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हिंदी फीचर फिल्म : गाइड

Posted On September - 28 - 2019

शारा
देवानंद की ‘गाइड’ फिल्म मानो सेल्युलाइड पर लिखी कोई कविता—शब्द-दर-शब्द जो अंदर तक घर कर जाती है, जिसके किरदार हमारे जेहन में चस्पां हो जाते हैं, सदा के लिए। भला राजू गाइड को कौन भूल सकता है? लगता है वह परले मोहल्ले में रहता है, जिसमें हमारी ही तरह प्यार-नफरत, राग-द्वेष, विरक्ति-मोह सब कुछ कूट-कूट कर भरा है। सब कुछ वैसे ही जिंदगी के लिए सभी स्वाद लाजिमी। या फिर ‘कांटों से खींच के ये आंचल’ को अरमानों के खुले आसमां में लहराती, सामाजिक वर्जनाओं को खंड-खंड करती तथा पारिवारिक सांकलों को खोलती रोजी भी तो दर्शकों को नहीं भूलती। नवकेतन प्रोडक्शन तले बनी इस फिल्म को डायरेक्ट किया था देवानंद के छोटे भाई विजय आनंद उर्फ गोल्डी ने, जो उसके जीनियस होने का सबूत है। यह फिल्म देवानंद की मानसपुत्र थी लेकिन इसमें धड़कनों का संचार करने वाले गोल्डी ही थे। वर्ष 1965 में रिलीज यह मूवी ब्लॉक बस्टर नहीं, बल्कि सुपरहिट थी क्योंकि कुछ तो कहानी की मांग थी और कुछ निर्देशन में दक्षता, जिसने फिल्म को चलताऊ बनने से रोक लिया। जब साधु बने देवानंद को कहानी की मांग के अनुरूप निराहार प्राण त्यागने होते हैं तो अपनी छवि की खातिर वह ऐसा करने से इनकार करते हैं और गोल्डी को पटकथा में बदलाव करने के लिए कहते हैं क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे उनके फैंस का दिल टूट जाएगा लेकिन छोटे होने के बावजूद गोल्डी अड़ गए और शायद इसी सीन ने फिल्म को कलात्मक मोड़ दिया और समापन भी किया।
इस फिल्म की प्रोडक्शन से बड़े रंगीन किस्से जुड़े हैं। यह फिल्म पहले इंग्लिश में बनी थी। हुआ यूं कि अमेरिकी फिल्म निर्देशक टैड डेनियले विस्की व पर्ल बक भारतीय कथाकार के अंग्रेजी उपन्यास ‘गाइड’ पर आधारित फिल्म बनाना चाहते थे लेकिन भारतीय चेहरों को लेकर। उन दिनों देवानंद का जादू दर्शकों पर सिर चढ़कर बोल रहा था। उनके दिलफेंक लड़कपन के देश-विदेश में खासे दीवाने थे, खासकर लड़कियां। उनकी अदाएं इतनी कातिलाना थीं कि उन्हें काला लिबास पहनने की मनाही थी। इसीलिए इस फिल्म के लिए देवानंद को अप्रोच किया गया। देवानंद पर उन दिनों फिल्म ‘हम दोनों’ का नशा तारी था। इसीलिए उन्होंने यह पेशकश ठुकरा दी। लेकिन 1962 में बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में जब उनसे फिर मुलाकात हुई तो पर्ल बक व टैड ने वही पेशकश दोहरायी। नतीजतन देवानंद ने ‘गाइड’ उपन्यास खरीदकर एक ही सांस में पढ़ डाला और स्वेदश लौटते ही उन्होंने पुस्तक के लेखक आर.के. नारायणन से कॉपी राइट खरीद लिये। अब फिल्म बनाने की तैयारी शुरू हो गयी। इसके लिए वहीदा को कई माह तक अंग्रेजी लहजे की ट्रेनिंग दी गयी। फिल्म बनकर रिलीज भी हो गयी लेकिन फ्लॉप भी हो गयी। और तो और आर.के. नारायणन ने ही इसे रिजेक्ट कर दिया। वजह थी अमेरिकी निर्देशक द्वारा दैहिकता को ज्यादा तरजीह देना। फलस्वरूप फिल्म से आत्मा गायब हो गयी। फिर प्रक्रिया शुरू हुई इसे हिंदी में फिल्माने की। पहले निर्देशन का जिम्मा संभाला देवानंद के बड़े भाई चेतन आनंद ने, लेकिन हीरोइन के तौर पर वे लीला नायडू को लेना चाहते थे। लेकिन देवानंद वहीदा रहमान को। दोनों में ठन गयी। चेतन आनंद ‘हकीकत’ फिल्म बनाने में मशगूल हो गये तो देवानंद ने यह जिम्मा राज खोसला को सौंपा लेकिन वहीदा रहमान ने उनके साथ काम करने से जब मना कर दिया तो यह कमान निर्देशन में नये-नये प्रयोग कर रहे छोटे भाई गोल्डी को सौंप दी, जो उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट बन गयी। निर्देशन व संपादन के अलावा पटकथा, संवाद रचना में लेशमात्र भी ऐसी कोई खामी नहीं, जिसके लिए फिल्म में सुधार की गुंजाइश हो। एस.