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कर्मचारी और सरकार आमने-सामने

Posted On October - 9 - 2019

पंचकूला, 8 अक्तूबर (ट्रिन्यू)
बिजली संशोधन बिल-2018 को लेकर बिजली कर्मचारी और सरकार आमने-सामने आ गए हैं। केन्द्र सरकार ने इस लंबित बिल को संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में पारित करवाने का ऐलान किया है, जबकि बिजली कर्मचारी एवं इंजीनियर्स की राष्ट्रीय कोआर्डिनेशन कमेटी ने इसके खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया है। आंदोलन का ऐलान करने के लिए 29 अक्तूबर को बीटीआर भवन, नई दिल्ली में कमेटी की राष्ट्रीय बैठक आयोजित की जाएगी। देश के बिजली कर्मचारियों एवं इंजीनियरों के विरोध के कारण एनडीए प्रथम सरकार पिछले कार्यकाल में इसे पारित नहीं करवा पाई थी। यह बिल 2014 से लंबित चला आ रहा है।
इलेक्ट्रीसिटी इम्पलाईज फैडरेशन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं आल हरियाणा पावर कारपोरेशंज वर्कर यूनियन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष सुभाष लांबा ने बताया कि इस मीटिंग में बिजली कर्मचारियों, इंजीनियरों व जूनियर इंजीनियरों के आखिल भारतीय स्तर की फैडरेशनों के वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल होंगे। इसमें जन एवं कर्मचारी विरोधी राष्ट्र विरोधी बिजली संशोधन बिल के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन का निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार कर्मचारियों, इंजीनियरों और जनता के विरोध के बावजूद प्रस्तावित बिजली संशोधन बिल-2018 को आगामी संसद के सत्र में पारित करवाने पर आमादा है।
उन्होंने कहा कि अगर यह बिल पारित होता है तो बिजली वितरण के काम को भी निजी कंपनियों को सौंपा जाएगा। इसके लिए निजी कंपनियों को लाइसेंस दिए जाएंगे। उपभोक्ताओं के पास सरकारी व निजी कंपनियों से बिजली लेने का अधिकार होगा। उन्होंने कहा कि सब्सिडी व क्रास सब्सिडी खत्म हो जाएगी। जिससे बिजली की दरें बढ़ेंगी। कृषि क्षेत्र व गरीब उपभोक्ताओं की पहुंच से बिजली दूर हो जाएगी। प्राइवेट लाइसेंसी मुनाफा कमाने के लिए आएंगे, इसलिए वे जहां लाईन ज्यादा है या जिन उपभोक्ताओं एवं किसानों को सब्सिडी देकर बिजली आपूर्ति की जाती है, उन्हें बिजली नही देंगे। उन्होंने कार्यकर्ताओं से जन एवं कर्मचारी- इंजीनियर व राष्ट्र विरोधी बिजली संशोधन बिल का डटकर विरोध करने का आह्वान किया।

नौकरी जाने का अंदेशा
उन्होंने बताया कि कर्मचारियों एवं इंजीनियरों की नौकरी के लिए खतरा पैदा हो जाएगा, क्योंकि प्राइवेट लाइसेंसी अपना स्टाफ रखेगा। सरकारी बिजली वितरण कंपनियां, निजी कंपनी से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगी, क्योंकि सरकारी वितरण कंपनी के पास स्टाफ एवं आवश्यक संस्थानों का भारी अभाव है। कुछ समय बाद सरकारी वितरण निगम आर्थिक संकट से जूझते हुए बंद हो जाएगी और बिजली क्षेत्र पर पूरी तरह निजी कंपनियों का कब्जा हो जाऐंगा।


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