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सापूतारा का मानसूनी सफ़र

Posted On September - 7 - 2019

अलका कौशिक
हम उत्तर वालों के साथ एक अजीब दिक्कत है कि हमें पहाड़ के नाम पर सिर्फ हिमालय दिखता है। ऐसे में पश्चिमी भारत की शुष्क ज़मीन यानी गुजरात के ‘हिल स्टेशन’ पर मानसून फेस्टिवल में शिरकत करने का न्योता आए तो हमारे जैसे भौचक्क रह जाते हैं। पश्चिम के इस राज्य को सिर्फ चिकने, फर्राटा हाईवे, नमक के खेतों, रेगिस्तानी भूमि के अलावा कच्छ के रन, रन की नमकीनी आबोहवा और पाटन पटोला से लेकर बावलियों समेत विश्व विरासत शहर अहमदाबाद की आबाद दुनिया के रूप में जाना जाता है। मगर हिल स्टेशन गुजरात में? मेरी तो कल्पना में भी गुजरात ऐसा नहीं हो सकता था। फिर गुजरात पर्यटन के सापूतारा मॉनसून फेस्टिवल का जिक्र सुना और हमारे भूगोल-इतिहास बोध में एक नया पन्ना जुड़ गया।
वडोदरा से गुजरती है राह
मन की उड़ान ने तन को धकेलकर हमें दिल्ली से एयर इंडिया के साथ वडोदरा के सफर पर जाने के लिए मजबूर कर दिया था। यहां से जो सफर शुरू हुआ तो लगा जैसे गुजरात में हिस्ट्री-ज्यॉग्राफी की क्लास में पहुंच गई थी। वडोदरा में एक रोज़ ठहरना तय हुआ और अगले दिन शहर के ऐतिहासिक सिरे पकड़ने के लिए हेरिटेज वॉक का दामन थाम लिया। कम समय में शहर की भरपूर झलक लेने का इससे बढ़िया विकल्प शायद कोई और नहीं हो सकता।
‘बड़ौदा म्यूजि़यम एवं पिक्चर गैलरी’ होते हुए हम बड़ौदा स्टेट लाइब्रेरी के आंगन में थे। लाइब्रेरी क्या थी, राज्य की धरोहर का एक मजबूत स्तंभ है यह इमारत। 1880 में चालू हुई इस पब्लिक लाइब्रेरी के बरामदे से लेकर हॉल तक में पढ़ाकू दिखे थे, हालांकि उनका आंकड़ा कोई बहुत उत्साहित करने वाला नहीं था तो भी लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी संस्था का जिंदा रहना कोई मखौल तो नहीं हो सकता। यहां से हमने लक्ष्मी विलास महल जाने वाला रास्ता पकड़ा। इंडो-सारासैनिक शैली में बना यह महल करीब सवा सौ साल पहले गायकवाड़ राजघराने के निवास के तौर पर अस्तित्व में आया था। राजे-रजवाड़े तो अब नहीं रहे लेकिन उनके रहन-सहन की झलक हासिल करने के लिए ऐसे महलों का आम जनता के लिए खुलना सुखद होता है। इस महल का जिक्र इसलिए भी जरूरी है कि यहां प्रसिद्ध पेंटर राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स का एक बड़ा संग्रह मौजूद है और यह महल बड़ौदा राजघराने के मौजूदा वारिसों का घर भी है। एक हिस्से में राजपरिवार बसता है और एक बड़ा हिस्सा म्यूजि़यम तथा आर्ट गैलरी में तबदील हो चुका है। कई एकड़ में फैले इसके बाग-बगीचे सामाजिक आयोजनों के लिए इस्तेमाल होते हैं। उस रोज़ भागते-दौड़ते ही सही, मगर शहर की विरासत से रूबरू होने का यह मौका मैं हाथ से फिसलने नहीं देना चाहती थी।
बरखा ऋतु का उत्सव
वडोदरा से आधे दिन में एक खूबसूरत राब्ता कायम कर हम अपनी मंजि़ल की तरफ बढ़ चले थे। आगे लंबा सफर बाकी था और जल्द ही शहर की हदबंदी से पीछा छुड़ाकर हम हाईवे पर दौड़ने लगे थे। कर्जन, भरूच और नवसारी जैसे नाम पीछे छूट गए थे और रात होते-होते डांग जि़ले में हमारी सवारी आ लगी थी। सापूतारा इसी जि़ले में है। मंजिल आने से ज़रा पहले से ही फिज़ा बदलती महसूस हुई थी। अब रास्ता सीधा नहीं रह गया था बल्कि सड़कें घुमावदार हो चली थीं, सहयाद्रि के जंगलों का घनापन बढ़ने लगा था और पहाड़ों ने भी अपने सीने तान लिए थे। रात के उस घुप्प अंधकार में हम इससे ज्याादा कुछ देख नहीं पा रहे थे, मगर सुकून था कि अगले दो रोज़ इस अजब-गजब हिल स्टेशन से मिलेंगे, कुछ उसे अपना बनाएंगे, कुछ हम उसके हो लेंगे।
सापूतारा यानी सांपों का बसेरा
सर्प दुर्गा नदी के किनारे बसा है सापूतारा यानी सांपों का बसेरा। पश्चिम के लंबे तट वाले राज्य गुजरात का इकलौता हिल स्टेशन, जो महाराष्ट्र से सटा है और मानसून में जब यह इलाका हरा-भरा हो जाता है, जब कुदरत की हर शै मुस्कु‍रा उठती है और बारिश की बूंदें हर जीवन को दुलारती हैं, तो सापूतारा जैसे झूम उठता है। आसपास के इलाकों से सैलानी कुदरत के इस मानसून राग को सुनने इस तरफ चले आते हैं। उनके लिए गुजरात पर्यटन बीते करीब एक दशक से सापूतारा फेस्टिवल का आयोजन करता आ रहा है। कहीं परेड तो कहीं एडवेंचर गेम्स, बोट राइड, खानेपीने के स्टॉल तो कहीं शॉपिंग के जलवे बिखरते हैं। डांगी आदिवासी नर्तकों की टोलियां स्थानीय नृत्य प्रस्तुत करने उतर पड़ती हैं। सापूतारा झील, गवर्नर हिल और मेन सर्कल पार्किंग एरिया पूरे महीना भर चलने वाले कार्यक्रमों के मंच में तबदील हो जाते हैं। सूरज ढलते ही झील पर साउंड एंड लाइट शो का मंच सज जाता है।
फेस्टिवल के बहाने
केबल कार की सैर करने नज़दीकी पहाड़ी तक चले आइये। और डांग जिले को कुछ और जानने का मन हो तो सापूतारा म्यूजि़यम देखने से चूक न जाना। यहां डांग की पूरी धरोहर सिमटी पड़ी है। पहनावा, रहन-सहन, खानपान, गहने, पारंपरिक घरों के मॉडलों से लेकर डांग के सर्प-समाज के वाद्य यंत्रों को सुनने का मौका भी यहां आपको मिलेगा।
बेहतरीन वीकेंड गेटवे
सापूतारा के मानसून फेस्टिवल का कद इतना ऊंचा नहीं हुआ है कि आप यहां आकर अपनी हस्ती को बौना महसूस करें। गुजरात के इस कोने में, सहयाद्रि की ओट में गुजरात पर्यटन की यह पहल आपको सहज रखती है। मेले में आप खो नहीं जाते। सापूतारा दरअसल, गुजरात और महाराष्ट्र के आसपास के इलाकों में बसने वालों के लिए बेहतरीन वीकेंड गेटवे है, लंबी दूरियों के मायाजाल से मुक्त, सहज और भागमभाग से दूर। यहां आकर आप ठहरना सीखते हैं, कम भागते हैं, हौले-हौले जिंदगी का राग सुनते हैं-बरखा ऋतु की लय-ताल में खुद को समाते हैं। हमने यहां ठौर के रूप में गुजरात पर्यटन का गैस्ट हाउस चुन लिया था, जिसकी किचन से गुजराती थाली की उम्मीद भी लग चुकी थी। मगर वो आधी-अधूरी सी आयी। ज़ायके के रास्ते भूगोल समझना आसान होता है, ऐसा तमाम घुमक्कड़ शास्त्र बताते हैं।
लेकिन अपनी थाली में सिर्फ खिचड़ी, कढ़ी, फरसाण के नाम पर ढोकला ही ठेठ गुजरात व्यंजन थे, जबकि भाखरी, ऊंधियो और खट्टी-मीठी दाल को हम तरसते रहे थे। अलबत्ता, प्यास बुझाने के लिए छास छककर पी ली थी। गुजराती ज़ायके की तलाश हमें सापूतारा झील तक ले आयी थी। झील तक जाने वाली सड़क के किनारे कुछ स्टॉल थे, कुछ ठेलियां, कुछ दुकानें, कुछ पकवान, कुछ उबली मूंगफलियां और कच्चे-खट्टे आम-अमरक-अमरूद की जुगलबंदियां भी थीं। सापूतारा यकीनन, मुझे धैर्य सिखा रहा था, हौले-हौले सहज होने के मंत्र थमा रहा था, महानगरों के कोलाहल और संताप से दूर उस नन्हे-से, अनजान से, कुछ-कुछ गुमनाम से हिल स्टेशन में कुछ दिन गुजारकर मैं जिंदगी में हौलेपन की पदचाप सुन पा रही थी। मुझे मिलान कुंदेरा का उपन्यास ‘स्लोनैस’ याद आ रहा था और धीमेपन के उन दो दिनों में मैंने स्मृति प्रदेश में जाने कैसी-कैसी घुसपैठ देखी। सापूतारा मुझे रफ्तार के विरुद्ध ले गया था जहां ‘नॉस्टेल्जिया’ और ‘मेमोरी’ का अजब-गजब कैनवास था।

