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राखीगढ़ी से निकला निष्कर्ष आर्य ही हैं हम

Posted On September - 23 - 2019

राजवंती मान
राखीगढ़ी हरियाणा के हिसार जिले के नारनौंद खंड में सरस्वती तथा दृषद्वती नदियों के शुष्क क्षेत्र में बसा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक गांव है, जहां सिंधु घाटी सभ्यता, जिसमें लगभग 20 लाख वर्ग किलोमीटर में सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब, जम्मू, हरियाणा, राजस्थान, कच्छ-गुजरात और महाराष्ट्र तक की आबादी शामिल थी, के अवशेष प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुए हैं। इसे हड़प्पा सभ्यता के रूप में भी जाना जाता है। यह विश्व की अकेली शहरी और पूरी तरह विकसित सभ्यता थी। पिछले 7 हजार वर्षों का इतिहास समेटे राखीगढ़ी इस सभ्यता के 5 मुख्य शहरों में से एक था, जिसकी आबादी 10 से 50 लाख के बीच हो सकती है। अन्य शहर हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, गनोरीवाला पाकिस्तान में हैं तथा धोलावीरा भारत के कच्छ-गुजरात में है।

राखीगढ़ी के ग्रामीणों को अपने खेतों
में टेराकोटा मोती, हड्डी के टुकड़े, टूटे टेराकोटा की चूड़ियां मिलीं।

मोहनजोदड़ो से भी बड़ी साइट राखीगढ़ी में आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा 1963 में खुदाई शुरू की गई। व्यापक पैमाने पर उत्खनन कार्य 1997-1999 के दौरान और 2014 के बाद किया गया। यहां से प्राक हड़प्पा और परिपक्व हड़प्पा के अनेक प्रमाण मिले हैं, जिनमें दुर्ग-प्राचीर, अन्नागार, सडकें, स्तंभ युक्त वीथिका या मंडप, चबूतरे पर बनी अग्नि-वेदिकाएं मुख्य हैं। राखीगढ़ी के साढ़े 300 हेक्टेयर क्षेत्र में कुल 7 टीले (माउंड) हैं, जिनमें 4 और 5 नंबर टीले के नीचे सबसे बड़ी आबादी होने के प्रमाण मिले हैं। 7 नंबर टीला, जो मुख्य आबादी वाले टीलों से कुछ दूर है, वहां कब्रिस्तान था, जहां से अनेक कंकाल मिले हैं। वसंत शिंदे अपनी उत्खनन रिपोर्ट में कब्रिस्तान से 61 कंकाल निकाले जाने का जिक्र करते हैं।
राखीगढ़ी क्षेत्र की गर्म जलवायु सहायक अनुवांशिक सामग्री को तेजी से नष्ट कर देती है, इसलिए अधिकतर कंकालों से डीएनए प्राप्त नहीं हुआ। लेकिन हाल ही के वर्षों में वैज्ञानिकों ने जान लिया है कि कान की आंतरिक हड्डी में असामान्य रूप से उच्च मात्रा में डीएनए होता है, जिससे उन्हें उपयोगी अनुवांशिकी अनुक्रम का पता लगाने में मदद मिलती है। राखीगढ़ी में मिले 5 हजार साल पुराने कंकाल के डीएनए के नमूनों पर किए गए अध्ययन, जिसका शीर्षक ‘एन एंसियंट हड़प्पन जिनोम लैक्स एन्सेसट्री फ्रॉम स्टेपे पेस्टोरलिस्ट और ईरानी फार्मर्स’ है जिसे साइंटिफिक जर्नल ‘सेल’ में प्रकाशित किया गया है। यह अध्ययन भारत के वरिष्ठ और दक्कन कॉलेज पुणे के प्रोफेसर वसंत शिंदे, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पालेओसाइंस लखनऊ के आनुवंशिकीविद नीरज राय और अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल ऑफ मेडिसिन के आनुवंशिकी विद डेविड रिच द्वारा किया गया है।

