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शिकायतें छोड़ें, खुशी से नाता जोड़ें

Posted On September - 29 - 2019

रिश्ते

दीप्ति अंगरीश
कुछ लोगों की आदत होती हैै बात-बात पर शिकायत करना। हर बात में मीन-मेख, रोना-धोना, चिढ़ना, चिढ़ाना, आलोचना, कुढ़ना ही शामिल होता है। कई बार यह आदत शख्स को शक्की बना देती है। यही नहीं, हर समय अपना और दूसरों का खून जलाने वालों से निकलती नकरात्मक तरंगों से लोग दूरी बना लेते हैं। नतीजतन, अकेलापन और बीमारियां घेर लेती हैं। रिश्ता केवल समाज से परिवार से ही नहीं खुद से, खुद की आदतों से और सेहत से भी रखें।
शिकायत अच्छी भी
यदि आपमें आदतन शिकायत खून में शामिल हो गई है, तो यह आप पर बहुत भारी पड़ेगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शिकायत से दूरी बना लें। हालांकि, कुछ शिकायत अच्छी वाली भी होती है। या यूं कहें कि अच्छी और शिकायत में आपको अंतर स्वयं करना होगा। आपके सामने इलाज के दौरान डाॅक्टर महिला मरीज के साथ अश्लील हरकत करता है, तो यहां आपको शिकायत करनी होगी। यह शिकायत मरीज को इंसाफ दिलाएगी। आपकी काॅलोनी में अवैध तरीकों 6 मंजिला घर बनाया जा रहा है। बिजली से लेकर पानी में चोरी की जा रही है। ऐसे मामले में आपको शिकायत करनी होगी। आपकी शिकायत से समाज का भला होगा।
शिकायत और सेहत
आपको कुछ पसंद नहीं और त्वरित नापसंदी की राय दे दी। यह ठीक है। आखिर पसंद-नापसंद रखने का अधिकार है आपके पास। यदि शिकायत एक लम्हे की है, तो वह नुकसानदायक नहीं। लेकिन इसे आदत नहीं बनाएं। जहां यह आदत आपमें नकरात्मकता से लबरेज करेगी, वहीं सेहत चुरा लेगी। और तो और, आपकी बैड इमेज बनाएगी, जो कई बार रिश्तों से लेकर वर्कप्लेस में हावी हो सकता है। बीते दिनों एक सर्वे में यह सच्चाई निकल कर सामने आई। स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा वर्ष 2016 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, शिकायत करने से हमारे हिप्पोकैम्पस पर असर पड़ सकता है, यह दिमाग का वह हिस्सा है, जो मेमरी व लर्निंग से जुड़ा हुआ है। सोचिए जब आप बेवजह एक ही बात घसीटेंगे या मीन-मेख निकालेंगे या अपने या दूसरे को कोसते रहेंगे, तो सेहत पर कुप्रभाव पड़ेगा ही। और तो और शिकायतें ही हावी रहेंगी। खाना-पीना सब प्रभावित होगा। नतीजतन शिकायतें खून में घुल-मिल जाएंगी, जो बीपी, डिप्रेशन, हार्ट-पेन, माइग्रेन, सांस लेने में दिक्कत आदि का कारण बनेंगी। एक शोध के अनुसार जो लोग कम शिकायती होते हैं, वो ही सफल होते हैं। जब आप शिकायतें नहीं करेंगे और जो जैसा है उसके प्रति शुक्रगुजार होंगे तो तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर कम होगा। और आप हैप्पी-हैप्पी रहेंगे और काम पर बेहतर फोकस कर पाएंगे।
शिकायत के पीछे कई राज़ भी
