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डिजिटल युग में हिंदी

Posted On September - 8 - 2019

अरुण नैथानी
सचमुच, ये हिंदी के अच्छे दिन हैं। लाल किले की प्राचीर से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ तक। नि:संदेह राजाश्रय में इसका विस्तार हुआ है। मगर सही मायनों में तकनीक की ताल पर हिंदी ने अपनी सधी चाल चल दी है। वह आज इतराती हुई चली है। नयी पीढ़ी के साथ कदमताल करते हुए।
फैशनेबल हिंदी, नयी पीढ़ी के पास नये अंदाज़ में पहुंचती है। उसके अग्रदूत हिंदी की परंपरागत बिरादरी के लोग नहीं हैं। वे भी नहीं हैं जो हिंदी सेवा के नाम पर अपने अलग टापू बना लेते थे। वे भी नहीं हैं जो इसके कम पाठक-वाचक होने का रोना रोते रहते हैं।
वे तकनीकी संस्थानों, प्रबंधन के संस्थानों तथा ऐसे क्षेत्रों से निकले युवा हैं, जिन्होंने तकनीक के साथ आधुनिक सूचना माध्यमों के ज़रिये हिंदी की लोकप्रियता को नये आयाम दिये हैं।
मातृभाषा को समद्ध करने लौटे मनीष
अमेरिका में ग्रीन कार्ड रखने वाले मनीष गुप्ता एक दिन सब कुछ छोड़कर भारत लौट आये कि मुझे नयी पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने के लिये कुछ नया करना है। मातृभाषा को समृद्ध करना है। टूरिज्म में एम.बी.ए करने के बाद सॉफ्टवेयर एक्सपर्ट से लेकर फिल्म निर्देशन का दायित्व निभाने वाले मनीष ग्लैमर की जिंदगी को तिलांजलि देकर स्वदेश लौट आये। मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में जन्मे मनीष ने सूचना प्रौद्योगिकी व तकनीक का इस्तेमाल करके हिंदी को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया ताकि नयी पीढ़ी हिंदी की विरासत से जुड़े, फर्राटेदार हिंदी बोले। उन्हें उन लोगों से चिढ़ थी, जो बैठे-बैठे हिंदी को संकटग्रस्त बताकर, इसे नुकसान पहुंचाते हैं। वह हिंदी के जिहादी बनकर आये थे। उन्होंने तकनीक और सोशल मीडिया के माध्यम से नये पाठक वर्ग को हिंदी से जोड़ने का बीड़ा उठाया।
नयी पीढ़ी भी समझे काव्यधारा
अमेरिका में जमा-जमाया कारोबार छोड़कर भारत लौटे मनीष ने महसूस किया कि काव्यधारा की समृद्ध विरासत से नयी पीढ़ी को रूबरू कराया जाये। यूं तो काव्य में दिलों को जोड़ने की अपनी ही ताकत होती है, मगर यदि इसे नयी पीढ़ी के मिजाज़ के अनुसार ढाला जाये तो बात बन जायेगी। फिर शुरुआत हुई, हिंदी कविता प्रोजेक्ट की। हिंदी के स्थापित और नये कवियों की कविता से इसकी शुरुआत की गई। इसे  उन्होंने प्रतिष्ठित हस्तियों से पढ़वाया, जिसमें जाने-माने फिल्मी सितारे, निर्माता-निर्देशक, सोशल एक्टिविस्ट, कवियों व शायरों ने प्रभावी भूमिका निभायी। हिंदी के साथ उर्दू भी चली।
दरअसल, मनीष ने ऐसे रचनाकारों को चुना, जिन्होंने अपने दौर में लोगों को गहरे तक प्रभावित किया। फिर इस मुहिम में सेलिब्रिटीज के जुड़ने से ‘सोने में सुहागा’ की कहावत चरितार्थ हुई। अपनी निर्माता-निर्देशक की भूमिका तथा तकनीकी ज्ञान के बूते उन्होंने कविताओं के वीडियो बनाकर यू ट्यूब चैनल पर अपलोड किये। करीब पांच सौ से अधिक वीडियो अब तक वे अपलोड कर चुके हैं।
हिंदी के साथ कलाकारों की जुगलबंदी
