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नदी को बचाना है

Posted On September - 8 - 2019

लघुकथाएं

‘इस समय हम जहां से गुजर रहे हैं, किसी समय वहां नदी बहा करती थी।’
‘सच में?’
‘और यह रास्ता, जिस बड़े रेगिस्तान में जाकर मिलता है, जानती हो वह क्या था?’
‘क्या?’
‘समुद्र।’
‘ओ…ऽ…!’
‘हम उन दिनों साइबेरिया से आया करते थे यहां। चहल-कदमी किया करते थे नदी के किनारे-किनारे दूर तक। पास के खेतों और जंगलों में रात बिताते थे और…’
‘खेत और जंगल भी थे यहां!’
‘बहुत-कुछ था जो अब नहीं है। आंखों में भर लो इस दृश्य को; अगली बार आओगी तो उंगलियों में उंगलियां फंसाकर घूम नहीं पाओगी इस तरह। धरती की सतह को लील चुके होंगे ज़हरीले रसायन।’
‘तब?’
‘स्पेस सिटी में रह रहे होंगे लोग, जीव-जन्तु, सब। छोटे-छोटे कैप्सूल में बन्द होकर तैरा करेंगे अकेले। बिना उसके, धरती के वायुमंडल में प्रवेश करते ही गल जाया करेगी काया।’
‘ओह, नहीं।’
‘सुनो प्रिया! लोग अगर गर्भ में ही मारते रहेंगे नदियों को। बहने नहीं देंगे उन्मुक्त। तो सोचो—बचा-खुचा सागर भी जिएगा किसके लिए? वह नहीं बचेगा तो बादलों से वंचित रह जाएगा आकाश… ज़हरीली हवाएं कर लेंगी उस पर कब्जा। नदियों को बचाना होगा गर्भ में नष्ट होने से, बचाना है अगर धरती को जैविक युद्ध से।’

भुट्टा और कलम
‘आंच तेज करके जरा तेजी से घुमाओ रामरती! बहुत देर लगा रही हो।’
भुट्टा भूनती रामरती से बस यही कहा था कि वह तपाक‍् से बोली, ‘जे भुट्टौ है लल्ला, इतमिनान तेई भुनैगो। तुम्हाई कलम नईंए, के उठाई और घिस डारी।’

– बलराम अग्रवाल


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