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तंग नज़रिये की फूहड़ता

Posted On September - 15 - 2019

बड़े पर्दे पर नारी

अण्णा एमएम वेट्टीकाड
इस साल गर्मियों में रिलीज़ हुई हिंदी फिल्म ‘कबीर सिंह’ में नारी पर दिखाए गए तंग नज़रिये पर हुई प्रतिक्रियाओं में या तो जोर-शोर से किया गया गुस्सा देखने को मिला था या फिर इसको सही ठहराने वाले कमेंट दिखाई दिए थे। अब एक अन्य फिल्मी सितारे की हिंदी फिल्म ‘दे दे प्यार दे’ भी नारी-अस्मितावादी दर्शकों के रडार पर आ गई। अगस्त में रिलीज़ इस फिल्म में अजय देवगन ने 50 साल के आशीष का किरदार अदा किया है। एक दृश्य में वह नई प्रेमिका 26 वर्षीय आयशा को अपनी पूर्व पत्नी मंजू (तब्बू) से मिलवाता है, जो लड़कर उससे जुदा हो चुकी है।
इस फिल्म के एक अन्य दृश्य में आयशा उपहास करते हुए मंजू को ‘पुरानी गाड़ी’ बताती है और खुद को वह ‘नई गाड़ी’ बताती है, जिसके रखरखाव पर मालिक बड़े चाव से भारी-भरकम खर्च करता है! फिल्मों में इस तरह का कामुक-अर्थी मज़ाक कोई पहली बार नहीं है। एक और दृश्य है जब आशीष के साथ अपनी पहली ही मुलाकात में आयशा नशे में धुत होकर सो जाती है, सुबह उठने पर मुस्कुराते हुए वह इस बात की संभावना जताती है कि पिछली रात जब वह अपनी सुध-बुध में नहीं थी, हो सकता है आशीष ने उसके साथ ऊंच-नीच कर दिया हो- बेशक वह इसे सीधा बलात्कार नहीं बताती है। यहां तक कि शरारतन खिलखिलाते हुए वह पूछती है कि जब उसके पास ऐसा मौका था, उसने हाथ से क्यूं जाने दिया? इन शब्दों ने नायक आशीष को बलात्कार की शिकार हुई महिलाओं पर तंज कसने का मौका दिया, वह कहता है, ‘मैं किसी महिला को यह मौका नहीं देना चाहता था कि नशे में होश न रहने का बहाना बनाकर अपनी कहानी रो-रोकर सुनाए और कहे कि मेरे साथ अनाचार किया गया है।’
लगता है अकीव अली निर्देशित यह फिल्म ‘दे-दे प्यार दे’ प्रतिक्रिया के उस बवंडर से बच निकली, जिसमें संदीप वांगा रेड्डी निर्देशित ‘कबीर सिंह’ फंस गई थी। इसके पीछे कारण यह नहीं है कि ‘कबीर सिंह’ के बरअक्स अली का चढ़ी आंखों वाला नायक अजय देवगन ‘दे दे प्यार दे’ में अपने संवादों में महिलाओं के प्रति उघड़ी कटुता भरी कामुकता व्यक्त करने में किसी तरह पीछे है, बस फर्क इतना है इस फिल्म में कि वह महिलाओं पर हमलावर होते नहीं दिखाया गया है। ‘दे दे प्यार दे’ में बहुत चतुराई से नारी विरोधी संवाद खुद महिला पात्रों के मुंह से निकलवाए गए हैं।
कामयाबी ने दबा दिये विरोध के सुर
कहने को कहा जा सकता है कि वांगा की फिल्म पर उत्तर भारत के महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को हो-हल्ला मचाकर जीत का भाव मिला था, लेकिन उनका यह खुमार बॉक्स ऑफिस पर ‘कबीर सिंह’ को मिली भारी सफलता में जल्द ही काफूर भी हो गया था और इस बार ‘दे दे प्यार दे’ के मामले पर अपेक्षाकृत धीमे सुर में आया उनका विरोध इसका सूचक है। यह दोनों घटनाएं इस तथ्य को इंगित करती हैं कि वर्ष 2012 में दिल्ली में हुए जघन्य ‘निर्भया बलात्कार कांड’ के बाद उफने यौन-अपराध विरोधी प्रदर्शनों में हिंदी फिल्म निर्माताओं को जिस तरह समाज में बढ़ते हिंसात्मक यौन-अपराधों के लिए जिम्मेदार ठहराने की बात उठी थी, उसके बावजूद सच्चाई यह है कि दर्शकों और मीडिया में पितृ प्रधानता, नारी द्वेष, कामोत्तेजना और द्विअर्थी मजाक और पर्दे पर बलात्कार को लेकर बने चुटकुलों के प्रति मकबूलियत का स्तर अभी भी काफी ज्यादा है।
