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वाहेगुरु  हर सिख के मन में बसा भट्ट कवि का बोला शब्द

Posted On September - 22 - 2019

हरमिंदर कालड़ा
पूरा सिख जगत आज ‘वाहेगुरु’ का नाम लेकर अरदास करता है। लेकिन, जिस भट्ट कवि ने ‘वाहेगुरु’ शब्द सिख जगत की झोली में डाला, उसे भुला-सा दिया गया है। इस भट्ट कवि का नाम था गयंद। उनके अलावा 10 अन्य भट्ट कवियों की बाणी पांचवें गुरु श्री अर्जन देव जी ने 1604 ईस्वी में श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल की थी।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने 1925 में ‘वाहेगुरु’ शब्द को पहली बार अरदास में शामिल किया था। दुनियाभर में सिख संगत आज अपनी हर अरदास में इस शब्द का उच्चारण करती है। इसे हर वक्त सिमरन करने, इसे मन में बसाने पर जोर दिया जाता है। वाहेगुरु शब्द को आज वही रुतबा हासिल है, जो रब, भगवान, अल्लाह, खुदा, परमात्मा आदि को हासिल है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के पन्ना 1389 से 1409 तक 11 भट्ट कवियों की बाणी दर्ज है। इन भट्ट कवियों ने अपनी बाणी में पहले पांच गुरुओं की स्तुति की है। लेकिन, ‘वाहेगुरु’ शब्द सबसे पहले भट्ट कवि गयंद ने ही इस्तेमाल किया, वह भी गुरु रामदास जी की स्तुति में।
आज हम अपने धार्मिक स्थानों पर अलग-अलग गुरु साहिबान, भक्तों के पर्व उत्साह से मनाते हैं। गुरुओं और भक्त कवियों के बारे में काफी खोज-कार्य होने के चलते हमें उनके माता-पिता व परिवार, जन्मस्थान, जन्मतिथि जैसी कई जानकारियां पता हैं। जीवन में वह कहां-कहां गये, इस बारे में भी जानकारी मिलती है, लेकिन यह दुख की बात है कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी व अन्य प्रमुख सिख संस्थाओं को भी यह जानकारी नहीं है कि जब गुरु अर्जन देव जी ने भट्ट कवियों की बाणी गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल की, तब वे कहां रह रहे थे। 11 भट्ट कवियों में से किसी के भी माता-पिता, जन्मतिथि, जन्मस्थान, उनके परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वैसे भट्ट कवियों में से गुरु ग्रंथ साहिब में सबसे ज्यादा बाणी गयंद जी के बड़े भाई कलसहार जी की है।
कुछ समय पहले जब मुझे यह पता चला कि भट्ट गयंद वह पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने गुरु रामदास जी की स्तुति में ‘वाहेगुरु’ शब्द कहा था, तो मैं भट्ट कवियों के बारे में जानने की कोशिश करने लगा। इस सिलसिले में मैंने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व प्रधान प्रो. किरपाल सिंह बडुंगर से फोन पर पूछा, तो उन्होंने कहा कि भट्ट कवियों के बारे में खोज का काम नहीं हुआ है। कई अन्य सिख विद्वानों से भी मैंने पूछा, लेकिन किसी से भी तसल्लीबख़्श जवाब नहीं मिला।
जींद से जुड़ा नाता
जवाब तलाश करते हुए मैंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के पंजाबी विभाग के डॉ. सुखदेव सिंह सिरसा से पूछा तो उन्होंने मुझे एक किताब दी और कहा, ‘इसे देख लें, यदि आपके काम की कोई बात इस में है तो।’ किताब का नाम था ‘ज्ञानी गरजा सिंह दी ऐतिहासिक खोज’। यह किताब पढ़ते हुए मेरी हैरानी की कोई सीमा नहीं रही। मैंने देखा कि ‘वाहेगुरु’ शब्द रचने वाले गयंद के पिता भट्ट चोखा की कुछ रचनाएं इसमें दर्ज हैं। इस किताब में ज्ञानी गरजा सिंह ने बताया है कि ये रचनाएं उन्हें जींद जिले के 2 गांवों- करसिंधु (तहसील सफीदों) और तलोडा (तहसील जींद) की भट्ट बहियों से मिली हैं। गरजा सिंह 1960 से 1977 तक भट्ट कवियों के बारे में विभिन्न जगहों से जानकारी जुटाते रहे। उन्हें पता चला था कि विभिन्न जगहों पर भट्टों के पास ‘भट्टाछरी’ लिपि में लिखी महत्वपूर्ण रचनाएं पड़ी हैं। इन रचनाओं की अहमियत समझते हुए उन्होंने यह लिपि सीखी और अपने जीवन के कई साल इन रचनाओं को संजोने में लगा दिये। उनके देहांत के कई साल बाद 2010 में भाषा विभाग पंजाब के डॉ. गुरमुख सिंह ने संपादन करके किताब प्रकाशित कराई, जिसका नाम है ‘ज्ञानी गरजा सिंह दी ऐतिहासिक खोज’।
20 मई 2019 को मैं जींद जिले के उन दो गांवों में गया, जिनका जिक्र ज्ञानी गरजा सिंह ने किया है। खुशकिस्मती से करसिंधु गांव में मैंने उस घर का पता लगा लिया, जहां ज्ञानी गरजा सिंह कई साल पहले भट्ट बहियों की तलाश में जाते रहे थे। यह घर रिटायर्ड डीएसपी गुरदयाल सिंह का है। 71 वर्षीय गुरदयाल सिंह ने मुझे बताया कि जब ज्ञानी गरचा सिंह उनके पिता के पास घर आया करते थे, तब वह पांचवीं-छठी कक्षा में पढ़ते थे। गुरदयाल सिंह खुद भी भट्ट परिवार में से हैं और गोत्र गौड़ ब्राह्मण है। यह भी पता चला कि तलोडा गांव में रहने वाले भट्ट परिवार भी करसिंधु में ही आकर बस चुके हैं। चार-पांच सौ साल पुरानी भट्ट बहियां वहां मौजूद हैं, पर लिपि जानने वाले 3-4 लाेग ही हैं।


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