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पितृ पक्ष इस बार एक दिन कम

Posted On September - 8 - 2019

मदन गुप्ता सपाटू
हर महीने की अमावस्या को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है, लेकिन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के इन दिनों को पितृ पक्ष कहा जाता है। इस बार 13 सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध है। पितृ पक्ष का समापन पितृ अमावस्या और पितृ विसर्जन के श्राद्ध के साथ 28 सितंबर को होगा।
इस वर्ष श्राद्ध का एक दिन कम होगा, क्योंकि 2 श्राद्ध एकादशी के दिन पड़ेंगे। वहीं, शारदीय नवरात्र पूरे 9 दिन पड़ रहे हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से श्राद्ध का कम होना और नवरात्र का बढ़ना या पूरा पड़ना शुभ माना गया है। पूर्णिमा को मिलाकर श्राद्ध के दिन यद्यपि 16 रहेंगे, लेकिन 27 सितंबर को चतुर्दशी तिथि का लोप हो जाएगा। 25 सितंबर को एकादशी और द्वादशी के 2 श्राद्ध एक साथ पड़ेंगे।
श्राद्धकर्म का एक समुचित उद्देश्य है, जिसे धार्मिक कृत्य से जोड़ दिया गया है। श्राद्ध, आने वाली संतति को अपने पूर्वजों से परिचित करवाते हैं। जिन दिवंगत आत्माओं के कारण पारिवारिक वृक्ष खड़ा है, उनकी कुर्बानियों व योगदान को स्मरण करने के ये दिन होते हैं। इस अवधि में अपने बच्चों को परिवार के दिवंगत पूर्वजों के आदर्श व कार्यकलापों के बारे में बताएं, ताकि वे कुटुंब की स्वस्थ परंपराओं का निर्वाह करें।
धार्मिक मान्यताएं : हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए, तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती। पिंड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानी पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। ज्योतिष के अनुसार पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि अगर पितर रुष्ट हो जाएं तो जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याएं हो सकती हैं। संतानहीनता के मामलों में ज्योतिषी पितृ दोष को अवश्य देखते हैं। ऐसे लोगों को पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि कुंडली में पितृ दोष है, तो ये परिणाम देखने को मिलते हैं- संतान न होना, धन हानि, गृह क्लेश, दरिद्रता, मुकदमे, कन्या का विवाह न होना, घर में हर समय बीमारी, बार-बार नुकसान, धोखे, दुर्घटनाएं, शुभ कार्यों में अड़चन।
ऐसे करें श्राद्ध : इसे ब्राह्मण या किसी सुयोग्य कर्मकांडी से करवाया जा सकता है। आप खुद भी कर सकते हैं। सामग्री में सर्प-सर्पिनी का जोड़ा, चावल, काले तिल, सफेद वस्त्र, 11 सुपारी, दूध, पानी और माला लें। पूर्व या दक्षिण की ओर मुंह करके बैठें। सफेद कपड़े पर सामग्री रखें। 108 बार माला से जाप करें या सुख शांति, समृद्धि प्रदान करने और संकट दूर करने की क्षमा याचना सहित पितरों से प्रार्थना करें। पानी में तिल डाल कर 7 बार अंजलि दें। शेष सामग्री को पोटली में बांधकर प्रवाहित कर दें। हलवा, खीर, भोजन, ब्राह्मण, निर्धन, गाय, कुत्ते और पक्षी को दें।

किस तिथि को करें श्राद्ध
जिस तिथि को जिसका निधन हुआ हो, उसी दिन उसका श्राद्ध किया जाता है। देहावसान की तारीख मालूम न होने की स्थिति के लिए कुछ सरल नियम बनाए गए हैं- पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का नवमी पर किया जाना चाहिए। जिनकी मृत्यु दुर्घटना, आत्मघात या अचानक हुई हो, उनका चतुर्दशी का दिन नियत है। साधु-संन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी पर किया जाता है। जिनके बारे कुछ मालूम नहीं, उनका श्राद्ध अंतिम दिन अमावस पर किया जाता है, जिसे सर्वपितृ श्राद्ध कहते हैं।

5 मुख्य कर्म
तर्पण : दूध, तिल, कुशा, पुष्प, सुगंधित जल पितरों को अर्पित करें।
पिंडदान : चावल या जौ के पिंडदान करके भूखों को भोजन दें।
वस्त्रदान : निर्धनों को वस्त्र दें।
दक्षिणा : भोजन कराने के बाद दक्षिणा दिए बिना और चरण स्पर्श किए बिना फल नहीं मिलता।
दान : पूर्वजों के नाम पर कोई भी सामाजिक कार्य जैसे- शिक्षा दान, रक्त दान, भोजन दान, पौधरोपण, चिकित्सा संबंधी दान करना चाहिए।


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