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Posted On October - 9 - 2019

बुजुर्गों की बेकद्री
7 अक्तूबर के दैनिक ट्रिब्यून में सुरेश सेठ का ‘ढलती उम्र में अपनों का संत्रास’ लेख बुजुर्गों की अपनों द्वारा की जा रही दुर्गति का विश्लेषण करने वाला था। कभी संयुक्त परिवारों में बुजुर्गों का सम्मान हुआ करता था लेकिन जब से एकल परिवार की शुरुआत हुई है, आत्ममुग्धता ने बुजुर्गों को हाशिये पर धकेल दिया है। वृद्ध तिरस्कार, अपमान तथा अवहेलना का शिकार हो रहे हैं। बेशक सरकार ने बुजुर्गों के पक्ष में कई कानून बनाए हैं, लेकिन अपने तथा परिवार के सम्मान के लिए उत्पीड़न को सहन करते रहते हैं। समाज का उत्तरदायित्व है कि जिन बुजुर्गों ने परिवार तथा देश के कल को संवारने में मदद की है, उनकी देखभाल का जिम्मा ले।

शामलाल कौशल, रोहतक

पर्यावरण विरोधी विकास
महाराष्ट्र सरकार द्वारा मेट्रो शेड के लिए 2700 पेड़ काटे जा चुके हैं। हालांकि, काटे हुए पेड़ों को तो वापस नहीं लगाया जा सकता लेकिन जो जीवित हैं उन्हें बचाया जा सकता है। एक तरफ तो सरकार पौधरोपण की बात करती है और दूसरी तरफ विकास के नाम पर आरे कॉलोनी में वृक्षों पर आरी चला रही है। कोर्ट का फैसला स्वागतयोग्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण प्रेमियों के दर्द को समझा। यह खबर पर्यावरण प्रेमियों के लिए सुकून लेकर आयी है। महाराष्ट्र सरकार को अपने किए पर गहन चिंतन करने की आवश्यकता है।

विजय महाजन प्रेमी, रोहिणी दिल्ली

असमंजस की स्थिति
बिहार के सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी एक प्रमुख मुद्दा रहा है। सरकारी स्तर पर शिक्षक नियोजन की प्रक्रिया जारी है। टीईटी उत्तीर्ण प्रशिक्षित अभ्यर्थियों से आवेदन लेने के लिए कर्मियों की प्रतिनियुक्ति के आदेश भी जारी कर दिए गए हैं पर नियोजन के लिए रोस्टर अब तक जारी नहीं हुए। भला ऐसे में बहाली कैसे हो पाएगी। रोस्टर प्रकाशित न होने से न सिर्फ अभ्यर्थियों में निराशा है बल्कि नियोजन ईकाई और संबंधित अधिकारियों में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

मंजर आलम, रामपुर डेहरू, मधेपुरा


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