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प्याज का राज

Posted On September - 30 - 2019

50000 टन प्याज का बफर स्टाक था सरकार के पास।
उसमें से 15000 टन का इस्तेमाल वह कर चुकी है
35000 टन का स्टाक अभी और है सरकार के पास।
इसका इस्तेमाल करके प्याज के भाव कम किये जा सकते हैं

आलोक पुराणिक
जून 2019 में प्याज के रिटेल भाव दिल्ली में 26 रुपये किलो थे, जो सितंबर 2019 में बढ़कर 60 रुपये किलो तक चले गये। तीन महीनों में रिटेल भाव दोगुने से भी ज्यादा हो चुके हैं। यह हाल सिर्फ दिल्ली का नहीं है, पंजाब, हरियाणा से लेकर तेलंगाना तक मामला यही है। प्याज के भाव लगातार बढ़ रहे हैं। दिल्ली सरकार ने तय किया है कि 23 रुपये 90 पैसे प्रति किलो यानी करीब 24 रुपये प्रति किलो के हिसाब से जनता को प्याज बेचा जायेगा। प्याज बेचना जरूरी है, और सस्ता प्याज बेचना बहुत जरूरी है, वरना राजनीतिक दुकानों के उठने का अंदेशा हो जाता है। प्याज बहुत राजनीतिक आइटम है। प्याज रबी की फसल में भी होता है और खरीफ की फसल में भी होता है। देश की कुल प्याज पैदावार का करीब 60 प्रतिशत रबी में होता है। यही प्याज अक्तूबर तक बाजार में चलता है, इसके बाद नवंबर में खरीफ का प्याज आना शुरू होता है। इस बार भारी बारिश बाढ़ के हालात के चलते प्याज की आपूर्ति पर असर पड़ा है। आपूर्ति कम होने या आपूर्ति कम होने की आशंका का ही मतलब है कि भाव ऊपर जायेंगे। भावों ने ऊपर जाना शुरू कर दिया है।
भाव ऊपर जा रहे हैं, तो सरकारें चिंतित हैं। केंद्र सरकार की अलग चिंता है, राज्य सरकारों की अलग चिंताएं हैं। खासकर हरियाणा, महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव हैं और दिल्ली में आने वाले हैं। यहां अलग तरह की राजनीतिक चिंताएं हैं।
प्याज आमतौर पर भारतीय खाने का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तमाम टीवी चैनल लगातार कवरेज दिखाकर इसे और खास बना देते हैं। लगातार टीवी चैनलों पर कवरेज आती रहती है कि प्याज खरीदने के लिए लाइन इतनी लंबी है और फलां मुख्यमंत्री ने सस्ता प्याज बेचने की घोषणा की है। प्याज केंद्रित राजनीति के परिणाम और दुष्परिणामों से भारत के अधिकांश राजनीतिक दल वाकिफ हैं, इसलिए प्याज को लेकर कोई भी राजनीतिक दल सुस्त नहीं दिखना चाहता, खासकर उन राज्यों में तो बिलकुल नहीं, जहां विधानसभा चुनाव सामने हैं।
नीति आयोग के सदस्य और कृषि के विशेषज्ञ रमेश चंद ने इस मसले पर कहा है कि सरकार के पास 50 हजार टन का बफर स्टाक था। इसमें से 15000 टन का प्रयोग हो चुका है यानी अब करीब 35000 टन का स्टाक और है, इसका इस्तेमाल करके प्याज के भाव कम किये जा सकते हैं। रमेश चंद को उम्मीद है कि नवंबर में खरीफ की फसल आने के बाद प्याज के भाव फिर सामान्य स्तर पर आ जायेंगे।
गौरतलब है कि प्याज जैसी सब्जियों को उगाने वाले किसानों के जोखिम का स्तर धान और गेहूं उगाने वाले किसानों के जोखिम से ज्यादा होता है। धान और गेहूं के मामले में तो न्यूनतम समर्थन मूल्य का सरकारी प्रावधान होता है, लेकिन प्याज के मामले में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता। यानी प्याज का न्यूनतम मूल्य क्या होगा, यह कोई तय नहीं कर सकता। सिर्फ बाजार ही तय करता है। बाजार तय करता है, ऐसा कहना भी पूरा सच नहीं है। बाजार में प्याज के भाव बहुत ऊपर न चले जायें, यह सुनिश्चित करने का काम तमाम सरकारें करती हैं। यानी मोटे तौर पर यह माना जा सकता है कि जब तमाम वजहों से प्याज के भाव गिर रहे हों तो सरकारों को ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं