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बड़ा हनुमान मंदिर, यहां बच्चे बनते हैं लंगूर

Posted On September - 29 - 2019

दुर्गेश कुमार मिश्र
अमृतसर में दुर्ग्याणा मंदिर के साथ ही बड़ा हनुमान मंदिर है। इस मंदिर परिसर में बरगद का एक पेड़ है। कहा जाता है कि लव-कुश ने हनुमान जी को पकड़ कर इसी पेड़ में बांध दिया था। मान्यता है कि यह पेड़ और यहां प्रतिष्ठित स्वयंभू हनुमान की प्रतिमा उसी समय से है। इसी मान्यता के चलते अाश्विन नवरात्र में यहां लंगूर मेला लगता है। दस दिन के इस मेले में बच्चे लंगूर बनते हैं। बच्चों को लंगूर बनाने के पीछे मान्यता है कि जिन दंपति को संतान नहीं होती, वह बड़ा हनुमान मंदिर में आकर मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर वे अपने बच्चे को लंगूर बनाते हैं।
बच्चों काे नवरात्र के पहले दिन सुबह दुर्ग्याणा मंदिर लाया जाता है। यहां सरोवर में स्नान के बाद उन्हें लाल कपड़े पहनाये जाते हैं, जिन्हें ‘लंगूर बाना’ कहते हैं। सिंदूर का तिलक लगाया जाता है और बड़ा हनुमान मंदिर में माथा टेका जाता है। लंगूर बनने वालों में शिशु से लेकर किशोर उम्र के बच्चे भी हो सकते हैं। जबकि, इससे बड़ी उम्र के बच्चे बजरंगी बनते हैं। ढोल, नगाड़ों के साथ नाचते-गाते ये बच्चे दस दिन तक सुबह-शाम बड़ा हनुमान मंदिर तक जाते हैं।
मंदिर प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष रमेश चंद्र शर्मा कहते हैं कि अाश्विन माह के नवरात्र में प्रति वर्ष लगने वाले लंगूरों के मेले में शामिल होने देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं और अपने बच्चों को लंगूर बनाते हैं। शर्मा के मुताबिक इस वर्ष दस हजार बच्चों के लंगूर और बजरंगी बनने की उम्मीद है। मंदिर कमेटी की तरफ से हर तरह के प्रबंध पूरे कर लिए गये हैं, चाहे वह सुरक्षा से जुड़े हों या फिर लंगूरों के रहने-खाने का प्रबंध। उन्होंने कहा इस बार बजरंगियों के लिए कुछ गाइडलाइन जारी की गई हैं, जिनके मुताबिक 15 से कम आयु का बच्चा बजरंगी सेना में शामिल नहीं किया जाएगा। जबकि, लंगूर कोई भी बन सकता है।
दुकानदारों, ढोल वालों को भी रहता है इंतजार : लंगूर बनने वाले बच्चों के लिए दुर्ग्याणा मंदिर के आसपास के दुकानदार नवरात्र शुरू होने से करीब एक माह पहले ही लंगूरी बाने तैयार करने में जुट जाते हैं। कुछ यही हाल ढोल वालों का भी होता है। यहां के दुकानदारों का कहना है कि उन्हें पूरे साल लंगूरों के मेले का इंतजार रहता है। पूरे दस दिन तक यह तीर्थ ढोल और राम नाम से गुलजार रहता है। लंगूर मेले से एक तरफ जहां लोगों की आस्था जुड़ी होती है, वहीं यहां के लोगों को रोजगार भी मिलता है।


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