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Posted On October - 12 - 2019

सतर्कता के रिश्ते
भारत-चीन के रिश्तों में नयापन चीन के राष्ट्रपति के आने से आएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। यहां सवाल तो यह है कि चीन के राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान विभिन्न मुद्दों पर सहमति बनाने के बाद क्या चीन भारत के नापाक पड़ोसी की हर तरह की मदद करना बंद करेगा? क्या सीमा विवाद के प्रति चीन अपनी नीयत बदलेगा? भारत को चाहिए कि चीन की चिकनी-चुपड़ी बातों में न आकर अपने यहां इसको व्यापार की इतनी छूट भी न दे कि हमारे उद्योग-धंधों या कुटीर-उद्योगों पर नकारात्मक असर पड़े। पहले ही चीनी सामान के भारत में आने से कई कारोबार चौपट हो चुके हैं।

राजेश कुमार चौहान, जालंधर

अपनों की टीस
7 अक्तूबर के दैनिक ट्रिब्यून में सुरेश सेठ का लेख ‘ढलती उम्र में अपनों का संत्रास’ पढ़कर मन दुखी हुआ। अपनी ही संतान के हाथों उपेक्षित माता-पिता एक बार अवश्य सोचते हैं कि उनसे परवरिश में क्या कमी रह गई। अपने पांव पर कुल्हाड़ी तब लगती है जब अपने जीते जी अपनी चल-अचल संपत्ति संतान के नाम कर दी जाती है। निष्ठुरता की हदें तब पार होती हैं जब माता-पिता को दो वक्त की रोटी के लिए भी मोहताज होना पड़ता है। युवा पीढ़ी की स्वार्थी सोच एहसास नहीं कराती एक दिन उन्हें भी इस डगर से गुजरना होगा।

अनिल कौशिक, क्योड़क

सरकार संज्ञान ले
पश्चिम बंगाल में संघ कार्यकर्ताओं पर होते अत्याचार ने सरकार की पोल खोल दी है। बंगाल के मुर्शीदाबाद के बंधू प्रकाश उनकी गर्भवती पत्नी और 6 वर्ष के बेटे का विजयादशमी वाले दिन कथित जिहादियों ने कत्ल कर दिया। ऐसे कई मामलों में जिहादी तत्वों की संलिप्तता और सरकार द्वारा कोई कारगर कार्रवाई न होने के कारण बंगाल में वर्ग विशेष असुरक्षित अनुभव करने लगा है। सवाल उठता है कि क्या यह लिंचिंग नहीं? यदि ये किसी विशेष वर्ग या जाति से संबंधित होते तो पूरे देश में आंदोलन होता। केंद्र सरकार को इस पर संज्ञान लेना चाहिए।

मंगलेश सोनी, धार, म.प्र.


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