राखीगढ़ी गांव में मिले मिट्टी से बने खिलौने।

इस शोध से मुख्यत: 3 बिंदु सामने आये हैं। पहला, यह कंकाल उन लोगों से ताल्लुक रखता है, जो दक्षिण एशियाई लोगों का हिस्सा थे। दूसरा, 12 हजार वर्षों से एशिया का एक ही जीन रहा है। तीसरा, दक्षिण एशिया में किसानी यहां के लोगों द्वारा शुरू की गई, न कि उन लोगों द्वारा जो पश्चिम से आए थे। स्टेपे के पशुचारक देहाती या अनातोलियन और ईरान के किसानों से संबन्ध नहीं मिल पाया। वसंत शिंदे ने शोध में कहा है कि हमने 3 साल के पूरे अध्ययन में भारतीय प्रायद्वीप में फैले किसानों के पूर्वजों के बारे में गहन जांच की, जिससे पता चला कि स्टेपे पशुचारकों और ईरानी किसानों से इनका कोई संबंध है ही नहीं। इसमें आर्यों की घुसपैठ की बात को पूरी तरह नकार दिया गया है। यानी यह खोज भारतीयों की ‘अस्मिता’ से जुड़ी है। अज्ञेय ने ‘आइडेंटिटी’ के लिए हिंदी शब्द ‘अस्मिता’ का इस्तेमाल किया है।

मिट्टी के बर्तन।

सुलझ गई पहेली!
हड़प्पा सभ्यता हमेशा से ही एक पहेली बनी रही है। खासतौर से उत्तर भारतीय आर्य प्रजाति की आदि भूमि के संबंध में विद्वानों में अनेक मतभेद रहे हैं। हालांकि ‘आर्य’ शब्द ऋग्वेद में छत्तीसों बार इस्तेमाल हुआ है। सम्भवतः उन ‘श्रेष्ठ’ के लिए, जो इस सभ्यता के संस्थापक उन्नायक थे। लेकिन अंग्रेज व यूरोपियन विद्वानों और उनके सुर में सुर मिलाते भारतीय विद्वानों ने जानबूझकर भारतीय आर्यों को बाहर से आया मानते हुए ‘आर्यन प्रवाह सिद्धांत’ को सही साबित कर दिया। इस सिद्धांत का प्रतिपादन करके अंग्रेज और यूरोपियन भारतीयों में यह भावना भरना चाहते थे कि भारतीय लोग पहले से ही गुलाम हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर भारतीयों (आर्य) तथा दक्षिण भारतीयों (द्रविड़) में फूट डालना भी इसके पीछे मकसद रहा। मैक्समूलर, विलियम हंटर और बेबिंगटन मैकाले के कारण भारत के इतिहास का अत्यधिक विकृतीकरण हुआ है।

हड़प्पाकालीन मुहर।

इन्होंने भारतीयों के बारे में अनेक बातें इतिहास में प्रचारित कर दीं, जैसे कि भारतीय इतिहास की शुरुआत सिंधु घाटी की सभ्यता से होती है। दूसरी, सिंधु घाटी के लोग द्रविड़ थे, अर्थात वह आर्य नहीं थे। तीसरी, आर्यों ने बाहर से आकर सिंधु सभ्यता को नष्ट करके अपना राज्य स्थापित कर लिया। चौथी, आर्याें और दस्युओं के निरंतर झगड़े चलते रहे। लेकिन आर्य कहां से आए? इसका कोई सटीक जवाब किसी इतिहासकार के पास नहीं है। कोई मध्य एशिया, कोई साइबेरिया, कोई मंगोलिया, कोई ट्रांस काकेसिया तो कोई स्कैंडिनेविया से आये बताता रहा। भारत की सरकारी किताबों में आर्यों के आगमन को ‘आर्यन इनवेजन थ्योरी’ कहा है। इन किताबों में आर्यों को घुमंतू या कबिलाई बताया जाता है। यानी ये लोग ऐसे खानाबदोश थे, जिनके पास वेद थे, खुद की भाषा थी, उस भाषा की लिपि भी थी। तात्पर्य यह है कि वे पढ़े-लिखे सभ्य और सुसंस्कृत खानाबदोश थे। यह दुनिया का सबसे अनोखा उदाहरण है कि खानाबदोश लोग नगरीय सभ्यता से ज्यादा सभ्य थे। यह थ्योरी जानबूझकर गढ़ी गई थी या फिर उनकी जानकारी अधूरी थी।

राखीगढ़ी गांव में खुदाई के दौरान मिले सामान की प्रदर्शनी में रखा मिट्टी का घड़ा व अन्य सामान

