बिजली के रेट घटाने की तैयारी !    गोली चला ढाई लाख रुपए लूट ले गए बदमाश !    दुबई में भारतीय ने लॉटरी में 40 लाख और कार जीती !    जेएनयू छात्र संघ ने हॉस्टल फीस बढ़ोतरी को हाईकोर्ट में चुनौती दी !    टाइटैनिक मलबे को सहेजेंगे अमेरिका और ब्रिटेन !    सबरीमाला के कपाट बंद !    नेपाल में 8 भारतीय पर्यटकों की मौत !    रूसी हवाई हमले में 23 सीरियाई लोगों की मौत !    एकदा !    नडाल दूसरे दौर में, शारापोवा बाहर !    

फ्लैशबैक

Posted On September - 21 - 2019

हिंदी फीचर फिल्म : गंगा-जमुना

शारा
डाकुओं के जीवन पर बनी क्राइम जोनर की यह फिल्म दिलीप कुमार अभिनीत अब तक की तमाम फिल्मों में से सर्वश्रेष्ठ कही जा सकती है। निर्माण के बाद छह माह विलम्ब से, 1961 में रिलीज इस फिल्म को प्रोड्यूस भी दिलीप कुमार ने फिल्मीस्तान के बैनर तले किया था। उन्होंने ही पटकथा लिखी थी और नेपथ्य से आवाज भी उन्हीं की थी। सिर्फ निर्देशन नितिन बोस का था। नितिन बोस भी दिलीप कुमार की मानिंद तब बाम्बे टॉकीज के लिए काम करते थे। जब बाम्बे टॉकीज दोफाड़ हुआ तो नितिन बोस भी फिल्मीस्तान की अग्रणी टीम में थे। फिल्म में जो ठेठ ग्राम्य परिवेश दिखाया गया है, उससे कहीं-कहीं सत्यजीत रे की डाक्यूमेंटरी फिल्मों का भान होता है। दर्शकों को ऐसा लगना लाजिमी है क्योंकि सत्यजीत रे नितिन बोस की बहन का लड़का है और बाम्बे टॉकीज में उन्होंने नितिन बोस से ही ट्रेनिंग ली थी। ठेठ ग्रामीण अंचल के माहौल के साथ लगी खड़ी बोली, अवधी भाषा के छौंक से दर्शकों ने स्वयं को फिल्म के और नजदीक पाया। देसी स्टाइल से धोती पहने जब दिलीप कुमार ‘नैन लड़ी जई हैं’ गाते हैं तो उनका किरदार से तारतम्य देखते ही बनता है। बहरहाल, इस फिल्म ने देश-विदेश के सिनेमा हॉलों में खचाखच भीड़ बटोरी। खासकर सोवियन यूनियन में। इन दशकों में जब किसी भी फिल्म की कमाई बामुश्किल लाखों तक पहुंचती थी, इसने 11.27 करोड़ कमाए। डाकुओं के जीवन पर आधारित इस फिल्म ने बाद में ऐसी फिल्मों के लिए ट्रेंड सैट किया। सलीम-जावेद ने शोले, दीवार आदि फिल्मों की रचना इसी फिल्म को मुख्य रखकर की। रिलीज होते ही यह फिल्मफेयर की नौ कैटेगरी में से 7 के लिए नामांकित हो गयी। 25वें बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड्स में पुरस्कार झटकने वाली सबसे बड़ी फिल्म साबित हुई। रही-सही पूर्ति इसके संगीत ने पूरी कर दी। मुगले आज़म के लिए संगीत देने वाले नौशाद ने क्या अमर धुनें तैयार की हैं? वैजयंती माला द्वारा गाया ‘ढूंढो ढूंढो रे बालमा’ या ‘दो हंसों का जोड़ा बिछुड़ गयो’ सिचुएशन का विजन दिखाने के लिए काफी है। इसी फिल्म का गाना ‘इंसाफ की डगर पे’ आज भी देशभक्ति के गानों में टॉप 10 पर आता है। दिलीप कुमार के साथ वैजयंती माला की ऑन स्क्रीन कैमिस्ट्री खूब है। फ्लैश बैक के दर्शकों ने बाद में इस जोड़ी को ‘नया दौर’ फिल्म में भी देखा होगा, फिल्म की कामयाबी की गारंटी थी यह जोड़ी। गांव की गंवार छोरी ‘धन्नो’ (वैजयंती माला) के किरदार को मुख्य रखकर ‘शोले’ फिल्म की बसंती का किरदार गढ़ा गया। फिल्म फेयर से उच्चकोटि के अभिनय हेतु मिलने वाला