आज कविता-शायरी की रोचक प्रस्तुति ने देश-विदेश के हिंदी प्रेमियों को काव्यधारा से जोड़ा है। सुरेखा सीकरी, नसीरूद्दीन शाह, पीयूष मिश्रा, मनोज वाजपेयी, स्वानंद किरकिरे, इम्तियाज अली, स्वरा भास्कर आदि ने अपने अंदाज व आवाज से कविता को मर्मस्पर्शी बना दिया। आधुनिक तकनीक व उम्दा कलाकारों की जुगलबंदी से कविता फिर से जी उठी। मनीष का तकनीकी ज्ञान और फिल्म व टीवी कार्यक्रमों के निर्माण का अनुभव कविता में नये रंग भर देता है। लोग इन कविताओं को देख-सुन रहे हैं। सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। हिंदी सेवा की यह सोच हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े की कर्मकांडी सोच से मीलों आगे जा पहुंची है। सही मायनो में, हिंदी से प्रेम का यह ‘अंदाज-ए-इज़हार’ नयी पीढ़ी के हिंदी प्रेमियों को कविता का चस्का लगा रहा है। डिजिटल मीडिया, बड़े साहित्यकार, बड़ी फिल्मी हस्तियां और मनीष की सोच मणि-कंचन संयोग बना रही हैं।
लोग जुड़ते गये, कारवां बनता गया
हिंदी-उर्दू कविता प्रोजेक्ट की कामयाबी के बाद वे पंजाबी व अन्य भारतीय भाषाओं को जन-जन तक पहुंचाने की मुहिम के साथ जुड़ गये हैं। शोध कार्य चल रहा है, लोगों से मिलने-मिलाने का दौर चल रहा है। नये अंदाज में साहित्य की बयानी। बहरहाल, जो काम हिंदी के स्वनामधन्य बड़े मठाधीश नहीं कर पाये, वो मनीष ने अपने संकल्पों, हिंदी प्रेम के बूते सिरे चढ़ाया। लोग जुड़ते चले गये, कारवां बनता गया।
‘मिलकर चलेंगे तो और खिलेगी हिंदी’
खरी-खरी कहने के अभ्यस्त मनीष कहते हैं कि हिंदी समृद्ध भाषा है। हम किसी भाषा के खिलाफ नहीं हैं। अंग्रेजी सामान्य चीज है। वही चार-पांच सौ शब्द। जिनका इस्तेमाल करके व्यक्ति अंग्रेजी बोल भी सकता है और लाखों कमा भी सकता है। सही मायनों में हम तो मातृभाषा में साहित्य के मजे लूट रहे हैं। नि:संदेह हिंदी में बहुत काम हो रहा है। समस्या यह है कि हर आदमी अपना आइलैंड बनाकर बैठा है। सबका अपना वर्चस्व है। यदि सब मिलकर चलें तो हिंदी दुनिया में छा जायें। हिंदी साहित्य मन में रचा-बसा है। यही इसकी ताकत है, जिसे मंच देने की जरूरत थी, हमने बस यही किया। ‘क से कविता’ यानी कविताओं से करीबी। ‘हिंदी कविता से इश्क’। मातृभाषा के लिए कुछ करने का जज्बा, तकनीक व आधुनिक सूचना माध्यमों का उपयोग तथा हृदयस्पर्शी अंदाज ने कविता की तासीर बदली है।
इनोवेशन के दौर में मातृभाषा
इंटरनेट और तकनीक के माध्यम से साहित्य को रंगत देने वालों में अकेले मनीष ही शामिल नहीं हैं। अच्छा साहित्य पढ़ने-लिखने के शौकीनों की मनपसंद का रचना-संसार उपलब्ध कराने के अनेक सार्थक प्रयास हुए हैं, जिसके लिए साहित्य के मुरीदों को पुस्तकालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। ये लोग साहित्य की परंपरागत धारा से नहीं जुड़े, फिर भी इन साहित्य प्रेमियों ने कविता और अन्य विधाओं के साहित्य को एक सहज उपलब्ध छतरी के नीचे लाने का सार्थक प्रयास किया। भूमंडलीकरण के दौर में सिमटी दुनिया में आज साहित्य के अनाम योद्धाओं के प्रयास से विपुल सहित्य आज इंटरनेट व सोशल मीडिया पर उपलब्ध है। आप मनपसंद कवि की कविता सुन व देख सकते हैं। यहां तक कि बाल पाठकों को रोचक तरीके से कविता पढ़ाना और सिखाना आसान हो गया है। मोबाइल एप और इंटरनेट के जरिये ये और आसान हुआ है।
बदलाव के दौर में आज हिंदी साहित्य का चेहरा नयी रंगत लिये हुए आशावाद का संचार कर रहा है। इस नयी जमीन पर हिंदी ने अपने पंखों को विस्तार दिया है। साहित्य पर केंद्रित अनेक वेबसाइट्स और ब्लॉग आज बेहद लोकप्रिय हैं। इनमें कविता कोष, हिंदी समय.कॉम तथा कुछ संस्थागत प्रयास शामिल हैं, जिन्होंने कविता पढ़ने के अंदाज को बदला है। ‘कविता कोष’ में हजारों कविताएं, हजारों कवियों के पेज, देशी-विदेशी अनुवादित कविताओं को एक जगह पढ़ने का सुकून मिलता है, जिसका श्रेय किसी साहित्यकार काे नहीं बल्कि आईटी प्रोफेशनल और अपने जुनून के लिए विदेश से लौटे ललित कुमार को है। कभी अपने शौक के लिए इंटरनेट पर कविताएं तलाशने का जुनून आज एक बड़े सार्थक लक्ष्य में तबदील हो चुका है। इन्हें एक जगह एकत्र करने की कोशिश कालांतर कविताओं के विस्तृत संकलन में बदल गई।
