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हिंदी फीचर फिल्म : फिर वही दिल लाया हूं

Posted On September - 7 - 2019

शारा
1981 में पहली हिट फिल्म ‘जब प्यार किसी से होता है’ के बाद नासिर हुसैन प्रोडक्शन की ‘फिर वही दिल लाया हूं’ दूसरी बड़ी कामयाब फिल्म थी लेकिन पहली रंगीन। यह वह वक्त था जब आशा भोसले की आवाज़ ने लोगों पर जादू करना शुरू कर दिया था। आशा भोसले द्वारा उषा मंगेशकर के साथ गाये गीत ‘देखो बिजली डोले बिन बादल की’ के अलावा ‘मुझे प्यार में’ के साथ-साथ ‘लाखों हैं निगाह में’ (सोलो) चुहल भरे रोमांस से भीगे गीत लिखने वाले कोई और नहीं, मजरूह सुल्तानपुरी ही थे। क्या गीत लिखे हैं, मानो अहसासों को ही पिरो दिया हो। सौंदर्यशास्त्र पर कलम चलाने में उनका जवाब नहीं। ‘देखो बिजली डोले बिन बादल की’ सुनें। मजरूह क्या कहना चाहते हैं? पाठक जान जाएंगे। मजरूह की पोइट्री पर ओ. पी. नैयर कमाल की धुनें बनाते थे। फ्लैशबैक के पाठकों ने 1957 में रिलीज ‘तुमसा नहीं देखा’ फिल्म के गाने सुने होंगे तो इन्हें ओ. पी. नैयर और मजरूह सुल्तानपुरी की ट्यूनिंग का आसानी से अंदाजा हो जाएगा। उस पर आशा भोसले की आवाज़ सोने पर सुहागा। इस फिल्म में मोहम्मद रफी का गाना ‘बंदा परवर’ उस समय के मज़दूरों में काफी लोकप्रिय था। फिल्म के प्रोड्यूसर व निर्देशक नासिर हुसैन का नाम बॉलीवुड में ट्रेंड सैटर के तौर पर लिया जाता है। 1973 में उन्होंने ‘यादों की बारात’ को निर्देशित कर बॉलीवुड में मसाला जोनर की फिल्मों का आगाज़ किया जो अब भी जारी है। इसके बाद उन्होंने ‘कयामत से कयामत तक’ प्रोड्यूस की, जिसने सिनेमा जगत में म्यूजिकल रोमांस की फिल्मों की शुरुआत की, जो 1990 तक जारी रही। इन वर्षों में हर किसी निर्देशक ने इस बैनर की फिल्मों में हाथ डाले और मालामाल हुए। नासिर हुसैन की एंट्री बॉलीवुड में 1943 में एक पटकथा लेखक के तौर पर उस समय हुई जब बॉम्बे टॉकीज ताजा-ताजा दोफाड़ हुआ ही था। देविका रानी के बॉम्बे टॉकीज़ से अलग हुए इस धड़े ने फिल्मीस्तान बना लिया था। शशधर मुखर्जी इस के कर्ताधर्ता थे जो मंझले बजट की फिल्में बनाकर संगीत व स्टार वैल्यू के आधार पर फिल्में बेचते थे। शशधर ने ही नासिर हुसैन को ‘तुमसा नहीं देखा’ निर्देशित करने को दी थी। शशधर का शिष्य होने के नाते नासिर ने उनके बेटे जॉय मुखर्जी को फिल्मों में ब्रेक दिया। उसके बाद तो फिल्मीस्तान टूट गया और फिल्मालय नामक दूसरा घटक तैयार हो गया। इस ग्रुप ने नासिर हुसैन की अगुवाई में आशा पारेख को मंच दिया, जो हुसैन की फिल्मों में 1971 में रिलीज़ कारवां फिल्म तक उपस्थिति दर्ज कराती रही। दोनों के फसाने भी अखबारों में खूब चले लेकिन नासिर ने उस वक्त की कोरियोग्राफर मारग्रेट लेविस