पुरस्कार दूसरा पुरस्कार था। हालांकि, उन्हें ऐसे कई पुरस्कार बाद में भी मिले लेकिन अगर फिल्म समीक्षा के नजरिये से देखें तो इस फिल्म में उनका अभिनय सर्वोत्कृष्ट था। वह बॉलीवुड की पहली ऐसी हीरोइन हैं, जिन्हें सुपरस्टार से नवाजा गया। वह सांसद भी रह चुकी हैं तथा अपने जमाने में बढ़िया गोल्फर भी थीं। इस फिल्म में दिलीप कुमार के जो भाई बने हैं, वह असल जिंदगी में भी भाई हैं। नासिर खान नामक इस चेहरे को बाद में दर्शकों ने कम ही फिल्मों में देखा। मुगले आज़म के बाद बॉक्स ऑफिस पर भीड़ बटोरने वाली यह ऐसी पहली फिल्म थी, जिसने फिल्म समीक्षकों को भी अपने पक्ष में लिखने पर मजबूर कर दिया। 1970 के बाद बनी देश की सामाजिक तथा सियासी विषय पर बनी फिल्मों में अमिताभ बच्चन ने जो लहजा तथा एंग्रीमैन की जो छवि हासिल की, वह दिलीप कुमार की इसी फिल्म से प्रेरित थी।
कहानी डाकू विषय पर बनी है। हालांकि, कहानी में कोई खास सस्पेंस नहीं है लेकिन निर्देशन में जो पकड़ है, वही इस फिल्म को ‘मदर इंडिया’ के बाद भारतीय सिनेमा की प्रतिनिधि फिल्म के रूप में स्थापित करती है। गोविन्दी (लीला चिटनिस) अपने दो बेटों गंगाराम तथा जुमनाराम के साथ हरिपुर गांव में रहती है। गंगाराम (दिलीप कुमार) जमींदार के घर में काम करती गोविन्दी का हाथ बंटाता है ताकि पढ़ाई में होशियार छोटे भाई जमुनाराम को खूब अच्छी तालीम दिला सके। तभी जमींदार हरिराम गोविन्दी पर चोरी का इल्जाम लगा देता है। पुलिस उसके घर की तलाशी लेने जाती है तो चोरी का सबूत मिलने पर उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है। सारा गांव गोविन्दी की जमानत देने थाने पहुंचता है। गोविन्दी रिहा हो जाती है लेकिन मारे शर्म के अपनी जान दे देती है। एक दिन जमींदार हरिराम के शिकंजे से धन्नो (वैजयंती माला) को छुड़ाने के फलस्वरूप हरिराम खुन्नस में आकर गंगाराम पर चोरी का आरोप लगाता है। अब पुलिस की पकड़ में आने की बजाय वह डाकुओं का जीवन चुन लेता है। उसके साथ उसकी प्रेमिका धन्नो भी आ मिलती है। थाने में नये स्टेशन प्रमुख की नियुक्ति होती है। वह कोई और नहीं, बल्कि गंगा का छोटा भाई जमुना ही है। अब दोनों भाइयों के बीच फर्ज और जज्बातों की लड़ाई चलती है। अंत में गंगा पुलिस अफसर भाई (फर्ज) के हाथों जान दे देता है। फर्ज रिश्तों पर हावी हो जाता है। यही निर्देशक व कहानीकार दिखाना चाहता है।
गीत
दगाबाज तोरी बतियां : लता मंगेशकर
ढूंढो ढूंढो रे बालमा : लता मंगेशकर
दो हंसों का जोड़ा : लता मंगेशकर
झनन घूंघर बाजे : लता मंगेशकर
नैन लड़ जई हैं : लता मंगेशकर
ओ छलिया रे छलिया : मोहम्मद रफी, आशा भोसले
तोरा मन बड़ा पापी : आशा भोसले
इन्साफ की डगर पे : हेमन्त कुमार
निर्माण टीम
निर्देशक : नितिन बोस
प्रोड्यूसर : दिलीप कुमार
मूलकथा, पटकथा : दिलीप कुमार
संवाद लेखन : वजाहत मिर्जा
गीतकार : शकील बदायूंनी
संगीतकार : नौशाद
सिनेमैटोग्राफी : वी. बाबा साहिब
संपादन : ऋषिकेश मुखर्जी
सितारे : दिलीप कुमार, वैजयन्ती माला, नासिर खान, कन्हैया लाल, हेलेन, लीला चिटनिस।


Comments Off on फ्लैशबैक
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.