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काइआ नगर महि करम हरि बोवहु

Posted On October - 13 - 2019

गुरु रामदास जी प्रकाश गुरुपर्व 15 को

सत्येंद्र पाल सिंह

सेवा और समर्पण सिख पंथ का आधार है। श्री गुरु अंगद देव जी और श्री गुरु अमरदास जी ने इस आदर्श को संसार के सामने रखा। श्री गुरु रामदास जी ने इन मूल्यों को एक निश्चित दिशा प्रदान की, जिससे कोई भ्रम न रहे और असहाय एवं निर्बल मानव समाज का कल्याण हो सके।
श्री गुरु रामदास जी ने मनुष्य के तन को एक नगर के रूप में देखा। गुरु साहिब ने वचन किये कि इस नगर के खेतों में इंसान को सेवा और भक्ति के बीज बोने चाहिये-
काइआ नगर महि करम हरि बोवहु
हरि जामै हरिआ खेतु।।
मनूआ असथिरु बैलु मनु जोवहु
हरि सिंचहु गुरमति जेतु।।
मनुष्य के सारे धर्म-कर्म तभी फलीभूत होते हैं, जब मन में परमात्मा के प्रति अडिग विश्वास उत्पन्न होता है। यह विश्वास पूर्ण समर्पण से ही आता है। श्री गुरु रामदास जी के मन में श्री गुरु अमरदास जी के लिए पूर्ण समर्पण और भरोसा था, तभी श्री अमरदास जी चबूतरा गिराते गये और श्री गुरु रामदास जी बिना किसी संदेह, शंका के नया चबूतरा बनाते गये। हर बार गिराये गये चबूतरे का फिर-से निर्माण करने के लिए उनके मन में दोगुना उत्साह भर उठता, क्योंकि श्री गुरु अमरदास जी उन्हें सेवा के योग्य समझ कर उनसे सेवा ले रहे थे। श्री गुरु रामदास जी हर बार नया स्थान बनाने के लिए श्री गुरु अमरदास जी की आज्ञा का पालन कर रहे थे, लेकिन इसमें वे अपना कोई योगदान नहीं देख रहे थे।
श्री गुरु रामदास जी ने वचन किये कि शुभ कर्म और भक्ति परमात्मा स्वयं करा रहा है। परमात्मा ही मनुष्य के भीतर भावना पैदा कर रहा है। संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसके मूल में परमात्मा ही है। जब मनुष्य को कर्म करते हुए, परमात्मा का ध्यान करते हुए सुख का अनुभव होने लगे, तो यह उसके मन के टिक जाने का प्रतीक है। अन्य कोई स्थान ऐसा है ही नहीं, जहां सुख प्राप्त किया जा सके- सतिगुरु सुख सागुरु जग अंतरि होर थे सुखु नाही।।
गुरु की शरण के अतिरिक्त यदि मन कहीं और सुख तलाश रहा है अथवा सुख का अनुभव कर रहा है तो इसका अर्थ है कि वह अभी भी भटक रहा है। उसे सुख और सुख के छलावे में भेद नहीं दिख रहा है। श्री गुरु रामदास जी ने सारे संदेह दूर करते हुए स्पष्ट किया- सतिगुरु सेवहि ता सुखु पावहि नाहि त जाहिगा जनुम गवाई।।
मनुष्य के जीवन की सफलता परमात्मा की शरण में ही है। यदि परमात्मा की शरण नहीं ली तो मानव-जीवन के रूप में प्राप्त हुआ दुर्लभ अवसर व्यर्थ चला जाएगा।
(गुरमति ज्ञान से साभार)

गुरु रामदास जी ने आत्मिक स्नान की प्रेरणा दी और अमृत सरोवर को एक प्रतीक के तौर पर सामने रखा-
राम हरि अंम्रित सरि नावारे।।
सतिगुरि गिआनु मजनु है नीको
मिली कलमल पाप उतारे।।
स्नान वह है जो परमात्मा की भक्ति भावना में उतर कर किया जाये। वाहेगुरु के ज्ञान से अपने अंतर की युगों-युगों की मैल उतारी जानी चाहिये।

‘अमृत सरोवर’ खुदवाने की योजना श्री गुरु अमरदास जी ने बनाई थी।
श्री गुरु रामदास जी ने बाबा बुड्ढा जी की निगरानी में इसे खुदवाया।


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