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पाक का पाखंड

Posted On September - 12 - 2019

मानवाधिकार के मुद्दे पर ही करें बेनकाब
गुलाम कश्मीर से लेकर ब्लूचिस्तान तक मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाने वाले पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 42वें सत्र में जम्मू-कश्मीर में भारत द्वारा मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन के आरोप लगाये। इसके साथ ही तमाम मामलों की अंतर्राष्ट्रीय जांच की मांग की। भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने से बौखलाया पाकिस्तान इस मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दे रहा है। परिषद के सम्मेलन में पाक के विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी ने तीखे हमले किये और कश्मीर में अस्सी लाख लोगों को कैद में रखने के कथित आरोप लगाये। इंटरनेट और मोबाइल पर कथित प्रतिबंध को मानवाधिकार हनन का मुद्दा बनाने की कोशिश की। वहीं भारतीय प्रतिनिधि ने न केवल पाक को खरी-खरी सुना‍यी बल्कि पाकिस्तान को आतंकवाद का केंद्र बताया। यह हास्यास्पद ही है कि बंदूक के बल पर गुलाम कश्मीर का प्रशासन चलाने वाला पाकिस्तान हताशा में भारत पर ऐसे आरोप लगा रहा है। सेना की मदद से भारत में घुसपैठिये भेजने, नशे की तस्करी के जरिये युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट करने तथा अवैध हथियारों की पूर्ति करके पाक कौन से मानवाधिकारों की रक्षा कर रहा है? पिछले दिनों गुलाम कश्मीर में अत्याचारों का विरोध करने वाले कश्मीरियों के दमन की खबरें मीडिया में नजर आईं। भारत को इसे मुद्दा बनाना चाहिए। नि:संदेह जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाये जाने तथा लद्दाख को अलग केंद्रशासित राज्य का दर्जा दिये जाने के बाद पाक के लिये कश्मीर की राजनीति में टांग अड़ाने की संभावना खत्म हो गई है। जिन लोगों को पैसा देकर वह भारत विरोधी बयान देने को उकसाता था, उनकी भूमिका भी अब खत्म हो गई। हकीकत यह भी है कि मोदी सरकार के हालिया फैसले से बौखलायी पाक की सरकार और सेना जनता का ध्यान गंभीर समस्याओं से हटाने के लिये कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण कर रही है।
बहरहाल, पाक के विदेशमंत्री अपने एक बयान में जम्मू-कश्मीर को भारत का राज्य बताकर अपनी ही फजीहत करा बैठे हैं। उधर चीन जिस तरह पाक में अपने आर्थिक हितों तथा कूटनीतिक निहितार्थों को लेकर कश्मीर मुद्दे पर यू टर्न ले रहा है, उसके कूटनीतिक निहितार्थों से भारत को जूझना होगा। वहीं एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोहराया है कि यदि भारत व पाक चाहें तो अमेरिका मध्यस्थता करने को तैयार है। बावजूद इसके कि फ्रांस में हालिया मुलाकात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्रंप के सामने स्पष्ट कर चुके हैं कि जम्मू-कश्मीर भारत का अंदरूनी मामला है और हम किसी दूसरे देश को इसके मामले में कष्ट नहीं देना चाहते। दरअसल, अमेरिका समेत पश्चिमी देश अपनी मनमानी के लिये कश्मीर मुद्दे पर भारत पर दबाव बनाना चाह रहे हैं। इस मुद्दे पर ब्रिटेन की भूमिका भारतीय हितों के विरुद्ध रही है। नि:संदेह पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की साजिशों और इस मामले में बढ़ती अंतर्राष्ट्रीय दखल को देखते हुए भारत को कूटनीतिक प्रयास तेज करने होंगे। नि:संदेह हाल के दिनों में रूस से गहरे होते रिश्ते भी अमेरिका को खटक रहे हैं। कश्मीर के मुद्दे पर रूस के कदम ने भारतीयों का दिल जीता है। दर्शाया है कि वह भारत का सच्चा पुराना दोस्त है। मगर इसके चलते अमेरिकी प्रभाव वाले देश कश्मीर के बहाने दबाव बनाने की कोशिशों में जुटे हैं। नि:संदेह कश्मीर को मौजूदा स्थिति में देर तक नहीं रखा जा सकता। शासन-प्रशासन के स्तर पर कश्मीर में जनजीवन सामान्य बनाने की कोशिश तो तेज की ही जानी चाहिए। कालांतर हम बढ़ती अंतर्राष्ट्रीय चिंताओं से मुंह नहीं मोड़ सकते। पाक द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाने की कोशिशों के बीच कश्मीर में की जा रही घुसपैठ की कोशिशों को बेनकाब करना भी जरूरी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वक्त के साथ कश्मीर में जनजीवन पटरी पर लौटेगा। तभी हम अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को जवाब दे पायेंगे।


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