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नवरात्रि : आज की देवियां

Posted On September - 29 - 2019

क्षमा शर्मा
पितृपक्ष के बाद, यानी कि अपने पुरखों की याद, उनका शोक, उसके बाद नौ दिनों का यह उत्सव हमारे समाज की उस परिपाटी को बताता है कि सुख-दुख इसी जीवन के हिस्से हैं।
शैव, वैष्णव, शाक्त हमारे समाज के ही सम्प्रदाय रहे हैं। शाक्त माने शक्ति की उपासना। शक्ति कौन, जिसे देवताओं ने अपने-अपने हिस्से की ताकत देकर निर्मित किया। इसीलिए वह ऐसी हो सकी कि बड़े से बड़े शक्तिशाली का संहार कर दिया।
आज भी जब स्त्री सशक्तिकरण की बातें होती हैं तो यही शक्ति उनकी ताकत से जुड़ी रहती है।
शक्ति को देवताओं द्वारा अपनी ताकत देने का अर्थ यह भी है कि जिसे अपने आसपास के दुष्टों से खतरा हो, जिनका संहार ज़रूरी है, उसके लिए स्त्रियों को ताकत दी जानी चाहिए। उसे अस्त्र-शस्त्र सौंपे जाने चाहिए।
सबसे बड़ी शक्ति मां
सच तो यह है कि उस माता से बड़ी शक्ति कौन हो सकती है जो एक नए जीवन को इस दुनिया में लाती है। अपनी तमाम इच्छाओं को अपनी संतान के लिए उत्सर्ग कर देती है। मां होने को आज स्त्री विमर्श कमजोरी माने और कोख को भले ही अपना दुश्मन कहे, लेकिन ऐसा है नहीं । प्रकृति ने स्त्री को कोख दी है, तो उसे इतनी शक्ति भी कि वह संतान को न केवल नौ महीने गर्भ में रख सके, बल्कि पाल-पोसकर उसे बड़ा कर सके। और यह भी तो कि अगर कोख है, तभी स्त्रियां हैं, पुरुष हैं। कोख नहीं, तो दुनिया में न स्त्री, न पुरुष । मातृशक्ति की यह ताकत सिर्फ मनुष्यों में ही नहीं पशु-पक्षी सभी में देखी जा सकती है। अपने समाज में स्त्री कमजोर अगर होती तो क्या शक्ति के रूप में कोई उसकी उपासना करता। लेकिन तमाम सभाओं, सेमिनार्स में ऐसे विचार प्रकट किए जाते हैं जैसे कि पश्चिम के मुकाबले हमारी औरत तो कहीं नहीं ठहरती।
नारी शक्ति का संघर्ष
वहां उसे कितनी आजादी है, यहां नहीं। सच तो यह है कि औरतों को आजादी देने के लिए पश्चिम ने कानून से उसे ताकत देने के बारे में इसीलिए सोचा कि वहां औरतों की दोयम दर्जे की नागरिकता हर तरफ थी। इसके अलावा यह पश्चिम को हमेशा अपने से श्रेष्ठ समझने वालों की गलतफहमी भी है कि पश्चिम औरतों के लिए स्वर्ग है और अपना देश नर्क। पश्चिम का चश्मा चढ़ाने से जो कुछ दिखता है, कभी उसे उतारकर भी समाज के बारे में सोचा जाना चाहिए। दरअसल तो स्त्रियों को पश्चिम ने क्या कम दबाया है। अमेरिका में वोट के अधिकार के लिए औरतों को सत्तर साल संघर्ष करना पड़ा था। अपने यहां तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसके अलावा आज औरतों की तरक्की के ले जिस ग्लास सीलिंग को तोड़ने की बातें की जाती हैं, औरतों को उच्च पदों पर देखने के सर्वेक्षण लगातार होते रहते हैं, बताया जाता है कि किस संस्थान, किस बहुराष्ट्रीय निगम, किस विश्वविद्यालय, किस सरकारी संस्थान में, कितने उच्च पदों पर कितनी औरतें हैं। इसी संदर्भ में हम याद कर सकते हैं कि हमारे यहां तो 1966 में ही इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बन गई थीं। अमेरिका में तो यह आज तक न हो सका।
विदेशों ने भी माना नारीशक्ति का लोहा
सिर्फ भारत ही नहीं एशिया के तमाम देशों ने अपने यहां बड़े-बड़े पदों पर औरतों को दशकों पहले सत्ता सौंपकर औरतों की ताकत का लोहा माना है। चाहे श्रीलंका की सिरिमावो भंडारनायके हों, पाकिस्तान की बेनजीर भुट्टो, बांग्लादेश की शेख हसीना और खालिदा जिया, म्यांमार की सू की, इंडोनेशिया की मेघावती । ये सभी स्त्रियां दशकों से अपने यहां सत्ता के केंद्र में रहीं। लेकिन पश्चिम एशिया से कुछ नहीं सीख सका। बात तो औरत को ताकत देने की हुई, मगर हिलेरी क्लिंटन ट्रंप को हराकर राष्ट्रपति नहीं बन सकीं। और अफसोस कि,अमेरिका जिस स्त्रीवाद का परचम लहराने की बातें करता है, वहां इस तरह की फूहड़ बहसें भी चलाई गईं कि क्या कोई औरत अमेरिका की राष्ट्रपति बनकर उसे ठीक से चला सकती है।
