अल-कायदा से जुड़े 3 आतंकवादी ढेर, जाकिर मूसा गिरोह का खात्मा !    एटीएम, रुपये छीनकर भाग रहे बदमाश को लड़की ने दबोचा !    दुष्कर्म के प्रयास में कोचिंग सेंटर का शिक्षक दोषी करार !    सिविल अस्पताल में तोड़फोड़ के बाद हड़ताल !    पीठासीन अधिकारी सहित 3 गिरफ्तार !    ‘या तो गोहाना छोड़ दे नहीं तो गोलियों से भून देंगे’ !    अमेरिका भारत-पाक के बीच सीधी वार्ता का समर्थक !    कुंडू ने की ज्यादा एजेंट बैठाने की मांग !    मनी लांड्रिंग : इकबाल मिर्ची का सहयोगी गिरफ्तार !    छात्रा की याचिका पर एसआईटी, चिन्मयानंद से जवाब तलब !    

विद्यालय जाने की खुशी

Posted On September - 15 - 2019

स्कूल में पहला दिन

विद्या
4 साल की थी मैं तब, मेरे माता-पिता ने मुझे स्कूल में दाखिल करवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। हर दिन घर पर लिखने और पढ़ने का अभ्यास करवाया जाता। इसके अलावा एक छोटा सा ब्लैक बोर्ड, स्लेट और कलर पेंसिल के साथ कुछ कलर बुक्स भी मुझे लाकर दी जाती थी। माता-पिता चाहते थे कि किसी तरह अच्छे स्कूल में बेटी का दाखिला हो जाये।
फिर मार्च 1993 को जब मैं 5 वर्ष की हुई तो वह दिन आ ही गया जब मेरे पेरेंटस मुझे लेकर हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के लॉरेटो कॉनवेंट स्कूल ताराहॉल में लेकर पहुंचे। माता-पिता इस बात से खुश थे कि राजधानी के सबसे पुराने गर्ल्स कॉनवेंट स्कूल में उनकी बेटी को दाखिला मिल रहा है। बहुत दुबली -पतली होने के कारण मेरे अभिभावक मुझे जल्दी स्कूल नहीं भेजना चाहते थे। इसलिये जब मैं स्कूल गई तो मुझे एलकेजी क्लास में दाखिला मिला।
पहले दिन की याद कुछ इस तरह है कि स्कूल की इमारत देखकर मैं इतरा रही थी। रंग- बिरंगी ड्रैस में अपनी उम्र के बच्चों की तरफ इस आस से देख रही थी कि कोई तो आकर मुझसे बात करने की कोशिश करेगा। गुलाबी गालों वाली एक छोटी सी लड़की जिसका नाम िनरोशा था, अपनी कुछ और सहपाठिनों के साथ कैंपस के झूले पर झूल रही थी। माता-पिता जब तक बाकी प्रक्रिया पूरी करते, स्कूल में कार्यरत एक आंटी मुझे उस झूले तक ले गई। बस यहीं से निरोशा के साथ बातचीत और दोस्ती का सिलसिला शुरू हुआ, जो स्कूल के बाद कॉलेज और एक संस्थान में नौकरी करने तक कायम रहा।
इसके बाद मुझे मेरी टीचर से मिलवाया गया। टीचर का नाम था नेहा। पहली ही नज़र में टीचर को देखकर मैं उनकी फैन हो गई। मेरी पहली टीचर जितनी सुंदर थी, उतनी ही मृदुभाषी और सौम्य भी। उन्होंने मुझे प्यार से अपने पास बुलाया और खूब दुलार किया। इतनी आत्मीयता दिखाई कि मैं स्कूल के नाम पर न तो घबराई, न किसी तरह का रोना-धोना किया। माता-पिता की सारी चिंता भी इसी बात से खत्म हो गई कि बेटी स्कूल के अंदर आते ही खुश हो गई। उस दिन मैं कुछ देर कक्षा में बैठकर बस टीचर और बच्चों को निहारती रही। पढ़ाई के नाम पर मुझे बहुत कुछ याद नहीं कि क्लास में कुछ काम भी करवाया गया था। अब हर दिन इसी कौतूहल में उठती कि स्कूल की वैन आ गई होगी, कब स्कूल पहुंचूंगी और अपनी क्लास में बैठूंगी। इसी तरह आगे के कई और साल इसी स्कूल में निकले और 12वीं की पढ़ाई मैंने पूरी की।


Comments Off on विद्यालय जाने की खुशी
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.