होती। परेशानी सिर्फ किसान को हो रही होती है और आम जनता बतौर ग्राहक खुश ही रहती है, लेकिन जैसे ही प्याज के भाव ऊपर जाने लगते हैं, सरकारों के कान खड़े हो जाते हैं और वह प्याज के भावों को नीचे गिराने में जुट जाती हैं। यानी यूं समझा जाना चाहिए कि प्याज के भाव गिरें तो सरकारों को चिंता नहीं होती, प्याज के भाव बढ़ें तो ही सरकारें चिंतित होती हैं। इसलिए प्याज के किसानों को सरकारों की तरफ से बहुत सकारात्मक कदमों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। तमाम सरकारी कदम आमतौर पर प्याज के किसान के खिलाफ ही जाते हैं।
किसान बनाम जनता
मसले पेचीदा हैं। अगर प्याज के भाव लगातार बढ़ते रहें तो कहीं न कहीं किसान को इसका फायदा मिलने की उम्मीद होती है। यूं किसान को हर स्थिति में बढ़े हुए भाव नहीं मिलते। बिचौलिये यानी बीच में थोक कारोबारी ज्यादा कमा लेते हैं। प्याज के भाव जब सस्ते होते हैं और छोटे किसान के पास प्याज को स्टोर करने की क्षमताएं नहीं होतीं तो किसान सस्ते में प्याज बेचकर निकल लेता है। सस्ता प्याज बिचौलियों के गोदाम में जमा हो जाता है। भावों की तेजी के दौर में प्याज महंगा होकर निकलता है। इस महंगे प्याज से किसान का भला आमतौर पर नहीं होता। इससे बिचौलियों, ट्रेडरों का भला होता है और आखिर में उपभोक्ता की जेब से ज्यादा पैसा निकलता तो है, लेकिन उसका रुख किसान की तरफ हमेशा नहीं होता। इसलिए यह नहीं समझना चाहिए कि महंगा प्याज किसान को अमीर बना रहा है। यूं भी राजनीति यही कहती है कि किसान बनाम पब्लिक के बीच के हित टकराव को चुनना हो तो सरकारें पब्लिक के हितों को ज्यादा ध्यान में रखती हैं। इसे यूं समझा जा सकता है। तमाम निजी स्कूल अपनी फीस बढ़ा देते हैं। लोग दे देते हैं। ओला-उबर सर्ज प्राइसिंग के नाम पर जब मांग ज्यादा होती है तो टैक्सी का किराया बढ़ा देती हैं। यह आमतौर पर स्वीकार्य होता है, लेकिन किसान सर्ज प्राइसिंग के नाम पर अगर जनता से ज्यादा कीमत वसूलता है तो वह मध्यवर्गीय और उच्च मध्यवर्गीय भी टीवी पर हाहाकार करता है जो ओला-उबर में ज्यादा पैसे देने में कोई कोताही नहीं करता। और आइटमों की महंगाई कई वर्गों को सहज स्वीकार्य है, लेकिन प्याज के भावों पर कार में चलने वाली आंटी भी टीवी बाइट देती हैं कि प्याज के भावों से यू नो, मेरी किचन का बजट बिगड़ गया है।
लेकिन एक तर्क यहां यह है कि ओला-उबर के भाव ज्यादा देना अलग बात है। प्याज तो वह लोग भी खाते हैं, जो ओला-उबर में नहीं चलते। यानी प्याज एक बहुत ही आम उपभोग की चीज है, इसलिए सरकारों को इसके भावों के लिए चिंतित होना पड़ता है। सरकारों को सस्ता प्याज बेचने के लिए मैदान में उतरना पड़ता है। किसानों के वोटों की तादाद के मुकाबले आम पब्लिक के वोटों की तादाद बहुत ज्यादा है। सरकारों को वोटों की चिंता करनी होती है। किसानों का यह तर्क सही होने के बावजूद एक तरफ रखा रह जाता है कि मांग में तेजी से पैदा होने वाली कीमत बढ़ोतरी का फायदा अगर दूसरे धंधों में उठाने की इजाजत होती है तो किसान को मांग जनित कीमत बढ़ोतरी से क्यों वंचित रखा जाना चाहिए।