नारी में समाये दुर्गा के नौ रूप
नवरात्रि को स्त्री की ताकत, समाज में उसकी स्वीकार्यता, अपने पांव छुवाने यानी कि उसकी शक्ति का उत्सव है। चारों ओर देवी दुर्गा की प्रार्थनाएं, बजते घंटे- घड़ियाल, फूलों की महक, धूप, कपूर, अगरबत्ती, तरह-तरह के पकवानों की खुशबू, देवी की पूजा के लिए जुटे भक्तों की भीड़ हर सड़क, चौराहे पर दिखेगी। लोग अपनी-अपनी तरह से नौ दिन चलने वाले इस त्योहार को मनाएंगे।
बहुत से लोग इसे अपनी अमीरी के प्रदर्शन का अवसर भी समझेंगे। अखबार और चैनल्स भी इस तरह के विज्ञापनों से भरे रहेंगे कि नवरात्रि पर अपने सपने पूरे करें। विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं पर दिए जाने वाले डिस्काउंट का लाभ उठाएं। इसमें घर से लेकर ,कारें जेवर, कपड़े, बरतन सब कुछ शामिल होगा। कुछ लोग इसे यात्रा के मौके के रूप में भी देखंगे। और पूरे देश में फैले देवी के शक्तिपीठों की आराधना के लिए चले जाएंगे। और जीवन भर के लिए वहां के अनगिनत अनुभव अपने साथ ले आएंगे। बच्चियों की पूछ एकाएक बढ़ जाएगी। सप्तमी –अष्टमी और नवमी के दिन सजी-संवरी ये गुड़ियां जैसे चारों ओर धूम मचा देंगी। हमारा समाज अरसे से शक्ति का पूजक है, साथ ही लक्ष्मी का पूजक भी है। हम सभी जानते हैं कि शक्ति के बिना न तो लक्ष्मी आती है, न ही हम उसकी रक्षा ही कर सकते हैं। इसीलिए शक्ति प्राप्त करने के लिए हम लोग हर तरह की जुगत भिड़ाने में भी खूब पारंगत हैं।
मातृशक्ति की पूजा
सदियों से लेकर कलकत्ता आज तक देवी की पूजा का प्रमुख केंद्र है। वहां इसे हर एक वर्ग का सांस्कृतिक उत्सव माना जाता है। इसलिए अन्य धर्म के लोगों के अलावा वामपंथी भी, जो पूजा- पाठ में विश्वास नहीं रखते ,वे भी इन उत्सवों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस देवी के अनन्य भक्त थे। एक बार उन्होंने पूजा करते वक्त देवी से ही कहा था कि तुम तो सजी-संवरी यहां मंदिर में बैठी हो और बाहर तुम्हारे भक्त भूखे मर रहे हैं। यानि कि देवी से प्रार्थना और शिकायतें सभी की जा सकती हैं बिल्कुल अपनी मां की तरह।
शक्ति पूजा एक प्रकार से मातृशक्ति की पूजा ही है। मां जो एक नए जीवन को इस दुनिया में लाती है, आखिर उससे बड़ा संसार में और कौन हो सकता है। जो समाज पितृसत्ता से चलता हो, मातृशक्ति को पूजता हो, मगर माता को कोई अधिकार न देता हो, आखिर ऐसा क्यों है।
अपने यहां नवरात्रि पर छोटी बच्चियों को पूजते हैं , घर में उनके आगमन की कल्पना कर प्रसन्न होते हैं, उनके पैर धोते हैं, उन्हें मनपसंद व्यंजन परोसते हैं, उपहार देते हैं, उन्हीं बेटियों के जन्म पर लोग प्रसन्न नहीं होते, उन्हें जन्म से पहले ही खत्म करने की तरकीबें खोजते हैं। आखिर क्यों।
कन्याओं को दें सम्मान