माना कि त्वरित नराजगी व नापसंदी जताना एक सामान्य प्रकिया है। इसकी आदत के नशेड़ी स्वयं और समाज के लिए घातक है। पर क्या आपने कभी सोचा है कि व्यक्ति इतनी शिकायत क्यों करता है। इसकी प्रमुख वजह है वो स्वयं को तनाव रहित कर रहा होता। हैरत में नहीं पड़िए। ऐसा होता है। जब किसी बात की नापंसदी को गुस्सा हो तो किसी ओर पर निकाल दो। यकीनन आप स्ट्रेस फ्री और रिलैक्स महसूस करेंगे। कई बार शिकायती टट्टू बनने से मिलती है साहनुभूति और लोगों की और तवज्जो। यही नहीं कई बार शिकायतों का पुलिंदा इतना ज्यादा होता है कि वो शिकायत करने वाले की छवि साफ-सुथरी होती है। और अपनी गलतियों को छुपाने का एक तरीका भी होता है अति शिकायत करना।
अपनी मदद आप करें
शिकायत को नामोनिशान मिटाने का कोई फाॅर्मूला नहीं है, लेकिन सेल्फ हेल्प की मदद से कम किया जा सकता है। इसके लिए एक टिप काम करेगी। जब परेशान हों या शिकायतों की बाड़ दिमाग में उफाने मारे, तब एक शिकायत को बोल दें और बाकी सबका मनन करें। एक बोलने से आपका स्ट्रेस लेवल कम होगा और अन्य शिकायतों के मनन से समाधान ज़रूर निकलेगा। इतना ही मनन करें कि आपका समय और ऊर्जा नष्ट नहीं हो। कोशिश करें कि शिकायतों का हल खोज पाएं। जब लगे कि सेल्फ हेल्प नहीं हो पा रही, तब अपने राज़दार की मदद लें। ऐसे में आपका फोकस शिकायतों का हल हो। साथ ही स्वयं को रोज़ाना समझाएं बेफिजूल शिकायतें नहीं करनी हैं।
कैसे पाएं इससे छुटकारा ?
जब कोई किसी भी आदत को छोड़ना चाहता है, तो थोड़ी-बहुत दिक्कत होती है। शिकायत करने की आदत भी ऐसी ही है। विशेषज्ञों का कहना है कि कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, डेविस के एक अध्ययन के अनुसार, जो लोग कृतज्ञता का एटीट्यूड रखते हैं, उनमें तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर कम होता है और वे कम ही व्यग्र या परेशान होते हैं। इसके साथ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जिस पल हम शिकायत करना शुरू करते हैं, हम स्वयं हार मानने वाला एटीट्यूड अपनाने लगते हैं। आपने भी कई बार गौर किया होगा कि अप्रत्यक्ष रूप से हम स्वयं को कहते हैं कि हम स्थिति से निकलने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते।
स्वयं पर अधिक भरोसा
ख्याति प्राप्त क्लीनिकल एंड चाइल्ड साइकोलाॅजिस्ट एवं रिलेशनशिप थेरेपिस्ट डाॅ भावना बर्नी की मानें तो जीवन में एक मौका ऐसा भी आता है जब हम नौकरी का अवसर गंवा देते हैं क्योंकि हमारे मुकाबले कोई बेहतर होता है और वह चुन लिया जाता है। हम रिलेशनशिप से चूक जाते हैं, क्योंकि हम समान वेेबलेंथ के व्यक्ति नहीं थे। हम किसी ड्रेस को छोड़ देते हैं, क्योंकि वह हमारे ऊपर उतना अच्छा नहीं लगता है जितना कि माॅडल पर लगता है। ऐसे कई और उदाहरण हैं, जो हमारे आत्म-सम्मान को कमतर कर सकते हैं। हर इंसान को चाहिए कि वह ‘स्वयं’ की धारणा को समझे। ऐसा जीवन जीना शुरू करें, जो दूसरों का प्रतिबिंब न हो। हमारी सच्ची आत्मा का प्रतिबिंब हो। जब हम स्वयं को बेहतर जान लेंगे, तो किसी दूसरे से हमारी शिकायत न के बराबर होगी।


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