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ट्रैफिक रूल्स की रेड लाइट

Posted On September - 9 - 2019

अभिषेक कुमार सिंह
मुमकिन है कि कई लोगों के लिए नियम-कानून तोड़ना शान की बात हो। रसूखदार, ऊंचे संपर्कों वाले और जेब में नोटों की गड्डी लेकर चलने वालों के लिए कानून को ठेंगा दिखाना कभी मुश्किल नहीं रहा, लेकिन पहली सितंबर, 2019 से देश में लागू संशोधित नये मोटर वाहन कानून के बाद से इस मामले में स्थितियां काफी बदल गयी हैं। सड़क पर वाहन लेकर निकले लोगों को छोटे-छोटे नियमों की अवहेलना पर इतना भारी जुर्माना चुकाना पड़ रहा है कि वे अब कार-स्कूटर लेकर निकलने से पहले नियम-कानून के बारे में चार बार सोचते हैं।
कुछ उदाहरण हैं, जिनसे नये ट्रैफिक नियमों के लागू होने के बाद बने हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है। हरियाणा के गुरुग्राम में ट्रैफिक पुलिस ने एक ट्रैक्टर-ट्रॉली ड्राइवर का कई नियमों के उल्लंघन के आरोप में 59 हजार रुपये का चालान काट दिया। उससे पहले, 2 सितंबर को गुरुग्राम में ही एक स्कूटी चालक पर विभिन्न मामलों में 23 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था। उक्त व्यक्ति ने यह कहते हुए जुर्माना भरने से इनकार कर दिया कि उसकी स्कूटी की कीमत ही मात्र 15 हजार रुपये है। इसी तरह, एक ऑटो ड्राइवर को नशे की हालत में ड्राइव करने, ड्राइविंग लाइसेंस समेत जरूरी दस्तावेज नहीं होने के कारण 47,500 रुपये का चालान भुगतना पड़ा। ऐसे ही कई चालान ऑटो चालकों के हुए हैं, जिनके जुर्माने की राशि उनके वाहन की कीमत से कई गुना ज्यादा है। इस बीच, सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो भी जारी हुए हैं, जिनमें दिखाया गया कि मोटरसाइकिल चालकों का एक बड़ा समूह ट्रैफिक पुलिस के सामने से बिना हेलमेट लगाए पैदल निकल रहा है और मजाक उड़ा रहा है, क्योंकि चालान बिना हेलमेट ड्राइविंग करने पर है, मोटरसाइकिल लेकर पैदल चलने पर नहीं।
गौरतलब है कि मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 में संशोधन के प्रस्ताव को संसद ने जुलाई में पास किया था। अगस्त में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने इसकी अधिसूचना जारी की। यह इसी महीने एक सितंबर से देशभर में लागू हो गया है। यह अलग बात है कि तेलंगाना और राजस्थान जैसे राज्यों में नया कानून अब भी लागू नहीं किया गया है।
नये यातायात कानून पर सवाल भी उठ रहे हैं। जैसे कि क्या देश में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं के मद्देनजर ऐसे सख्त कानूनों की जरूरत है या नहीं? सख्ती की बजाय क्या जागरूकता की मुहिम इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता? क्या इससे ट्रैफिक पुलिस में भ्रष्टाचार को और बढ़ावा नहीं मिलेगा? क्या यह बेहतर नहीं होता कि पहले सड़कों की हालत सुधारी जाती, रोड इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतर किया जाता?