ओला-उबर, निजी स्कूलों के बढ़े हुए भाव किसी सरकार को राजनीतिक तौर पर बहुत परेशान नहीं करते। लेकिन प्याज के बढ़े भावों से सरकारें परेशान होती हैं, इसलिए वे ऐसी कोशिशें करती हैं कि प्याज के भाव एक सीमा के बाद ऊपर न जायें। इसके लिए, निर्यात को मुश्किल बनाया जाता है। प्याज के निर्यात को इस कदर मुश्किल बना दिया जाता है कि उसका निर्यात असंभव हो जाता है। प्याज निर्यात न होगा तो कहां जायेगा? वापस घरेलू बाजार में आयेगा। घरेलू बाजार में प्याज की आपूर्ति बढ़ने से प्याज के भावों में नरमी आती है। इसलिए सरकारों की कोशिश रहती है कि आपूर्ति बढ़ायी जाये। हाल में तमाम देशों से प्याज आयात के लिए टेंडर निकाले गये थे, इसमें पाकिस्तान तक से प्याज के आयात की बात थी। बाद में विरोध के बाद पाकिस्तान का नाम हटाया गया। तो प्याज को सस्ता करने के लिए पाकिस्तान तक का समर्थन भी स्वीकार्य मान लिया जाता है। प्याज बहुत ही राजनीतिक आइटम है। इससे सरकारें बनती हैं और बिगड़ती भी हैं। इसलिए किसानों को ज्यादा कीमत मिलना मुश्किल हो जाता है। आइटमों की ज्यादा कीमत भले ही किसान को समृद्ध कर दे, लेकिन उससे पब्लिक में मचे हाहाकार को सरकारें नजरअंदाज नहीं कर सकतीं, इसलिए प्याज में राजनीति कूद जाती है। सरकारें घाटा खाकर चौबीस रुपये किलो प्याज बेचने में जुट जाती हैं। सरकारों को यह चिंता सताने लगती है कि प्याज के भाव बढ़े न दिखें। इससे ज्यादा सरकारों को कुछ दिखायी नहीं देता, जबकि प्याज का मसला बहुत गहरा मसला है।
बुनियादी मसले
किसी भी आइटम के भावों में तेज गिरावट और बढ़ोतरी के कारणों में आपूर्ति और मांग का संतुलन ही होता है। अगर किसी आइटम की मांग तेजी से बढ़ जाये तो भाव बढ़ जाते हैं और किसी आइटम की आपूर्ति तेजी से गिर जाये तो उसके भाव गिर जाते हैं। आपूर्ति गिरने के कारण कुछ भी हो सकते हैं। बाढ़, सूखा या कोई भी प्राकृतिक आपदा के चलते किसी आइटम की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसमें किसी सरकार का कोई दखल नहीं है, लेकिन सरकारें किसी एक दीर्घकालीन नीति पर काम कर सकती हैं, जिनसे किसानों और उपभोक्ताओं के हितों को सुनिश्चित किया जा सके। देखने में यह आता है कि कभी इस आशय की खबरें आती हैं कि सस्ती कीमतों से नाराज किसान अपना प्याज सड़क पर ही छोड़कर चले गये। कई मामलों में यह भी देखने में आता है कि प्याज या किसी और कृषि उपज को खेत से बाजार तक लाने की लागत ज्यादा बैठती है, जबकि उससे मिलने वाली कीमत कम बैठती है। ऐसी सूरत में किसान अपनी फसल को सड़क पर छोड़कर जाने में भलाई समझता है। विरोध का यह तरीका कई बार देखा जाता है। ऐसा क्यों होता है कि किसान अंदाजा नहीं लगा पाता कि उसकी फसल के भाव इस सीजन में उसे ठीक नहीं मिलेंगे। ऐसा इसलिए होता है कि इस तरह की व्यवस्थाएं अभी बनी नहीं हैं, जो किसान को सलाह दे सकें कि प्याज की आवक ज्यादा होने की उम्मीद है, इसलिए इस बार प्याज की बजाय कुछ और उपजा लो। छोटा किसान आंख मूंदकर अपने सैट पैटर्न पर काम कर रहा है, मांग आपूर्ति के पूर्वानुमान उसके पास नहीं हैं। इसके लिए संस्थागत इंतजाम भी नहीं हैं। बड़े किसान, चतुर सुजान तो अपना हिसाब-किताब जमा लेते हैं। ज्ञान से हासिल चेतना से यह अंदाज कर लेते हैं कि भाव क्या होंगे और कब ज्यादा होंगे। इसलिए यह लगातार देखने में आता है कि बिचौलिये सस्ते भाव पर प्याज को स्टाक करते हैं और महंगे पर बेचते हैं। लेकिन महंगे रेट का फायदा बिचौलियों को होता है, छोटे किसान के रोने वही रहते हैं कि इस बार प्याज बहुत ज्यादा हुआ तो सस्ता बेचना पड़ा। या इस बार प्याज कम उगाया तो भाव बहुत बढ़े हुए मिल रहे हैं।