‘कबीर सिंह’ के संवादों और दृश्यों को लेकर जो दर्शक वर्ग बहुत जोर-शोर से उद्वेलित हो उठा था वह ‘दे दे प्यार दे’ के सहनिर्माता लव रंजन पर अपेक्षाकृत नर्म दिखाई दिया है, जिनका पूरा करियर ही महिलाओं के प्रति हिकारत से भरी फिल्में बनाने वाला रहा है। इसमें ‘प्यार का पंचनामा’ (2011), ‘प्यार का पंचनामा-2’ (2015) और ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ (2018) जैसे नाम हैं।

रेप पर चुटकले बनाना
लव रंजन की तरह और भी बड़े नाम वाले निर्माता हैं जो पिछले एक दशक या उससे अधिक समय से बलात्कार की गंभीरता को आमतौर पर होने वाला अपराध जैसा दिखाने वाली फिल्में बना रहे हैं। एक नामी निर्माता-निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा की काफी वाहवाही लूटने वाली फिल्म ‘थ्री इडियट्स’, जिसका निर्देशन राजकुमार हिरानी ने किया था, में लंबे भाषण वाला एक तथाकथित कॉमेडी सीन था, जिसमें वक्ता लिखा हुआ भाषण पढ़ता है और नायक शरारत करते हुए पांडुलिपि को बदलकर उसके मुंह से ‘चमत्कार’ शब्द के बदले ‘बलात्कार’ शब्द कहलवा देता है। तुर्रा यह कि वर्ष 2009 में अंत्यत सफल रही इस फिल्म के उक्त दृश्य को ‘मज़ाक का बढ़िया नमूना’ ठहराया गया था। इसी तरह वर्ष 2007 में रिलीज हुई इम्तियाज अली निर्देशित ‘जब वी मैट’ में एक दृश्य था, जिसमें उस वक्त लोगों की पंसदीदा नायिका रही करीना कपूर (गीत) और नायक शाहिद कपूर (आदित्य) एक सिक्का उछालकर टॉस के जरिए यह तय करते दिखाए गए हैं कि दूसरे का रेप करने का पहला अधिकार किसको मिलेगा। इस प्रसंग को भी मजाहिया-शरारत जैसा बनाकर पेश किया गया था। वर्ष 2011 में आई अली की एक अन्य फिल्म ‘रॉकस्टार’ के एक दृश्य में नायिका हीर (नर्गिस फाखरी) और नायक जनार्दन (रणबीर कपूर) को एक घटिया से सिनेमाघर में निम्न-दर्जे की कामुक फिल्म ‘जंगली जवानी’ देखने के बाद निकलते दिखाया गया है। नायक बाहर आते ही शरारती लहज़े में कहता है, ‘अगर हम कुछ देर और अंदर हॉल में बैठे रहते तो तुम्हारा बलात्कार तो अवश्य हो जाता।’ इस पर नायिका चिहुंकते हुए जवाब देती है, ‘अच्छा होता, तब ‘जंगली जवानी’ भाग-2 बन जाती।’ कोई कह सकता है कि ये फिल्में 2012 के ‘निर्भया कांड’ से पहले उस वक्त रिलीज़ हुई थीं, जब नारीवादी दर्शक अपेक्षाकृत कम मुखर थे और हिंदी फिल्म आलोचक भी नारी को लेकर बुनी गई कामुकता का विरोध करने में काफी नर्म रवैया रखते थे। जबकि हकीकत यह है कि मुखालफत करने वालों की गिनती सतही सिनेमा को पसंद करने वालों की संख्या के मुकाबले अभी भी बहुत कम है। यहां तक कि इस दावे में भी कोई दम नहीं है कि ‘कबीर सिंह’ में दिखाई गई नारी द्वेषिता को ज्यादातर आलोचकों ने बुरा बताया है जबकि तथ्य यह है कि उक्त फिल्म को अनेक आलोचकों ने अच्छे अंक दिए थे। यह भी हकीकत है कि पिछले कुछ सालों में कामोत्तेजना भरी बॉलीवुड फिल्मों को दर्शकों की और ज्यादा स्वीकार्यता प्राप्त हुई है। शायद उसके पीछे एक छिपी वजहों में एक यह भी हो सकती है कि 2012 की घटना के बाद अखबारों और मीडिया में महिला अधिकारों को लेकर चर्चा पर जिस तरह बहुत ज्यादा जगह और समय मिला था, उससे चिढ़कर कामुकता-पसंद दर्शक वर्ग ने ऐसी फिल्मों का रुख करते हुए अपने तौर पर बदला लिया है।
