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परोपकार को याद रखना भी ईश्वर का संदेश

Posted On September - 15 - 2019

साई वैद्यनाथन
इस दुनिया में लेना-देना, लाभ-हानि, उतार-चढ़ाव चलते रहते हैं। सभी को कभी न कभी किसी से मदद लेनी पड़ सकती है। लेकिन, अहसान को जल्द से जल्द और बराबर मात्रा में लौटाना महत्वपूर्ण है। भगवान कृष्ण हमें इन उदाहरणों में दिखाते हैं…

भाइयों का बंधन : भगवान विष्णु ने जब श्री राम के रूप में अवतार लिया, तो शेषनाग के अवतार लक्ष्मण ने छोटे भाई के तौर पर उनकी सदा सेवा की। वह राम के साथ 14 साल वन में भी रहे। छोटे भाई का कर्ज उतारने के लिए भगवान विष्णु अपने अगले अवतार में श्री कृष्ण के रूप में खुद छोटे भाई बने और शेषनाग के अवतार बलराम को अपना अग्रज बनाया।

उंगली पर चोट : महाभारत के अनुसार पांडव राजकुमार युधिष्ठिर ने एक बार खुद को सम्राट घोषित करने के लिए राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। कई राजपुरुषों को यज्ञ के लिए आमंत्रित किया गया। यज्ञ के दौरान श्री कृष्ण का शत्रु शिशुपाल भी पहुंचा। उसने श्री कृष्ण को बार-बार अपमानित किया। श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ व शिशुपाल की माता को वचन दिया था कि वह शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा कर देंगे। आखिरकार जैसे ही शिशुपाल ने अपने अपराधों की यह सीमा लांघी, श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया। इसी दौरान सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की उंगली भी चोटिल हो गयी। प्रभु की उंगली से रक्त बहता देखकर द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ा और उनकी उंगली पर बांध दिया। श्रीकृष्ण ने द्रौपदी का यह कर्ज हस्तिनापुर के दरबार में कौरवों और पांडवों के बीच द्यूतक्रीड़ा के दौरान चुकाया। जुए में युधिष्ठिर ने सब कुछ खो दिया, यहां तक कि द्रौपदी को भी। तब कौरव राजकुमार दुर्योधन के आदेश पर दुशासन द्रौपदी को बालों से पकड़कर घसीटते हुए सभा में ले आया। दुर्योधन ने चीर-हरण का आदेश दिया और दुशासन भरी सभा में द्रौपदी की साड़ी उतारने लगा। पांडवों समेत पूरी सभा यह अनर्थ रोकने में असमर्थ हो गयी, तब श्री कृष्ण ने द्रौपदी की साड़ी को अनंत बनाकर उनकी लाज बचाई।

दुर्वासा की भूख : वनवास के दौरान पांडवों को तंग करने के लिए दुर्योधन ने क्रोधी स्वभाव वाले ऋषि दुर्वासा और उनके दस हजार शिष्यों को पांडवों के निवास पर भेज दिया। वहां पहुंचने का समय इस तरह से नियोजित किया गया कि मेहमान दोपहर का भोजन समाप्त होने के बाद पहुंचें— और फिर, भोजन की मांग करें। सूर्य देव का अक्षयपात्र, जो द्रौपदी के पास था, खाना अथाह मात्रा में बना सकता था, लेकिन वह द्रौपदी के खा लेने के बाद प्रतिदिन खाली हो जाता था। दुर्वासा और उनके शिष्य पांडवों के निवास पर तब पहुंचे, जब द्रौपदी खाना खा चुकी थीं। भोजन तैयार रखने की बात कहकर दुर्वासा और उनके शिष्य नदी पर स्नान करने चले गये। दुर्वासा को भोजन नहीं कराया, तो वे शाप दे देंगे, यह सोचकर चिंतित द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। श्रीकृष्ण प्रकट हो गये, लेकिन आते ही वे भी भोजन मांगने लगे। कहने लगे, मुझे बहुत भूख लगी है। द्रौपदी ने खाली अक्षयपात्र दिखाते हुए कहा कि कुछ भी नहीं बचा है। कृष्ण मुस्कराते हुए बोले, यदि साधक की नज़र लक्ष्य पर टिकी है, तो वह लक्ष्य को पा ही लेगा। मुझे बर्तन दिखाओ। द्रौपदी ने खाली अक्षयपात्र कृष्ण को थमा दिया। कृष्ण ने किसी कोने में बचा हुआ एक दाना देखा और उसे मुंह में डालकर कहा, ‘आह! इससे सभी तृप्त हो जायें।’ उधर, नदी पर स्नान करने गये ऋषि दुर्वासा और उनके शिष्यों को अचानक पेट पूरी तरह से भरा हुआ महसूस होने लगा। वे सोचने लगे कि पांडवों द्वारा तैयार किया भोजन खाया नहीं जाएगा। ऐसे में उन्होंने चुपचाप वहां से चले जाना ही श्रेयस्कर समझा।


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