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साझे हितों के जरिये समस्या का समाधान

Posted On September - 9 - 2019

अंतर्मन

रेनू सैनी
प्रत्येक व्यक्ति की अपनी समस्या होती है। कई बार इनके समाधान के लिए उसे कोई मार्ग नज़र नहीं आता। ऐसे में व्यक्ति अपने निकटतम संबंधी, मित्र अथवा किसी ऐसे व्यक्ति की मदद लेना उचित समझता है जो उसकी इस संदर्भ में सहायता कर सके। आपको क्या लगता है कि मित्र अथवा संबंधी आपकी समस्या के समाधान को बिल्कुल उसी तरह तन-मन से सुलझाते हैं, जिस तरह से आप। सोच में पड़ गए न आप। अधिकांश ने तो जवाब भी सोच लिया होगा और यह जवाब ‘न’ में ही आया होगा।
ऐसा क्यों होता है कि संबंधी या मित्र समस्या में समाधान के लिए या तो हाथ खड़े कर देते हैं अथवा ऊपरी सलाह देकर छुट्टी पा लेते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम अपने मित्र अथवा संबंधी को केवल यह अहसास कराते हैं कि समस्या सिर्फ हमारी है, उसका उनसे कुछ लेना-देना नहीं है। जिस वस्तु अथवा कार्य से किसी का कुछ लेना-देना नहीं होता, वे उसके बारे में देखना भी पसंद नहीं करते। इसलिए किसी भी समस्या का समाधान मांगते समय सामने वाले को सदैव यह महसूस कराना चाहिए कि यह उनकी भी समस्या है। हम सभी की संरचना इस प्रकार से बनी हुई है कि हम सामने वाले के बजाय अपनी समस्याओं में अधिक दिलचस्पी लेते हैं। तो ऐसा ही दूसरा व्यक्ति भी करेगा। समझदार व्यक्ति समस्या उत्पन्न करने वालों से ही समाधान निकलवा लेते हैं और जीवन को सहज बना लेते हैं।
एक बार मैरीनेट, विस्कॉन्सिन की असुंल केमिकल कम्पनी के प्रमुख रॉबर्ट सी हुड के सामने यह समस्या आई कि उसके सभी विभाग प्रमुख अपनी लागत को कम करें। इस समस्या के सामने आने पर रॉबर्ट सी हुड ने अपनी कम्पनी के कर्मचारियों को कोई उपदेश नहीं दिया, न ही कोई डांट फटकार लगाई। उन्होंने अपने कर्मचारियों से यह भी नहीं कहा कि उन्हें लागत को कम करना है। बल्कि उन्होंने तो उस दर्शन का पालन किया जिसमें कहा जाता है कि, ‘लोग उस नीति का समर्थन करते हैं, जिसे बनाने में उनका सहयोग लिया जाता है।’
इसलिए लागत कम करने के लिए उन्होंने अपने कम्पनी के सभी शीर्ष लोगों की एक समिति बना दी। उन्होंने समिति के सदस्यों से यह भी नहीं कहा कि उन्हें किस खास चीज में कटौती करनी है। बल्कि उन्होंने इसकी पूरी जिम्मेदारी उन पर छोड़ते हुए कहा कि वे स्वयं इस पर विचार करें कि कहां कटौती की जा सकती है। यह उन सबकी खुद की समस्या है। कम्पनी प्रमुख रॉबर्ट सी हुड की बात सुनकर समिति के सदस्य एक-दूसरे के विचारों से प्रोत्साहित होकर इस बारे में सोचने लगे। कम्पनी के सभी सदस्यों ने अधिक लागत वाले कार्यों का हिसाब बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उन्होंने यात्रा, टेलीफोन, तार, कच्चे माल यहां तक कि टिकट के उपयोग में भी पैसे बचाने के उपाय ढूंढ़ लिए। मि. हुड ने अमेरिकन मैनेजमेंट एसोसिएशन को इस योजना के परिणाम बताए तो सब दंग रह गए।
उन्होंने बताया कि समिति के सदस्यों ने अब लागत को इतना कम कर दिया है कि टैक्स के बाद लाभ 40 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ गया है, जबकि बिक्री केवल 9 प्रतिशत ही बढ़ी है। यह सुनकर सभी दंग रह गए। ऐसा केवल इसलिए हो पाया क्योंकि मि. रॉबर्ट ने समझदारी से समस्या के समाधान के लिए कम्पनी के सभी लोगों को इसमें शामिल होने के लिए कहा। यदि वे उन्हें समस्या उत्पन्न करने के लिए ताने कसते रहते तो निश्चित ही कई कर्मचारी न केवल कम्पनी छोड़ जाते बल्कि जो काम करने वाले थे, वे भी उत्साह से क्षीण पड़ जाते।
इसलिए किसी भी समस्या को हल करने के लिए व्यक्ति को यह अहसास कराएं कि वह अपनी बुद्धि से हर समस्या को हल कर सकता है। उन्हें केवल समस्या के समाधान करने का जरिया न समझें बल्कि उन्हें पूरी तरह से समस्या से संबंधित कार्य में शामिल कर लें। केवल उच्च पदों पर बैठे या उच्च शिक्षित व्यक्तियों में ही सर्वश्रेष्ठ विचार नहीं आते बल्कि कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के दिमाग में भी श्रेष्ठ विचार आ सकते हैं बशर्ते उन्हें प्रेरित किया जाए और उनकी उस प्रतिभा को बाहर लाने के लिए सकारात्मक स्थितियां उत्पन्न की जाएं।
समस्या से जूझने की समस्या तब अधिक उत्पन्न होती है जब प्रत्येक व्यक्ति केवल अपना हित देखता है। यदि सबके हित का बराबर ध्यान रखा जाए तो समस्या में से भी लाभ प्राप्त किया जा सकता है। यह जीवन का एक अनछुआ पहलू है। जो इस पहलू को छू लेता है, वह अपने जीवन को सुंदर और सफल बना लेता है।


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