द वंडर दैट वाज इंडिया
जेम्स मिल, मैकाले और विंसेंट स्मिथ द्वारा भारत के बारे में गढ़ी गयी नकारात्मक छवियों को ध्वस्त करती आर्थर लेवेलिन बाशम की पुस्तक ‘द वंडर दैट वाज इंडिया’ भारत के प्राचीन इतिहास का वि-औपनिवेशीकरण करती है। इसमें भारतीयों द्वारा विश्व को दिए गए सांस्कृतिक अवदान की चर्चा है। इसकी गणना प्रसिद्ध इतिहासकार आरसी मजूमदार रचित ‘हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ इंडियन पीपुल के साथ की जाती है। आर्यन प्रवास सिद्धांत को बड़ी चुनौती वर्ष 1921 में मिली, जब सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष मिले। जब इस थ्योरी पर सवाल खड़ा हो गया तो इतिहासकारों ने धीरे-धीरे प्रचारित करना शुरू किया कि हिंदू लोग द्रविड़ थे और वैदिक लोग आर्य थे। सिंधु सभ्यता आर्यों के आगमन से पहले की है और आर्यों ने इसे नष्ट कर दिया। लेकिन राखीगढ़ी से मिले कंकाल की डीएनए खोज पुरानी अवधारणाओं जैसे ‘आर्यन प्रवाह सिद्धांत’ तथा आर्य और द्रविड़ को अलग-अलग मानने वाले सिद्धांतों को ध्वस्त करके प्राचीन काल के इतिहास की पुनर्स्थापना करती है, जिसके आधार पर इतिहास का पुनर्लेखन होना चाहिये।
आधुनिक भारतीयों को प्राचीन सभ्यता से जोड़ता है 4500 वर्ष पुराने कंकाल का डीएनए
हरियाणा के राखीगढ़ी से प्राप्त कंकाल, जिसके डीएनए के संबंध में यह संभावना अधिक है कि यह एक महिला का हो सकता है, क्योंकि उस कंकाल के पास दर्जनों चीनी मिट्टी के कटोरे, बरतन, फूलदान जैसी चीजें भी मिली हैं। पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, वह 2800 और 2300 ईसा पूर्व के बीच कुछ समय तक जीवित रही होगी। उसकी आनुवांशिकी का 11 अन्य व्यक्तियों का डीएनए के साथ मिलान किया गया, जो ईरान और तुर्कमेनिस्तान जगहों पर पाए गए थे। इससे निष्कर्ष निकाला गया है कि सिंधु सभ्यता के लोग उन क्षेत्रों तक जाकर व्यापार करते थे। उन 11 व्यक्तियों का डीएनए वहां दफन अन्य कंकालों से नहीं मिलता। डेविड रिच और उसकी टीम के अनुसार, ये यहां से गये हुए प्रवासी थे।
हम आर्यों की संतान!
मैं (लेखिका) जनवरी 2018 में ब्रिटेन से हिंदुस्तान आने के लिए सेंट्रल लंदन से हीथ्रो एअरपोर्ट के लिए किराये की जिस गाड़ी में सवार हुई उस मर्सिडीज बेंज गाड़ी का ड्राइवर फवाद तुर्की का रहने वाला है। यह उसने मुझे गाड़ी में बैठते ही बता दिया और मुझ से भी पूछ लिया कि मैं कहां की हूं? मैं अपने विचारों की ताल-तलैया में गोते लगा रही थी। पुन: पूछने पर अपनी विचार बेल को तोड़ते हुए मैंने उसे बताया। मेरे ‘इंडिया’ बताने पर वह बहुत खुश हुआ और कहने लगा, हमारे और भारतीयों के चेहरे-मोहरे मिलते-जुलते हैं, क्योंकि हम आर्यों की संतान हैं। हम उसी आर्य संस्कृति के लोग हैं, जो ईरान से पश्चिम में जर्मनी और पूर्व में भारत तक फैली। मैंने बहुत सहमत न होते हुए भी हां में हां मिला दी, क्योंकि हम भारतीयों का मानना है कि आर्य भारत से ईरान और जर्मनी तक गये हैं। लेकिन फवाद का मानना है, ‘तुर्की-ईरान से पूर्व और पश्चिम में गये हैं।

-लेखिका की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक –‘थेम्स तरल इतिहास है’ से उद्धृत अंश।


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