जिसे देवी मानकर पूजें, उसे पैदा होने से पहले ही खत्म करने की सोचें, उसकी शिक्षा की व्यवस्था न करें,उसकी ठीक से देखभाल न की जाए, और शादी के बहाने जैसे-तैसे किसी को भी सौंपकर छुट्टी पा ली जाए। जिस घर में ये देवियां अधिक हों यानी कि बेटियां हों, उन्हें हिकारत और दया की दृष्टि से देखा जाए, ये ही तरह-तरह के अपराधों की शिकार हों तो हमें सोचना चाहिए कि आखिर कहां गड़बड़ है। गलती कहां है। क्यों हम दोहरे –तिहरे सोच में जीते हैं। क्यों जीती –जागती देवियों को सताते हैं। साल में एक बार पूजकर और बाकी दिनों सताकर तो किसी देवी का आशीर्वाद नहीं पाया जा सकता। पिछले कई दशकों से सरकारों का ध्यान इस तरफ गया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस विचार ने जोर पकड़ा है कि जब तक औरतों को देश के विकास में भागीदार नहीं बनाया जाता, उन्हें शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य की सही अवसर उपलब्ध नहीं कराए जाते, उनके निर्भय होकर काम करने के लिए कानून की सुरक्षा नहीं देते, तब तक देश की प्रगति सम्भव नहीं है। इसीलिए इन दिनों लड़कियों के लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के तहत तरह-तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं। उन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। फीस माफ की जा रही है। वजीफे दिए जा रहे हैं। ऐसी योजनाएं भी बनाई गई हैं कि अगर लड़कियों को स्कूल जाने में कोई परेशानी है तो स्कूल लड़कियों तक जाएं। लड़कियां ठीक से स्कूल जा सकें, दूरी के कारण वे पढ़ना छोड़ न दें, इसके लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें साइकिलें उपलब्ध कराई थीं। और बड़ी संख्या में लड़कियां स्कूल जाने लगी थीं। आज भी जा रही हैं।
जयललिता की कारगर पहल
जब पहली बार जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी थीं तो उन्होंने जगह-जगह पालने लगवाए थे। सरकार की तरफ से कहा गया था कि अगर आप अपनी लड़कियों को नहीं पालना चाहते, तो उन्हें सरकार को दे दें। एक महिला मुख्यमंत्री के इस कदम से हजारों लड़कियों की जान बच सकी थी। सच तो यह है कि आज कोई भी दल ऐसा नहीं जो स्त्री शक्ति की भूमिका और उसके वोट की ताकत को न पहचानता हो। इसीलिए लड़कियों को बहुत सी जगह पुलिस, पंचायत आदि में आरक्षण की सुविधाएं दी जा रही हैं। उन्हें काम करने और यदि पूरे दिन काम नहीं कर सकतीं तो वर्क फ्राम होम करने के लिए कम से कम महानगरों में खूब सहायता मिल रही है।
नई बेटियों को ऐसे मिल रही ताकत
आज की इन नई देवियों की अष्टभुजाएं न सही, मगर लोकतंत्र, शिक्षा, मीडिया, कम्युनिकेशन और स्पीड ने इन महिलाओं यानी कि आज की देवी को नई ताकत दी है। कम्प्यूटर, मोबाइल, मेल, वॉटसएप, फेसबुक, तरह-तरह की साइटस आदि इनके नए हथियार बने हैं। न सही शेर की सवारी, कार से फर्राटा भरती यह लड़कियां दुनिया के किसी भी शक्तिशाली शख्स को पीछे छोड़ सकती है। स्पीड और तकनीक आज की लड़की की सबसे बड़ी ताकत हैं। समाज में लड़कियों को तरह-तरह की सुविधाएं देना देवी की पूजा ही है ।
इस पूजा के सकारात्मक परिणाम भी नज़र आने लगे हैं। तभी तो आजकल हर क्षेत्र में लड़कियां दिखाई देती हैं। नौकरियों, व्यापार, प्रशासन, पुलिस, चिकित्सा,शिक्षा, मैनेजमेंट, एविएशन, आदि में लड़कियों की धमक है।
देश की देवियों को सेलिब्रेट करें
नवरात्रि इसी नई देवी को पहचानने, उसके काम की ताकत को नए स्वर देने, उसे बढ़ाने, उसकी राह के कांटों और बाधाओं को दूर करने का अवसर भी है। अपने देश की देवियों को सेलिब्रेट करें।
उनके साथ-साथ अपने यहां की वे परंपराएं भी याद रखें जो खास तौर से औरतों को सम्मान देने के लिए ईजाद की गई थीं। मातृशक्ति की पूजा उन्हीं परंपराओं में से एक है। देवी के रूप में इस देश में न जाने कब से मातृशक्ति की पूजा हो रही है। आइए मातृशक्ति और रोजगार से सज्जित अष्टभुजाधारी आज की इन देवियों को नमन करें।


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