नारीवाद खुद भी एक फॉर्मूला
एक विद्रूपता यह भी है कि 2012 के बाद जिस तरह नारीवाद को लेकर जनता की प्रवृत्ति बन गई थी, उससे प्रभावित होकर कुछ फिल्मी हस्तियां भी नारी-अस्मिता को लेकर मुखर हो गई थीं लेकिन इनके लिए नारीवाद वाणिज्यिक रूप से लाभ लेने का ऐसा टोटका था जो बॉक्स ऑफिस पर माकूल सिद्ध हो सकता था। 2016 में आई फिल्म ‘पिंक’ के प्रचार अभियान के दौरान अमिताभ बच्चन द्वारा अपनी नातिन को लिखा खुला पत्र आया था, जिसमें वे उनको नारी के समक्ष मौजूदा चुनौतियों को लेकर चेताते हुए कहते हैं, ‘किसी को तुम्हें यह यकीन दिलवाने का मौका न देना कि तुम्हारी स्कर्ट की लंबाई तुम्हारे चरित्र की गहराई का पैमाना है।’
अक्षय ने नारीवाद को चमकाया
फिर वर्ष 2018 में इन्हीं बच्चन साहिब का यह क्लिष्ट उपदेश उन्हें उस वक्त धोखा देता प्रतीत हुआ जब पूरा देश उन्नाव और कठुआ बलात्कार कांड से उद्वेलित हो उठा था और सत्ताधारी दल द्वारा कथित अपराधियों को बचाने की उघड़ी कवायदों के चलते बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए थे। उस वक्त एक प्रेस वार्ता में अमिताभ बच्चन से जब इन प्रकरणों पर अपनी टिप्पणी करने को कहा गया तो उनका कन्नी काटने वाला गोलमोल जवाब थाः ‘मुझे तो इस पर बोलते हुए भी कोफ्त होती है, इसलिए इन विषयों को न ही छेड़ा जाए, इनके बारे में जिक्र तक करना भयावह है।’ बच्चन द्वारा अपनाई गई इस चतुर चयनात्मकता की बनिस्पत अक्षय कुमार ने अपने मौकापरस्त नारीवाद को चमका लिया, जबकि लगभग पिछले तीन दशकों से जिन फिल्मों में वह नायक थे, वह भी नारी-अस्मिता के प्रति गलत रुख वाली रही हैं। अक्षय ने भांप लिया कि पिछले कुछ सालों में नारी-अस्मिता को लेकर जनता में काफी संवेदनशीलता पनपी है, फिर यह बात विद्या बालन अभिनीत फिल्मों और ‘क्वीन’ जैसी फिल्म को मिली भारी सफलता से और भी ज्यादा पुष्ट हो गई थी कि जहां एक ओर नारी द्वेष एवं कामुकता वाली फिल्में मकबूल रहती हैं, वहीं महिलाओं के लिए चिंतातुर विषय भी सफलता दिलवा सकते हैं। यहां ये वही अक्षय कुमार हैं, जिसने वर्ष 2010 में आई फिल्म ‘तीस मारखां’ के टाइटल ट्रैक के बैकग्राउंड में अपनी आवाज़ में डायलॉग मारा था ‘तवायफ की लुटती इज्ज़त को बचाना और तीस मारखां को पकड़ने की कोशिश करना, दोनों बेकार हैं।’ विडंबना यह कि उक्त फिल्म का निर्देशन एक महिला ने किया था! अक्षय वर्ष 2014 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘हॉलीडे’ में ऐसा नायक है जो एक लंबे बरामदे में नायिका सोनाक्षी सिन्हा का पीछा करता हैै। इस फिल्म को भी हल्की-फुल्की मज़ाकिया फिल्म कहा गया था।
परंतु पिछले कुछ सालों में अक्षय कुमार पर्दे से परे खुद की छवि ऐसी बनाने में लगे हैं जो एक जिम्मेवार पारिवारिक बंदा, उच्च विचारों वाला पिता और नारीवाद का दृढ़ निश्चयी समर्थक अपनी पत्नी को बढ़ावा देने वाला पति है। इसकी बदौलत उनकी फिल्में ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ (2017) और ‘पैडमैन’ (2018) बॉक्स ऑफिस पर काफी सफल रही थीं। फिल्म ‘टॉयलेट’ में दिखाया है कि यह उसका (अक्षय) अपनी पत्नी की इज्जत बनाए रखने का प्रयास ही था, जो घर-घर जाकर अपने यहां भी शौचालय बनाने का प्रचार करने का प्रेरणास्रोत बना था। जबकि ‘पैडमैन’ फिल्म में वह मासिक धर्म के दौरान महिला की निजी स्वच्छता को लेकर जागरूकता बनाने वाला किरदार था।