से शादी करके अफवाहों को विराम दे दिया। आमिर खान उनके भाई के बेटे हैं। इसके अलावा उनका बेटा मंसूर ख़ान उन्हीं का ही प्रोडक्शन हाउस संभाल रहा हैं। ‘जो जीता वही सिकंदर’ उन्हीं की निर्देशित फ़िल्म थी। नासिर हुसैन एक ऐसे पटकथा लेखक थे, जिनकी फिल्मों की कहानियां दर्शकों का सिर भारी नहीं करती थीं। सिनेमा हॉल से जब दर्शक बाहर निकलता था तो झूमता हुआ, माथे पर बगैर किसी शिकन के निकलता था। थोड़ा-थोड़ा सस्पेंस, ज़रा-सा एक्शन और ढेर सारा रोमांस, भला किसी को भी अपने दिमाग पर कितना जोर देना पड़ेगा? इस फिल्म की कहानी में भी कमोबेश यही सब है।
विवाह के बाद जब पति-पत्नी के रिश्ते में दरार बढ़ जाती है तो जमुना अपने पति को छोड़ने का फैसला कर लेती है और घर छोड़ते वक्त अपने साथ बेटी को भी ले जाती है। इस दौरान अपने पति से कोई वास्ता भी नहीं रखती। साल बीतते हैं। उसका बेटा मोहन (जॉय मुखर्जी) जवान हो गया है। तभी उसकी मुलाकात मोना (आशा पारेख) से होती है और कहानी की डिमांड के अनुसार दोनों में प्यार हो जाता है, लेकिन दोनों के बीच दौलत की दीवार आ जाती है। मोना के अभिभावक उसकी शादी बिहारीलाल (राजेंद्र नाथ), जिसे सभी दीपू के नाम से बुलाते हैं, से कराना चाहते हैं। दीपू एनआरआई है और काफी अमीर है। इस स्थिति से बचने के लिए मोना अपने दोस्तों के साथ श्रीनगर घूमने चली जाती है। मोहन भी उसके पीछे- पीछे जाता है। यहीं पर ही दोनों के बीच प्रेम परिपक्व होता है। तभी जमुना का पति अपने बेटे के घर लौटने की घोषणा कर देता है लेकिन इस खबर से जमुना बहुत घबराई हुई है क्योंकि मोहन के नाम से रमेश (प्राण) अपने आपको जमुना के पति का पुत्र बताता है। अब जमुना सच को छुपा कर नहीं रख सकती। उसे अपना अतीत सभी के सामने खोलना ही पड़ेगा। क्या जमुना अपना अतीत दर्शकों के सामने रखती है? या किसी के द्वारा राज़ खोलने का इंतजार करती है? यह तो फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा। फिल्म की कहानी इसी सस्पेंस के इर्द-गिर्द घूमती है।

निर्माण टीम
प्रोड्यूसर व निर्देशक : नासिर हुसैन, गीतकार : मजरूह सुल्तानपुरी, संगीतकार :ओ. पी. नैयर, पटकथा : नासिर हुसैन, सिनेमेटोग्राफी: मार्शल ब्रिगेड।
सितारे: जॉय मुखर्जी, आशा पारेख, प्राण, राजेंद्र नाथ, वीना, तबस्सुम।

गीत
फिर वही दिल लाया हूं- मोहम्मद रफी
लाखों हैं निगाह में- मोहम्मद रफी
आंचल में सजा लेना कलियां -मोहम्मद रफी
आंखों से जो उतरी है दिल में- आशा भोसले
क्यों भला -मोहम्मद रफी
देखो बिजली डोले बिन बादल की -आशा, उषा मंगेशकर
जुल्फों की छांव में-मोहम्मद रफ़ी
हमदम मेरे खेल ना जानो-मोहम्मद रफ़ी, आशा भोसले
मुझे प्यार में तुम- आशा भोसले,


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