके कामकाज में उतना नहीं था, जितना होना चाहिए था।
कोआपरेटिव बैंकों में जमा राशि के मामले में सरकार आश्वासन दे सकती है, रिजर्व बैंक कोशिश कर सकता है। पर तकनीकी तौर पर एक लाख से ज्यादा की रकम सुरक्षित नहीं है किसी भी बैंक में। फिर सवाल उठता है कि फिर तो सरकारी बैंकों में भी एक लाख से ज्यादा की रकम सुरक्षित नहीं है। इसका तकनीकी उत्तर है कि एक लाख रुपये से ज्यादा की राशि कहीं सुरक्षित नहीं है, पर सरकारी बैंकों का मसला अलग हो जाता है। सरकार को पता है कि एक लाख रुपये से ज्यादा की रकम से ज्यादा की गारंटी नहीं है पर कानून से बड़ी बात भरोसे की होती है। कोई भी सरकार अपने ऊपर से भरोसा उठने को अफोर्ड नहीं कर सकती। इसलिए कोई भी सरकार किसी सरकारी बैंक को डूबने नहीं दे सकती। यानी कुल मिलाकर सरकारी बैंकों को कोई भी सरकार डूबने ना देगी, ऐसा किसी कानून के दबाव के चलते नहीं बल्कि अपने भरोसे को बनाये रखने के लिए कोई भी सरकार करती है। इसलिए यह अनायास नहीं है कि कई दशकों से किसी भी सरकारी बैंक में किसी डिपॉजिटर के पैसे डूबे नहीं हैं। सरकारी बैंकों के अलावा निजी बैंकों में भी डिपाजिटरों के पैसे डूबे नहीं हैं। ऐसा सिस्टम में भरोसा बनाये रखने के लिए किया जाता है। बड़े निजी बैंक और बड़े सरकारी बैंक इतने महत्वपूर्ण होते हैं सिस्टम के लिए कि इनका डूबना कोई सरकार अफोर्ड नहीं कर सकती। तो कुल मिलाकर एक लाख रुपये तक की सुरक्षा ही उपलब्ध है इस मामले में। इसलिए बैंकों के चुनाव में हर व्यक्ति को ऊपर लिखी बातों का ध्यान रखना ही चाहिए।


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