इसमें संदेह नहीं है कि लापरवाही, मानवीय भूल, नियम-कानून की अनदेखी और ट्रैफिक महकमे में कायम भ्रष्टाचार ने हमारे देश की सड़कों को खूनी मार्ग में बदल दिया है। हर साल देश में सड़क हादसों में औसतन डेढ़ लाख मौतें होती हैं। लगभग साढ़े 4 लाख लोग घायल होते हैं। सड़क दुर्घटनाओं में लोगों की जान जाने के अलावा प्रॉपर्टी का भी नुकसान होता है। कुल आकलन कहता है कि इन वजहों से हो रहा नुकसान देश की जीडीपी के 2 फीसदी के बराबर है। इन सारे आंकड़ों को देखकर यह स्वाभाविक है कि देश में हादसों को रोकने वाले कड़े कानून हों और नियम तोड़ने वालों को भारी दंड दिया जाए। इस नजरिए से देखें तो मोटर व्हीकल एक्ट सुधार का एक बड़ा कदम हो सकता है। तकनीकी रूप से इस बिल को कानून की शक्ल में लागू करने पर गलत ड्राइविंग करने वालों को न सिर्फ पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा जुर्माना देना होगा, बल्कि लंबे समय तक जेल की सजा भी भुगतनी पड़ेगी। इसका असर, कई राज्यों में दिखने भी लगा है। हालांकि, लंबे समय तक कानून का सौ फीसदी पालन कराना पहले की तरह बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में सवाल ये है कि क्या सख्त कानून और भारी जुर्माने से सड़क हादसों को कम किया जा सकेगा।
इस बारे में सड़क-परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने साफ किया है कि चाहे कुछ हो जाए, इससे संबंधित फैसले पर यूटर्न मुमकिन नहीं है। दंड की राशि बढ़ाने का मकसद लोगों को सतर्क रहने के लिए बाध्य करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यातायात नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने में भारी वृद्धि का फैसला कानून का पालन अनिवार्य बनाने के लिए किया गया है, न कि सरकारी खजाने को भरने के मकसद से। उनका कहना है कि देर-सबेर देश में लोगों को जुर्माने से बचने के लिए यातायात नियमों का पालन करने की आदत पड़ जाएगी और इस तरह सड़कों को महफूज बनाया जा सकेगा। लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा सवाल दंड और जुर्माने की राशि का है। जुर्माने की रकम में भारी इजाफे पर जनता की आपत्ति है। इसी को कारण बताते हुए पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और तेलंगाना की सरकारों ने नये कानून को लागू करने से इनकार कर दिया है। उधर, राजस्थान सरकार ने साफ किया है कि जुर्माने की राशि की समीक्षा के बाद ही इस पर निर्णय लिया जाएगा। लेकिन क्या जुर्माने में कमी करके हादसों को थामा जा सकता है। विदेशों के अनुभव बताते हैं कि वहां सड़कों पर अनुशासन कायम रहने के पीछे एक बड़ी वजह ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के दोषियों पर लगने वाला भारी जुर्माना है। अपने देश में भी इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है कि कई बार लोग ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन यह सोचकर करते हैं कि पकड़ लिए गये तो सस्ते में छूट जाएंगे। कुछ लोगों के लिए नियम तोड़ना शान की बात हो गई है। सड़कों पर ‘अराजकता’ की यह एक बड़ी वजह है। तेज रफ्तार से आए दिन लोगों की जान जाने, शराब पीकर कहीं भी गाड़ी ठोक देने और हेलमेट न पहनने के कारण मामूली एक्सिडेंट में भी मौत की खबरें आती रहती हैं। रोडरेज हमारी सड़कों की स्थायी महामारी है। लेकिन इससे भी बड़े सवाल कुछ और हैं।
जुर्माने और सजा के इन सारे इंतजामों से अलग ज्यादातर सड़क हादसों के बारे में आम राय यह है कि ये दुर्घटनाएं मानवीय भूल का नतीजा होती हैं। ट्रैफिक सिग्नल की अनदेखी, हेलमेट नहीं पहनना, सीट बेल्ट न लगाना, ड्राइविंग के वक्त सो जाना और नाबालिग को वाहन चलाने के लिए देना ऐसी ही भूलें हैं। लेकिन सड़क हादसों को मानवीय भूल के तर्क से आगे देखने की जरूरत है। इसकी एक मिसाल कुछ अरसा पहले दिल्ली-आगरा के बीच बने यमुना एक्सप्रेस-वे पर मिली थी, जहां उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की 50 यात्रियों से भरी बस लखनऊ से दिल्ली के रास्ते में ड्राइवर को अचानक झपकी आने से अनियंत्रित होकर रेलिंग तोड़कर नाले में जा गिरी थी और तमाम यात्रियों की जान चली गई थी। शुरुआत में यह दावा किया गया कि हादसा मानवीय भूल का नतीजा था, लेकिन असलियत में इसका एक कारण लखनऊ से दिल्ली के 500 किलोमीटर के सफर की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ एक ड्राइवर पर होना भी