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14 साल पहले 75 की हुई जमानत जब्त, अब ‘मिशन-75 प्लस’

Posted On September - 10 - 2019

दिनेश भारद्वाज/ट्रिन्यू
चंडीगढ़, 9 सितंबर
हरियाणा में शासन चला रही भाजपा को बुलंदी तक पहुंचने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी है। पुराने दौर में राजनेता भाजपा को जमानत जब्त पार्टी भी कहा करते थे। 14 साल पहले वह दौर भी था, जब 90 सीटों पर भाजपा के 75 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। यह बात साल 2005 की है। अगर 2009 को भी लें तो भाजपा के केवल 4 ही उम्मीदवार जीत पाए थे और 72 अपनी जमानत गंवा बैठे थे। अब यह वक्त का फेर ही है कि 75 सीटों पर जमानत खोने वाली भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता में आने की कोशिश में है और वह भी ‘मिशन-75 प्लस’ के साथ।
2014 में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई भाजपा ने अभी तक 12 चुनाव लड़े हैं। इनमें से केवल चार ही बार ऐसा हुआ जब भाजपा ने बिना किसी दल से समर्थन किए विधानसभा चुनाव लड़ा। रविवार को रोहतक में हुई पार्टी की विजय संकल्प रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी खट्टर सरकार के मिशन-75 प्लस के नारे पर मुहर लगा चुके हैं। यह तो अब भविष्य ही बताएगा कि भाजपा अपने इस जादुई आंकड़े को पार कर पाएगी या नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि फिलहाल पार्टी चुनाव प्रचार और चुनावी तैयारियों में दूसरे दलों को काफी पीछे छोड़ चुकी है।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अधिवक्ता हेमंत कुमार ने चुनाव आयोग से राज्य में अब तक हुए 12 विधानसभा चुनाव के अाधिकारिक आंकड़े जुटाए हैं। इनके अनुसार, केवल 1977 में चौथी विधानसभा के लिए हुए चुनाव में तत्कालीन जनता पार्टी ने 75 सीटों पर जीत हासिल की थी। इन चुनावों में ही विधानसभा की सीटें 81 से बढ़कर 90 हुई थीं। कांग्रेस को इस चुनाव में महज 3 सीट मिली थी जबकि पूर्व सीएम राव बीरेंद्र सिंह की विशाल हरियाणा पार्टी के 5 उम्मीदवार चुनाव जीते थे। बम्पर जीत के बाद चौ़ देवीलाल राज्य के मुख्यमंत्री बने। वे केवल दो वर्ष ही इस पद पर रह सके। इसके बाद जून-1979 में चौ़ भजनलाल राज्य के मुख्यमंत्री बने। बाद में वे कांग्रेस में शामिल होकर फिर से सीएम पद पर आसीन हुए। 1987 के चुनाव में देवीलाल के लोकदल और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा और क्रमश: 60 और 16 सीटें प्राप्त की, जबकि कांग्रेस को मात्र 5 सीटें ही मिली थीं।
इससे पहले तत्कालीन जनसंघ से अलग होने के बाद 6 अप्रैल, 1980 को अस्तित्व में आई भाजपा ने वर्ष 1982 में अपना पहला चुनाव भी देवीलाल के लोकदल के साथ मिलकर लड़ा। दोनों ने क्रमश: 31 और 6 सीटों पर जीत हासिल की। 1996 में भाजपा ने बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी के साथ गठबंधन करके 25 सीटों पर चुनाव लड़ा। इस दौरान पार्टी को केवल 11 ही सीटों पर जीत हासिल हुई। साल 2000 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इनेलो के साथ गठबंधन करके लड़ा। गठबंधन के तहत भाजपा के हिस्से में सीट तो 29 आई थीं, लेकिन उसे जीत केवल 6 सीटों पर मिलीं। 7 सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों की जमानत भी नहीं बची थी।
रिकार्ड के अनुसार, अभी तक हुए चुनाव में 2014 के अलावा 1991, 2005 और 2009 में ही भाजपा ने किसी दल से समझौते किए बिना अपने बूते चुनाव लड़े। फरवरी-2005 के विस चुनाव में भाजपा ने उम्मीदवार तो सभी 90 सीटों पर उतारे लेकिन उसके 75 प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा सके। केवल दो हलकों – हिसार के नारनौंद से गौतम और हसनगढ़ से स्व़ नरेश मलिक ने जीत हासिल की। इन चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत 10.36 रहा। 2009 का चुनाव भी भाजपा ने अपने दम पर लड़ा। पार्टी का वोट प्रतिशत तो घटकर 9.4 प्रतिशत रह गया लेकिन इन चुनाव में चार उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। इनमें अम्बाला कैंट से अनिल विज, सोनीपत से कविता जैन, भिवानी से घनश्याम दास सर्राफ और तिगांव से कृष्णपाल गुर्जर शामिल रहे। इस दौरान पार्टी के 72 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी।
1991 में रहा 9.43% वोट प्रतिशत, 2014 में हो गया 33.20%
1991 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 89 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे 9.43 प्रतिशत वोट हासिल हुए। इस चुनाव में पार्टी के दो उम्मीदवारों – शाहाबाद से खैराती लाल और महेंद्रगढ़ से प्रो़ रामबिलास शर्मा ने जीत हासिल की। पार्टी के 70 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई। हेमंत का कहना है कि पांच वर्ष पूर्व अक्तूबर-2014 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने 90 सीटों पर चुनाव लड़ा और 47 सीटों के साथ पहली बार पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। पार्टी का वोट प्रतिशत भी 33.20 प्रतिशत हो गया।


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