कुल मिलाकर किसानों की ज्ञान चेतना का स्तर उन्नत करने के साथ-साथ ऐसे इंतजाम भी किये जाने जरूरी हैं कि छोटा किसान भी अपनी फसल का स्टाक उस तरह से कर ले, जिस तरह से बिचौलिये ट्रेडर और बड़े किसान कर लेते हैं और जब भाव ज्यादा होते हैं, तब बेचते हैं। इस संबंध में को-आॅपरेटिव संस्था बनाकर किस तरह से काम किया जा सकता है। अमूल का डेयरी माडल क्या छोटे किसानों के लिए इस्तेमाल हो सकता है। ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के स्तर पर गंभीर चिंतन और काम करने की जरूरत है। इन सवालों के जवाब देने के लिए संस्थागत इंतजामों की जरूरत है। उस तरफ सरकारों का ध्यान नहीं जा रहा है। 24 रुपये किलो प्याज बेचकर तात्कालिक राजनीति सैट कर ली जाये, यही तमाम सरकारों को सूझता है। इसलिए कई दशकों के बाद भी प्याज से जुड़ी समस्याओं का पक्का इलाज नहीं हो पा रहा है। प्याज की राजनीति तात्कालिकता में फंसी रहती है, इसलिए प्याज का सर्वहितकारी अर्थशास्त्र विकसित नहीं हो पा रहा है। इस मसले पर समग्र चिंतन और कर्म की जरूरत है। फौरी इलाजों से समस्याओं के पक्के हल नहीं निकलते।

जेब पर ही भारी नहीं, बढ़ा देती है ब्याज दरें भी

महंगाई दर का ताल्लुक ब्याज दर से है, ब्याज दर क्या हो, यह निर्धारण रिजर्व बैंक आफ इंडिया करता है। रिजर्व बैंक आफ इंडिया ब्याज दर के निर्धारण में महंगाई दर का विश्लेषण करता है। यानी अगर महंगाई दर लगातार ऊपर जा रही हो तो रिजर्व बैंक की कोशिश रहती है कि ब्याज दरें सस्ती न हों। ब्याज दर सस्ती कर दी जायें, तो पब्लिक के हाथ में खूब पैसा सस्ते भावों पर आ जाये तो फिर महंगाई बढ़ने की आशंकाएं प्रबल हो जाती हैं। महंगाई अगर लगातार बढ़ती रहे तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों को भी बढ़ाने की बात करता है। रिजर्व बैंक ब्याज दरों को बढ़ाने की बात करता है तो तमाम उद्योगपतियों को समस्याएं होती हैं। उद्योग जगत की सतत मांग यही रहती है कि ब्याज दरें कम हों, लेकिन रिजर्व बैंक सिर्फ उद्योगपतियों की बात सुनकर नहीं चल सकता है। उसे तमाम और कारक और तत्व भी देखने होते हैं। संक्षेप में, अगर महंगाई दर लगातार बढ़ती जाती है और रिजर्व बैंक ब्याज दरों को कम करने के बारे में विचार नहीं करता, बल्कि उलटा भी सोच सकता है। यानी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की खबरें भी रिजर्व बैंक से आती हैं। यह बात उद्योग जगत को कतई नागवार गुजर सकती है, खासकर जब एक तरह से मंदी का माहौल पहले ही बना हुआ है तमाम उद्योगों में। यानी प्याज के भाव सिर्फ रसोई का मसला नहीं हैं। प्याज के भावों का दूरगामी असर समग्र महंगाई दर पर पड़ता है और उसका असर आखिर में ब्याज दर पर पड़ता है। हाल में तमाम वजहों से रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में नरमी के संकेत दिये हैं। यानी रिजर्व बैंक ने ऐसे संकेत दिये हैं, जिनसे ब्याज दरों में कटौती के ही आसार बनते हैं। लेकिन लगातार बढ़ती महंगाई में ब्याज दरों में गिरावट संभव नहीं है। इसलिए प्याज के भावों को सिर्फ सरकारें नहीं देख रही हैं,बल्कि रिजर्व बैंक के लिए भी यह विश्लेषण का विषय है। अगर सरकारें करीब 35000 टन के प्याज बफर स्टाक का प्रयोग करके प्याज की कीमतों को थामने में कामयाब रहती हैं तो फिर समग्र महंगाई दर पर भी काबू संभव है। तब ब्याज दरों को लेकर नरमी की उम्मीद की जा सकती है। वरना ब्याज दरों को लेकर तमाम आशंकाएं प्याज की महंगाई से निकलती हैं।
यानी केंद्र सरकार अगर उद्योग जगत मंदी के इलाज के तौर पर सस्ती ब्याज दरों को चाहती है तो उसे सुनिश्चित करना होगा कि प्याज और तमाम आइटमों के भाव एक सीमा के ऊपर न जायें। अगर ये भाव लगातार ऊपर जाते गये तो फिर रिजर्व बैंक आफ इंडिया से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि ब्याज दरों में गिरावट का रास्ता खुले।


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