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एकदा

Posted On October - 11 - 2019

फकीर की अमीरी
एक फकीर पत्नी के साथ एक छोटे से झोपड़े में रहता था। रात को बारिश हो रही थी। किसी ने झोपड़े का दरवाजा खटखटाया। पत्नी ने पति से कहा—रात का समय है, दरवाजा मत खोलना, वैसे भी हमारे पास जगह नहीं है। पति ने कहा—कोई बात नहीं, हम दो सोये हुए हैं, तीन होंगे तो बैठकर रात काट लेंगे। दरवाजा खुला, राहगीर अंदर आ गया। फिर से दरवाजे पर दस्तक हुई। पति ने पत्नी से कहा—दरवाजा खोल दो। पत्नी नाराज स्वर में बोली—अब यहां जगह कहां है? पति ने कहा—अब हम खुलकर बैठे हैं, एक ओर आने से सिमटकर बैठ जायेंगे। दरवाजा खोल दिया, आगुंतक अंदर आकर बैठ गया। कुछ देर बाद एक और दस्तक हुई। पति ने कहा—दरवाजा खोलो। पत्नी गुस्से से बोली—अब कहां बैठाओगेे? पति बोला—अब सुविधाजनक बैठे हैं, फिर थोड़ा असुविधा से बैठ जायेंगे। पत्नी ने बेमन से दरवाजा खोला। तीसरा राहगीर भी झोपड़े में आ घुसा। थोड़ी देर बाद फिर से दरवाजा हिला। बाहर एक गधा खड़ा था। पति ने पत्नी से कहा—दरवाजा खोल दो। अब पत्नी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। अंदर खड़े तीनों मेहमानों ने भी विरोध किया। लेकिन पति ने कहा—इसे भी अंदर आने दो। अब हम बैठे हैं, इसके आने से खड़े हो जायेंगे। यह कोई अमीर का महल थोड़े ही है, जिसमें जगह न हो। यह तो एक फकीर का झोपड़ा है, जिसका हृदय विराट हो, भला वहां जगह की कमी कैसे हो सकती है? प्रस्तुति : सुरेन्द्र सिंह ‘बागी’


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