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सप्तऋषियों का तप स्थान सतकुंभा तीर्थ

Posted On September - 22 - 2019

तीर्थाटन

पुरुषोत्तम शर्मा
सोनीपत जिले के गन्नौर कस्बे के साथ लगते गांव मियाना खेड़ी गुज्जर स्थित सतकुंभा तीर्थ का महत्व आदिकाल से है। राजा चकवा बैन मान्धाता की राजधानी रहे इस इलाके का इतिहास जितना रोचक है, इसकी धार्मिक मान्यता उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि हजारों साल पुराने इस तीर्थ स्थल पर सप्तऋषियों ने न केवल तपस्या की थी, बल्कि इसका निर्माण और नामकरण भी उनके नाम पर ही हुआ। ऐसा कहा जाता है कि यहां सप्त ऋषियों ने ही सात कुएं खुदवाये और उनके पानी से तालाब भरा। साथ ही इस तालाब में 67 अन्य धार्मिक स्थलों से जल लाकर मिलाया गया। इससे इसका नाम सतकुंभा 68वां तीर्थ पड़ा। ऐसी मान्यता है कि अगर कोई श्रद्धालु लगातार 11 पूर्णिमा या अमावस्या को यहां स्नान करता है, तो उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। पूर्णिमा और अमावस्या के दिन यहां मेले जैसा उत्सव होता है, दूर-दराज से हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं।
गांव मियाना खेड़ी गुज्जर का इतिहास बहुत ही प्राचीन है। करीब 300 ईसा पूर्व मध्यकाल में सोनीपत और मियाना, खिज्जरपुर अहिर, जलालाबाद, बिलंदपुर, खेड़ी गुज्जर आदि काफी बड़े नगर के रूप में विकसित थे (मौजूदा समय में यह सभी गांव हैं)। इन सबको मिलाकर यह राजा चकवा बैन मान्धाता की राजधानी थी। मान्यता है कि उस समय यमुना नदी का बहाव भी यहीं से था।
ऐसा कहा जाता है कि राजा चकवा राजकोष से कोई भी पैसा न लेकर, अपने परिवार का खर्च रस्सी बनाकर व खेतों में खुद हल चलाकर करते थे। उनकी रानी बिंदुमति भी अपने परिवार के लिए पीने का पानी खुद ही भर कर लाती थीं। कहा जाता है कि राजा का इतना प्रताप था कि अन्य सभी राजा उन्हें कर के रूप में सोना भेंट करते थे। इनमें लंका का राजा रावण भी शामिल था।
कहा जाता है कि इस स्थान पर घोर तपस्या करने वाले चुन्कट ऋषि के श्राप से राजा चकवा बैन की सेना और राजधानी का सर्वनाश हो गया। बाद में ऋषि चुन्कट से क्षमा याचना कर राजा हिमालय पर्वत पर तपस्या करने चले गये थे।
खुदाई में मिले थे प्राचीन स्तंभ
गांव मियाना खेड़ी गुज्जर में ऊंचे टीले पर की गई खुदाई में गुर्जर प्रतिहार कालीन 16 स्तंभ मिले हैं। तीर्थ सतकुंभा मंदिर के पीछे लगभग 45 फुट गहरी कुएंनुमा सुरंग भी है। यहां एक प्राचीन शिव मंदिर भी है। उसके उत्तर-पश्चिम में अलग आकार की ईंटें व स्तंभ गवाह हैं कि यह स्थान बेहद प्राचीन है। सन‍् 1891 में लज्जा राम महाराज ने यहां डेरे व मंदिर की स्थापना की एवं सप्तऋषियों द्वारा स्थापित तीर्थ की महिमा को फैलाया। लज्जा राम जी के शिष्य बाबा सीताराम ने इस प्राचीन स्थल पर कई वर्ष तक तप किया। डेरे में ही बाबा सीताराम की समाधि है।

(सभी फोटो : पुरुषोत्तम शर्मा )


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