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बसपा की माया समझ न पाय कोय

Posted On September - 11 - 2019

राजकुमार सिंह

दरअसल

वैसे तो राजनीति में पॉवर, पैसा और परिवार के अलावा सभी रिश्ते बेमानी हैं, लेकिन गठबंधन राजनीति की मजबूरियां ही ऐसी हैं कि चाहे-अनचाहे रिश्तों की गांठें भी बांधनी पड़ती हैं। जाहिर है, मजबूरी और हानि-लाभ के गुणा-भाग से बनने वाले रिश्ते लंबे नहीं चलते। वैसे तो सत्ता राजनीति के इस खेल में कमोबेश सभी दल एक जैसे हैं, लेकिन दमित-वंचित वर्ग यानी बहुजन समाज के कल्याण के नाम पर राजनीति करने वाली बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा की सुप्रीमो मायावती की बात ही निराली है। राजनीतिक गलियारों में बहन जी के नाम से लोकप्रिय मायावती का राजनीतिक अनुभव भले ही ज्यादा न हो, लेकिन जोड़तोड़ में हासिल महारत के बल पर वह बड़े-बड़े दिग्गजों को मात देती रही हैं। वैसे तो राजनीति और विश्वास अब परस्पर विरोधी शब्द बनकर रह गये हैं, लेकिन मायावती आधुनिक भारतीय राजनीति की शायद सबसे अविश्वसनीय किरदार कही जा सकती हैं। अपने राजनीतिक दांवपेचों से नवीनतम पटकनी उन्होंने नवगठित जननायक जनता पार्टी यानी जेजेपी के नेता दुष्यंत चौटाला को दी है।
चौटाला परिवार में सत्ता संघर्ष के चलते इंडियन नेशनल लोकदल यानी इनेलो से अलग जेजेपी बनाने वाले अजय सिंह चौटाला के बड़े बेटे दुष्यंत बसपा से गठबंधन से उत्साहित होकर हरियाणा भर में दोनों दलों के कार्यकर्ताओं की संयुक्त बैठकें कर रहे थे कि अचानक ही मायावती ने ट्वीट के जरिये उन्हें जोर का झटका धीरे से दे दिया। पहले हुई बातचीत और बाद में दुष्यंत की प्रतिक्रिया से लगता है कि उन्होंने सपने में भी इसकी कल्पना नहीं की होगी कि यह गठबंधन इतना अल्पजीवी होगा, लेकिन माया की माया तो अपरंपार है। पिछले महीने 11 अगस्त को ही यह गठबंधन हुआ था, जिसमें हरियाणा विधानसभा की 50 सीटों पर जेजेपी और शेष 40 सीटों पर बसपा को चुनाव लड़ना था। गठबंधन की घोषणा के समय दुष्यंत के साथ बसपा महासचिव सतीश मिश्रा भी मौजूद थे, जिन्हें मायावती का विश्वस्त माना जाता है। इसके बावजूद गठबंधन महज 27 दिन चल पाया। गठबंधन तोड़ने का ऐलान करने वाले ट्वीट में मायावती ने कहा कि बसपा राष्ट्रीय पार्टी है, जबकि राजनीतिक अनुभवहीन जेजेपी नयी पार्टी है, पर 11 अगस्त को भी तो दोनों दलों की यही स्थिति थी? फिर अचानक 27 दिन में ऐसा क्या बदला कि गठबंधन टूट गया और बसपा ने सभी 90 सीटों पर चुनाव लड़ने का राग पुन: अलापा?
हमारे राजनेता सवालों के जवाब देने के आदी नहीं। असहज सवाल तो फिर उन्हें नागवार ही गुजरते हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि जेजेपी-बसपा गठबंधन टूटने पर राजनीतिक गलियारों में अटकलें चलती रहें। एक स्वाभाविक अटकल तो यही चली कि अब बसपा का कांग्रेस से गठबंधन होगा। रविवार शाम हरियाणा कांग्रेस की नयी अध्यक्ष सैलजा और चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा की मायावती से दिल्ली में मुलाकात की खबर भी फैल गयी, जिसका अगले दिन खंडन भी हो गया। हमारे यहां सत्ता केंद्रित राजनीति का चरित्र इतना अविश्वसनीय हो गया है कि इस खंडन के बावजूद कुछ भी संभव है, भले ही वह अतार्किक और अव्यावहारिक ही क्यों न हो। दरअसल राजनीति ही क्यों, अब तो जीवन के हर क्षेत्र में तार्किकता और व्यावहारिकता के लिए जगह खत्म होती जा रही है। फिलहाल हम राजनीति की ही बात करें तो भला अनुसूचित जाति की प्रदेश अध्यक्ष वाली कांग्रेस के साथ गठबंधन कर मायावती हरियाणा में अपनी राजनीतिक जमीन क्यों कमजोर करेंगी? हरियाणा ही क्यों, जिस उत्तर प्रदेश में मायावती तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बनीं, वहां भी बसपा का जनाधार कांग्रेस से छीना हुआ ही है। इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में गठबंधन के नाम पर बसपा द्वारा कांग्रेस को अपमानित किया जाना अकारण नहीं था। बसपा अच्छी तरह जानती है कि कांग्रेस के पुनरुत्थान का अर्थ अंतत: उसका पराभव होगा। दरअसल यह बात सपा-राजद जैसे अन्य क्षेत्रीय दल भी जानते हैं, जो आज कांग्रेस से छीनी गयी राजनीतिक जमीन पर खड़े हैं। इसीलिए तात्कालिक मजबूरीवश कभी कहीं गठबंधन करना भी पड़ जाये तो ये दल कांग्रेस को उसके पैरों पर खड़ा हरगिज नहीं होने देंगे।
जनाधार के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक चरित्र की दृष्टि से देखें तो उत्तर प्रदेश में पहला सपा-बसपा गठबंधन तार्किक भी था और व्यावहारिक भी, लेकिन मुलायम सिंह यादव की कुटिलता और मायावती की सत्ता आतुरता आत्मघाती साबित हुई। मुलायम की साजिशों से माया के बचाव में भाजपा ने अपने लिए मौका तलाश लिया। बेशक भाजपा ने ही मीराबाई गेस्ट हाउस में मुलायम समर्थकों से माया को बचाया, और फिर लालजी टंडन-मायावती बहन-भाई बन गये। भाजपा के समर्थन से माया मुख्यमंत्री भी बनीं, पर रिश्ता लंबा नहीं चला। और फिर जैसा होता है, मुलायम-माया की तरह भाजपा-बसपा के रिश्ते में भी खटास आती गयी। यह अलग बात है कि अलगाव के बावजूद बाद में बसपा और सपा भी अपने बूते उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब हुए, पर अंतत: उनकी जातिवादी बाहुबली राजनीति ने भाजपा की सत्ता में जबरदस्त वापसी का ही मार्ग प्रशस्त किया। 23 साल बाद फिर सत्ता ही नहीं, बल्कि अस्तित्व की मजबूरी ने सपा-बसपा को एक साथ आने को मजबूर किया, लेकिन इस बार गठबंधन की नैया किनारे नहीं लग पायी। कारण बहुत साफ था कि सत्ता स्वार्थवश बुआ मायावती और भतीजे अखिलेश यादव ने तो गिले-शिकवे भुला दिये, पर दो दशकों से एक-दूसरे से लड़ते रहे इन दोनों के समर्थकों के लिए यह इतना आसान नहीं था, जिन्होंने जान-मान का नुकसान भी झेला है। हालांकि गठबंधन बसपा के लिए घाटे का सौदा नहीं रहा और वह लोकसभा में 2014 के शून्य से 2019 में 10 सीटों पर पहुंच गयी, लेकिन मायावती ने बसपा को यादव मत ट्रांसफर न होने का ठीकरा अखिलेश के सिर फोड़ते हुए गठबंधन तोड़ दिया। इसमें दो राय नहीं कि अखिलेश और उनकी पत्नी डिंपल ने बुआ मायावती को मान-सम्मान देने में कसर नहीं छोड़ी, पर सत्ता के इस खेल में अंतत: रिश्ते नहीं, सत्ता की माया ही निर्णायक साबित होती है, फिर चाहे वह पर्दे पर हो या पर्दे के पीछे।

