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श्रद्धा का समर्पण श्राद्ध

Posted On September - 8 - 2019

ज्ञानेन्द्र रावत
हिन्दू धर्म संस्कृति में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है। श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है और श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य ही श्राद्ध कहलाता है। कहा गया है- अंगादंगात‍् सम्भचसि हृदयादधिजायते। आत्मासि पुत्रनामासि स जीव शरद्ःशतम‍्।। यानी पुत्र पिता के अंग से अंग, हृदय से हृदय एवं आत्मा से आत्मा लेकर उत्पन्न होता है। इसलिए पुत्र द्वारा मनःशक्ति से श्रद्धाभाव से किए जाने वाले श्राद्ध से माता-पिता को सद‍्गति मिलती है। कूर्म पुराण में उल्लेख है कि पितर अपने पूर्व गृह यह जानने आते हैं कि उनके कुल, परिवार के लोग उन्हें भुला तो नहीं चुके हैं। यदि उन्हें श्राद्ध के माध्यम से इस पक्ष में याद नहीं किया जाता, तो उन्हें बहुत निराशा और दुख होता है। जो परिजन-संतान अपने परिश्रम से अर्जित धन से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करते हैं, पितर उन्हें दीर्घायु, यश, धन-धान्य, विद्या का आशीर्वाद देकर प्रसन्नतापूर्वक अपने लोक को प्रस्थान करते हैं।
विष्णु पुराण में कहा गया है कि जिनके पास न श्राद्ध करने की क्षमता है, न धन, न सामर्थ्य और न ही सामग्री, वह यदि भक्तिभाव से दोनों भुजाओं को ऊपर उठाकर केवल जलांजलि देकर पितरों को प्रणाम करते हैं, वही पर्याप्त है। इससे ही पितर संतुष्ट हो जाते हैं। उनकी संतुष्टि
के लिए श्रद्धा, सम्मान या आदरभाव ही पर्याप्त है।
मनु व याज्ञवल्क्य जैसे महान मनीषी ऋषियों ने धर्मशास्त्र में श्राद्धों की अनिवार्यता का उल्लेख किया है। उनके अनुसार- भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक श्राद्ध करने से कर्ता पितृऋण से मुक्त होता है। पितर संतुष्ट होते हैं और श्राद्धकर्ता को आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य, मोक्ष व अन्य सुख प्रदान कर उसका व उसके परिवार का कल्याण करते हैं। कहा भी गया है- आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष-सुखानि च। प्रयच्छति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिता।।
योग वशिष्ठ में उल्लेख है कि मृत्यु के बाद जीव अपने बंधु-बांधवों के पिंडदान द्वारा ही अपना शरीर बना हुआ अनुभव करते हैं- ‘आदौमृता वयामिति बध्यन्ते तदनुक्रमात‍्। बंधु पिण्डादिदानेन प्रोत्पन्ना इति वेदिनः।।’
कहा गया है कि मुक्त आत्माओं एवं पितरों के प्रति मनुष्य को वैसा ही श्रद्धाभाव रखना चाहिए, जैसा देवों, प्रजापतियों तथा परमसत्ता के प्रति रहता है। गौरतलब है कि देवों, प्रजापतियों एवं ब्रह्म को तो मनुष्यों की किसी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती, किंतु पितरों को ऐसी आवश्यकता पड़ती है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए मनीषियों ने पितरपूजन एवं श्राद्धकर्म की परंपराएं प्रचलित कीं। याज्ञवल्क्य स्मृति में उत्तरायण में देवताओं और दक्षिणायन में पितरों का प्रभुत्व माना गया है। आश्विन कृष्णपक्ष, जिसमें पितर सर्वाधिक सक्रिय रहते हैं, दक्षिणायन का मध्य भाग होता है।
श्राद्ध की मूल संकल्पना वैदिक दर्शन के कर्मवाद व पुनर्जन्मवाद पर आधारित है। यह सिलसिला पितरों की मुक्ति तक लगातार जारी रहता है। इसलिए उनकी तृप्ति व संतुष्टि के लिए श्राद्ध आवश्यक है। पितृ पक्ष के दौरान यह प्रार्थना करनी चाहिए कि यदि हमारे पूर्वज प्रतीक्षाकाल में हैं, तो उन्हें मोक्ष मिले, वह नया जीवन प्राप्त करें। इस रूप में श्राद्ध की प्रासंगिकता को नकारा नहीं जा सकता।


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