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दोस्ती में समझदारी भी ज़रूरी

Posted On September - 15 - 2019

रिश्ते

नरपत दान
राजेश का स्वभाव दूसरों से घुलने-मिलने वाला था। उसकी इस आदत के कारण बचपन से ही उसके कई दोस्त बन गए थे। वही दोस्त स्कूल से लेकर कॉलेज की पढ़ाई करने तक उसके साथ रहे। राजेश का सोचना था कि दोस्त वही है जो हर वक्त उसके साथ बैठे, पार्टी करे और साथ घूमने चले। इसी आदत के कारण राजेश अपने दोस्तों को हर रोज फोन करके बुला लेता और मौज -मस्ती करता।
लेकिन कॉलेज में पढ़ाई करने के बाद उसके सभी दोस्त अलग -अलग शहरों में काम करने लगे।
कई बार जब वह कॉल करता और दोस्त रिसीव नहीं कर पाते तो राजेश झुंझला जाता था। धीरे-धीरे राजेश के दिमाग में यह बात घर कर गई कि शायद अब दोस्त उससे मिलना नहीं चाहते। राजेश का रवैया बदल गया और उसकी सालों पुरानी दोस्ती में दरार आने लगी।
यह एक उदाहरण है। कहा जाता है कि दोस्ती जितनी पुरानी होती है, उतनी ही गहरी होती है। लेकिन कई बार दोस्तों से बचपने की तरह अपेक्षाएं इसकी चमक को फीका कर देती हैं। दोस्ती में जितना जरूरी बचपना है, उतनी ही समझदारी की जगह भी होनी चाहिए। आइए कुछ बातों का ध्यान रखें, जिससे दोस्ती के रिश्ते को और मजबूत बना सकें…
बदलाव स्वीकार करें
हम दोस्तों के साथ जिस वातावरण में रहते हैं वैसा हर बार नहीं रहता। कई बार बदली परिस्थितियों के कारण दोस्त को अलग जगह जॉब करनी पड़ती है तो वहां उसका वातावरण बिल्कुल अलग होता है। नौकरी के बाद जिंदगी में बदलाव होना स्वाभाविक है। उसकी व्यस्तता बढ़ती है तो उसके बदलाव पर नाराजगी जाहिर न करें बल्कि उसके बदलाव को समझें और उसे खुशी-खुशी स्वीकार करें।
दिल में रखें समझदारी
कुछ लोग सोचते हैं कि दोस्त हर समय उपलब्ध रहे। लेकिन परिस्थितियों के कारण ऐसा संभव नहीं होता। अगर दोस्त अपने जॉब में व्यस्त है,आपसे मिल नहीं पा रहा तो इसका मतलब यह नहीं कि वह जानबूझकर ऐसा कर रहा है। समय के साथ प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। उसके लिए अपने काम की ओर ध्यान देना बेहद जरूरी है। जॉब के अलावा घर की जिम्मेदारियां भी आदमी को व्यस्त कर देती हैं। ऐसे में समझदारी रखते हुए अपने दोस्तों की भावनाओं और परिस्थितियों को समझें और उनसे दोस्ती ना तोड़ें। इस बात को समझें कि उसे जब भी समय मिलेगा, वह जरूर आप से मिलेगा, आप से बात करेगा।
मिलने पर उलाहना न दें
कई बार जब लंबे समय बाद दोस्त मिलते हैं तो अक्सर शिकायतें करने लगते हैं। उदाहरण के लिए-कहां बिजी रहते हो? बड़े आदमी बन गए हो? आपको समय ही नहीं मिलता? कहां गायब रहते हो? इस तरह के प्रश्नों से आपकी दोस्ती पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हम उसकी परिस्थितियां जाने बगैर प्रश्न पूछ लेते हैं। ऐसे में जरूरत है शिकायतों से दूरी बनाएं और मुस्कुराकर गले मिले और कहीं साथ घूमने चलें।
उम्र के साथ सोच भी बदलें
उम्र बढ़ने के साथ दोस्ती तो गहरी हो जाती है लेकिन उम्र बढ़ने के साथ हमारी समझदारी भी उतनी ही बढ़नी चाहिए। अगर आप उम्र बढ़ने के साथ भी यह सोचते हैं कि आप अपने दोस्तों के साथ बचपन में या कॉलेज के समय में जो हरकतें किया करते थे, उन्हें अभी दोहराएंगे तो यह नासमझी ही होगी। अब उनसे पुरानी अपेक्षाएं बदलनी चाहिए। थोड़ा बड़प्पन और परिपक्वता लाएं दोस्ती में।
अहंकार से बचें
जब किसी कारण दोस्तों का आपसे मिलना नहीं हो पाता है तो आप उनसे फोन से बात करें और हो सके आप खुद चलकर उनसे मिलने जाएं क्योंकि दोस्ती में कोई भी छोटा-बड़ा नहीं होता। इसलिए, मैं क्यों जाऊं मिलने? इस तरह के अहंकार को अपने दिमाग में हावी न होने दें बल्कि जब भी समय मिले दोस्त की खैरियत पूछते रहें। फिर देखना वह दोस्त भी समय मिलते ही आप से मिलने आएंगे।


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