छवि बनाने की खातिर
दूसरों का ख्याल रखने वाली छवि किसी भी फिल्मी सितारे की चमक में ऐसी अतिरिक्त आभा जोड़ देती है, वैसी दमक कामुक कॉमेडी वाली फिल्मों की मार्फत कमाए करोड़ों रुपयों से भी नहीं मिल सकती। इस तरह हमने देखा कि किस तरह इस फॉर्मूले का इस्तेमाल करते हुए एक सितारा (अक्षय कुमार), जो कभी स्वयं भी बॉलीवुड की नारी द्वेषी फिल्मों का एक अग्रणी नायक था,आज सैनेटरी नैपकिन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाले अभियान का चेहरा बन चुका है।
कायम है उम्मीद
परंतु इसका यह मतलब नहीं कि कोई उम्मीद बाकी नहीं है। आखिरकार जनता और मीडिया में अब पहले के मुकाबले ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है जो हिंदी सिनेमा में दिखाई जाने वाली नारी के प्रति दुराग्रह को लेकर अपनी आवाज उठाने लगे हैं। हो सकता है फिल्म ‘कबीर सिंह’ के नायक के हाव-भाव-संवादों का समर्थन करने वाले लोग वर्ष 2013 में आई सोनम कपूर-धनुष अभिनीत फिल्म ‘रांझना’ के संवादों पर उस दर्जे की आलोचना न होने पर खफा हों, जितनी उनकी पंसदीदा फिल्म पर की गई है, क्योंकि उनके हिसाब से जब दोनों के संवाद लगभग एक जैसा भाव लिए थे, फिर उसे क्यों बख्शा गया था। बिना शक, फिल्म ‘रांझना’ पुरातनपंथी सोच को बेतरह बढ़ावा देने वाली थी और जिस तरह उस वक्त आलोचकों ने इसको लेकर दोहरा चेहरा रखा था (जैसा कि आज की तारीख में अक्षय कुमार का है) तो यह एक तरीके से उनके भी चरित्र का पर्दाफाश है। तथापि इस तमाम परिदृश्य में आशा की किरण यह है कि 2013 से पहले जो आवाजें खामोश नहीं रही थीं, उनकी बदौलत 2013-19 के बीच कम-से-कम कुछ ऐसे लोग उभरकर मजबूत हुए हैं, जो आज खुलकर अपने विचार रख रहे हैं।
जैसा कि सामाजिक और सांस्कृतिक विकास क्रम पर होने वाले किसी भी विमर्श में होता आया है, उसी तर्ज पर हिंदी फिल्मों में नारी द्वेषता, पितृ-प्रधानता और कामोत्तेजक मजाकों की प्रासंगिकता पर चली बहस भी ‘पानी का गिलास आधा भरा या आधा खाली है’ पर आकर खत्म हो जाती है। कामुकता-पंसदों की बदौलत फिल्म ‘कबीर सिंह’ को मिली अपार सफलता से अब या तो शाहिद कपूर और संदीप रेड्डी आगे इससे भी ज्यादा कामोत्तेजक फिल्में बनाने को उद्यत होंगे या फिर अपने रवैये पर पुनर्विचार करेंगे, लेकिन यह लगभग पक्का है कि इस तरह नैतिकता अधोन्मुखी सिनेमा के खिलाफ बोलने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जाएगी। इसी बीच, वे लोग जो अभी भी इस बात को लेकर दुविधा में हैं कि किसको सही मानें और किसे गलत, तो उनके लिए यह जानना सही होगा कि इस बात पर गौर फरमाएं कि क्योंकर ‘कबीर सिंह’ के संवादों पर तो खूब हो-हल्ला मचा लेकिन इसके बरअक्स ‘दे दे प्यार दे’ के द्विअर्थी मज़ाकों को आम मानकर नजरअंदाज़ कर दिया गया है। आखिर वह क्या है, जिसने अकीव अली को उकसाया कि वह अपनी फिल्म में अधेड़ महिला की तुलना पुरानी गाड़ी से करने वाला संवाद रखे और तब भी इस पर कोई बवाल उठ खड़ा न हो, वहीं दूसरी ओर वंगा जैसी सोच है कि जिसकी फिल्म में एक ऐसा ‘मसखरा’ नायक है जो हीरोइन की सहमति की परवाह किए बिना जोर-जबरदस्ती करता है और इसके बदले इनाम में उसका प्यार और वफादारी तक प्राप्त करने में सफल होता है।


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