राजकुमार सिंह

वापस हरियाणा की ओर लौटते हैं। गठबंधन से उत्साहित दुष्यंत तो जेजेपी-बसपा के बीच वैचारिक समानता साबित करने की कवायद में अपने पड़दादा चौधरी देवीलाल और बसपा संस्थापक कांशीराम तक इतिहास में चले गये, लेकिन शायद उन्होंने इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा। जेजेपी से पहले बसपा ने इनेलो से गठबंधन किया था। ओमप्रकाश चौटाला और अजय सिंह चौटाला के जेबीटी शिक्षक भर्ती घोटाले में जेल चले जाने के बाद इनेलो की कमान संभाल रहे अभय सिंह चौटाला ने भी बसपा से गठबंधन को भाई-बहन का रिश्ता करार दिया था, लेकिन चौटाला परिवार और इनेलो में टूट तथा जींद उपचुनाव में शर्मनाक पराजय के बाद मायावती ने गठबंधन तोड़ने में देर नहीं लगायी। अगर गठबंधन की बुनियाद वैचारिक थी और उद्देश्य राजनीतिक-सामाजिक बदलाव तो फिर किसी पार्टी या परिवार में टूट से उस पर कोई असर क्यों पड़ना चाहिए? फिर वह कौन-सी विचारधारा है, जो 2014 में कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस से मेल खाती है तो फिर इनेलो से भी मेल खा जाती है? इनेलो से गठबंधन टूटने के बाद वह विचारधारा भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी की लोसुपा से मेल खाती है तो लोकसभा चुनाव संपन्न होते ही जेजेपी में उसे वैचारिक समानता नजर आने लगती है? कांग्रेस से अब गठबंधन होगा या नहीं, यह तो समय ही बतायेगा, लेकिन अतीत में हो तो चुका है। दरअसल यह सवाल अब क्विज में पूछने लायक है कि हरियाणा में ऐसा कौन–सा दल है, जिसके साथ बसपा का गठबंधन होकर टूटा नहीं?

journalistrksingh@gmail.com


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