कैसे पहुंचें सापूतारा-
हवाई मार्ग-
वडोदरा एयरपोर्ट, वडोदरा से सापूतारा-288 कि.मी./6 घंटे सड़क मार्ग से
सूरत एयरपोर्ट (सबसे नज़दीकी), सूरत से सापूतारा-164 कि.मी./ 3 घंटे सड़क मार्ग से
मुंबई एयरपोर्ट, मुंबई से सापूतारा – 250 कि.मी./5 घंटे सड़क मार्ग से
रेलमार्ग –
नासिक-85 कि.मी.
सूरत-164 कि.मी.
आसपास- करीब 60 किलोमीटर दूर वघई में उनाई माता का मंदिर है, जिसमें गर्म पानी के कुंड में स्नान करने की परंपरा है। करीब 87 किलोमीटर दूर नासिक के सुला विनयार्ड्स भी जाया जा सकता है

मौसम

सापूतारा में साल भर मौसम सामान्य रहता है, न बहुत गर्म और न ज्यादा ठंडा
तापमान-
गर्मियों में 20 से 31 डिग्री सेल्सियस। आरामदायक सूती कपड़े लेकर जाएं।
सर्दियों में 10 से 28 डिग्री सेल्सियस। कुछ मोटे और हल्के ऊनी कपड़े लेकर जाएं।


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