इंटरनेट के जरिये साहित्य को एक छतरी तले एकत्र करने के जहां व्यक्तिगत प्रयास हुए, वहीं कतिपय संस्थागत प्रयासों के भी सार्थक परिणाम सामने आये। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की साइट समय डॉट कॉम पर साहित्य की तमाम विधाओं का सुरुचिपूर्ण संग्रह उपलब्ध है, जिसमें कविता, निबंध, उपन्यास, पत्र, आलोचना आदि विधाओं का व्यापक संकलन उपलब्ध है। अनेक रचनाकारों का विस्तृत रचना संचयन विद्यमान है। इस तरह इन वेबसाइटों के अलावा तमाम ब्लॉग साहित्य रसिकों की साहित्य की क्षुधा शांत कर रहे हैं। बदलते वक्त में सूचना-तकनीक की उन्नति के साथ साहित्य की जुगलबंदी ने हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध ही किया है, जिसका दरवाजा आपके स्मार्टफोन में खुलता है।
इस मुहिम का सुखद पहलू यह है कि आज हिंदी के लेखक व पाठक परंपरागत धारा से नहीं आ रहे हैं। वे तकनीकी संस्थानों, प्रबंध संस्थानों व अन्य पेशों से आ रहे हैं। यहीं से नया पाठक वर्ग भी उभरा है। वह तकनीक का बेहतर ढंग से इस्तेमाल कर रहा है। इतना ही नहीं, रचनाओं की विषय-वस्तु व उसके आकार में भी बदलाव महसूस किया जा रहा है। फेसबुक व ट्विटर में शब्दों की सीमाओं ने रचनाओं को छोटे प्रारूप में ढाला है। जहां पाठक रचना को पढ़कर तुरंत प्रतिक्रिया भी देता है। ‘जगरनॉट’ जैसे एप मोबाइल पर ई-बुक उपलब्ध करा रहे हैं।
नये दौर के लेखकों ने हिंदी को स्मार्ट बनाने की कोशिश की है। इस युगांतरकारी बदलाव से नये पाठक वर्ग का विस्तार हुआ है और लेखक-पाठक का संवाद तुरत-फुरत हुआ है। छोटी पत्रिकाओं के जरिये होने वाला विमर्श अब सोशल मीडिया पर विद्यमान है। किस्सागोई की नयी रोचक शैली विकसित हुई है।
विभिन्न प्लेटफार्मों पर साहित्य
इंटरनेट के जरिये विभिन्न प्लेटफार्मों पर रचा जा रहा साहित्य सरल-सहज, प्रभावपूर्ण व रोचक अंदाज में नयी पीढ़ी के पाठकों तक पहुंचा है। नये मिजाज के विषयों का चयन, लीक तोड़ती शैली तथा जीवन राग को अपने अंदाज में अभिव्यक्त करने का जुनून देखते ही बनता है। नये प्रयोगों के जरिये हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय पाठकों से जोड़ने का अवसर मिला है। पांडित्यपूर्ण शब्द आडम्बरों से मुक्त भाषा में प्रेम-जीवन राग की बेलाग अभिव्यक्ति नजर आती है जो साहित्य के प्रति दुराग्रहों की लीक को तोड़ती है। खास बात यह है कि नये दौर के हिंदी साहित्य में समकालीन समाज का आईना नजर आता है जो इस मिथ को तोड़ता है कि हिंदी साहित्य के पाठक सिमट रहे हैं। इस माध्यम से नया गतिशील पाठक वर्ग सामने आ रहा है जो जीवन की जीत के साथ जीवन की हार को विषय-वस्तु बनाकर कारकों की पड़ताल करता नजर आता है। सहज-सरल भाषा और संवेदना के सूत्र वाक्यों से नयी पीढ़ी का पाठक फिर साहित्य की ओर लौट रहा है, जिसको साहित्य के दिग्गज साहित्य से कटा मानकर चल रहे थे।
उल्लेखनीय यह भी है कि हिंदी अखबारों की वेबसाइटों ने नये हिंदी पाठकों को जोड़ा है। रोज़ाना लाखों हिट इन वेबसाइटों को मिल रहे हैं, जिनके मुकाबले ब्लॉगों व सामान्य वेबसाइटों का दायरा हजारों तक सिमटा रहता है। हिंदी की टाइपिंग तकनीक में सरलता तथा स्पीच तकनीक के विकास ने लिखने के तौर-तरीकों को आसान बनाया है। जरूरत अब सरल-सहज विस्तृत शब्दकोश की है ताकि नयी पीढ़ी के पाठक शब्दों की जटिलता में उलझकर हिंदी से न छिटकें।


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