डी. बर्मन ने शैलेंद्र के गीतों को ऐसी धुनें दीं कि उनके गीत अमर हो गये। एक से बढ़कर एक ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ गीत को जब सचिन दा धुनों में नहीं पिरो पा रहे थे तो गोल्डी ने उन्हें सलाह दी कि इस गीत के अलग-अलग अंतरे को अलग-अलग धुन से संवारो। देखिये यह प्रयोग कितना सफल रहा? और उस पर वहीदा का मंत्र चालित नृत्य दर्शक को सपने में ले जाने के लिए काफी है और बात हीरो की। इस रोल को जितना बढ़िया देवानंद ने जीया है, शायद ही उतना कोई अन्य जी पाता। तरोताजा चेहरे और यौवन की दहलीज पर दोनों हीरो व हीरोइन। ‘गाइड’ तब ऐसी पहली फिल्म रही जो एक झटके में फिल्मफेयर के चार बड़े पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ फिल्म, निर्देशन, एक्टर व एक्ट्रेस झटक कर ले गयी। और तो और एस.डी. बर्मन को सर्वोत्तम संगीतकार तथा लता मंगेशकर को सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका के अलावा फलीमिस्त्री को सर्वोत्तम सिनेमैटोग्राफर और सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के अलावा विजय आनंद (गोल्डी) को सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन के लिए पुरस्कृत किया गया। पुरस्कार इस फिल्म पर बारिश की तरह बरसे।
इसे 38वें एकेडमी अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की श्रेणी में आधिकारिक तौर पर भेजा गया। रिलीज होने के 42 साल के बाद 2007 में इसे कांस फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया। इसके हिस्से में बहुतेरी तारीफें, पुरस्कार आए। कहानी एक आम व्यक्ति के सपने की उड़ान है। इसमें राजू (देवानंद) एक टूरिस्ट गाइड बना है। जैसे कि टूरिस्ट गाइड बातूनी होते हैं, वैसा ही राजू भी है लेकिन वह टपोरी टाइप भी है। वह रोज़ी (वहीदा) से जब पहली बार मिलता है तो वह विवाहिता होती है। उसका पति मार्को आर्कियोलॉजिस्ट है, जो रोज़ी से उम्र में काफी बड़ा है। दोनों पति-पत्नी घूमने-फिरने के लिए आए हैं, इसीलिए टूरिस्ट गाइड के तौर पर राजू को साथ ले लेते हैं। शायद यही गलती मार्को को महंगी पड़ती है। फिल्म में मार्को का रोल जाने-माने एक्टर व डायरेक्टर किशोर साहू ने निभाया है। किशोर साहू वही हैं जिन्होंने मीना कुमारी की हिट फिल्म ‘दिल अपना और प्रीत परायी’ को निर्देशित किया था। नीरस पति मार्को से ऊबी रोज़ी को राजू से प्यार हो जाता है क्योंकि वह रोज़ी के शौक नृत्य को प्रोत्साहित करता है। राजू का प्यार व केयर उसे सामाजिक बंधनों को तोड़ने की हिम्मत देता है और वह पति का घर छोड़कर राजू की कुटिया में आ जाती है। मां के विरोध के बावजूद राजू रोज़ी को अपनाता है। वह उसे रातोंरात नर्तकी बना देता है। राजू के प्रबंधन स्किल के कारण वह स्टार बन जाती है लेकिन राजू अपने भीतर पनपी असुरक्षा की ग्रंथि के कारण जुए व शराब की लत में फंस जाता है। वह इसी भय से कि रोज़ी उसे कहीं छोड़ न दे, रोज़ी के नाम मार्को की ओर से आये चैक पर रोजी के दस्तखत कर देता है। मार्को उसे जालसाजी के केस में फंसा देता है। रोज़ी उसकी इस हरकत को बर्दाश्त नहीं कर पाती और राजू को जेल हो जाती है। जेल से छूटकर उसे अपने पहले वाले जीवन से विरक्ति हो जाती है। वह किसी दूर गांव के मंदिर में शरण लेता है, जहां लोग उसे संत समझ लेते हैं। लोगों के विश्वास को बनाए रखने के लिए उसे 12 दिन तक भूखे-प्यासे रहना पड़ता है ताकि अकाल का सामना कर रहे लोगों का बारिश लाने का संदेशा परमात्मा तक पहुंच सके। बारिश तो हो जाती है लेकिन राजू प्राण त्याग देता है।

निर्माण टीम
प्रोड्यूसर : देवानंद
निर्देशक : विजय आनंद (गोल्डी)
मूल कथाकार : आर.के. नारायणन
पटकथा : विजय आनंद
सिनेमैटोग्राफी : फली मिस्त्री
गीतकार : शैलेन्द्र
संगीतकार : एस.डी. बर्मन
सितारे : देवानंद, वहीदा रहमान, किशोर साहू, लीला चिटनिस, अनवर हुसैन आदि

गीत
आज फिर जीने की तमन्ना है : लता मंगेशकर
दिन ढल जाये हाय रात न जाए : मोहम्मद रफी
गाता रहे मेरा दिल : किशोर कुमार, लता मंगेशकर
क्या से क्या हो गया : मोहम्मद रफी
पिया तोसे नैना लागे रे : लता मंगेशकर
सैंया बेईमान : लता मंगेशकर
तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं : मोहम्मद रफी
वहां कौन है तेरा मुसाफिर : एस.डी. बर्मन
रे राम प्यारे रामचंद्र : मन्ना डे, कोरस
अल्ला मेघ दे पानी दे : एस.डी. बर्मन


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