था, जबकि नियम 400 किलोमीटर पर ड्राइवर बदलने का है। थकान की स्थिति में ड्राइवर की सफर में आंख लगना आखिर कैसे मानवीय भूल हो सकती है? रोडवेज के पास ड्राइवरों की कमी है। मांग के अनुपात में बसें कम हैं, इसलिए अनुबंधित बसें चलाई जाती हैं। इनके ड्राइवर किसी भी शर्त पर काम करने को तैयार रहते हैं। एक बड़ी समस्या राज्य सड़क परिवहन निगम के दायरे से बाहर चलने वाली बसों की है, जिनमें तय संख्या से ज्यादा सवारियां बैठाई जाती हैं और इनके ड्राइवर भी प्रशिक्षित नहीं होते। इन्हें रोडवेज की बसों के रंग में रंगवा दिया जाता है, लेकिन न तो इनके रूट का ठिकाना है, न ही ये कोई नियम-कानून का पालन करती हैं।

सिस्टम भी दोषी
जुर्माने और सजा की व्यवस्थाओं को आलोचना के दायरे से बाहर रखने में कोई गुरेज नहीं है, बशर्ते जुर्माने की बढ़ी रकम की ओट में ट्रैफिक पुलिसकर्मी विधिवत चालान करने की बजाय खुद की जेब भरने में न लग जाएं। अभी यही होता है कि यातायात नियमों की अनदेखी पर बहुसंख्य लोग ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की नीयत जानते हुए सौदेबाजी कर तय जुर्माने से आधी रकम पर बात रफा-दफा करवा लेते हैं। मुमकिन है कि चंडीगढ़-दिल्ली जैसे बड़े शहरों में मौके पर मामले रफा-दफा करने वाली ऐसी नजीर की संख्या कम हो, लेकिन देश के बाकी शहरों में तो तकरीबन यही हालात है। सिस्टम दुर्घटनाओं के लिए फर्जी लाइसेंसधारकों को कठघरे में खड़ा करता है, लेकिन सवाल है कि ये फर्जी लाइसेंस बनाए किसने? यह जगजाहिर तथ्य है कि देश में 30 फीसदी से ज्यादा ड्राइविंग लाइसेंस फर्जी हैं। लेकिन इसके दोषी आम लोगों से ज्यादा वह व्यवस्था है, जिसने फर्जी लाइसेंस बनाए या बनने दिए। सच्चाई यही है कि देश के परिवहन क्षेत्र में भारी भ्रष्टाचार है, लिहाजा न तो सड़कों की ढंग से मरम्मत होती है और न ही बसों की मेंटेनेंस। इसी कारण बसों में बैठने वालों की जिंदगी दांव पर लगी रहती है। अगर देशभर में बसों के अलावा सड़कों और हाईवे के रख-रखाव, सार्वजनिक वाहनों के परिचालन, ड्राइवरों की योग्यता और अन्य मामलों में एक-समान मानक लागू कर उनका पालन सुनिश्चित कराया जाए तो लोग खुद के या किसी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली के जरिए निश्चिंत होकर यात्रा कर सकेंगे।
पहले से कई गुना जुर्माना
नये कानून में जुर्माने और सजा के जो प्रावधान हैं, वे पहली नजर में ही हर किसी को चौंका देते हैं। हेलमेट नहीं पहनने पर दुपहिया वाहन चालक को पहले के 100 रुपये की बजाय अब 10 गुना ज्यादा यानी एक हजार रुपये जुर्माना भरना पड़ेगा। कार में सीट बेल्ट नहीं पहनने पर भी 100 रुपये की जगह 1000, बिना इंश्योरेंस के गाड़ी चलाने पर मौजूदा 1000 रुपये के स्थान पर 2000 रुपये, रोड रेज 500 रुपये की जगह 10 गुना ज्यादा 5 हजार रुपये का जुर्माना भरना पड़ेगा। सीट बेल्ट नहीं पहनने पर भी जुर्माने की रकम 10 गुना कर दी गई है। शराब पीकर गाड़ी चलाने और खतरनाक ढंग से ड्राइविंग करने पर जुर्माना 5 गुना तक बढ़ा दिया है। ड्रंकन ड्राइविंग पर जेल की सजा का भी प्रावधान है। नाबालिग की ड्राइविंग के मामले में जुर्माना एक हजार से बढ़ाकर 25 हजार और 3 महीने जेल की सजा को बढ़ाकर 3 साल कर दिया गया है। नाबालिग के खिलाफ भी जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत कार्रवाई की जाएगी। हिट एंड रन मामले तेजी से बढ़े हैं। वर्ष 2018 में ऐसे 55 हजार केस आए थे, जिनमें 22 हजार लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। नये कानून के मुताबिक, ऐसे मामले में पीड़ित के घायल और मृत होने पर आरोपी वाहन चालक पर साढ़े 12 हजार और 25 हजार जुर्माने की व्यवस्था की गई है। हालांकि, सड़कों के नियमों के उल्लंघन और हादसे की स्थिति में सारी सजा वाहन चालकों के लिए ही नहीं हैं, बल्कि वाहन की गलत बनावट और उससे सुरक्षा के मानदंड पूरे नहीं होने पर वाहन डीलर पर एक लाख रुपये और निर्माता पर 100 करोड़ के जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। दोषपूर्ण सड़क बनाने वाली कंपनी या ठेकेदार पर एक लाख रुपये जुर्माने की बात नये कानून में है। इसके तहत मोटर दुर्घटना कोष भी बनाया जाएगा, जो सड़क का इस्तेमाल करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अनिवार्य बीमा कवर देगा। लेकिन सड़क के गड्ढों के लिए इंजीनियर-ठेकेदारों को शायद ही कभी तय जुर्माना चुकाने के लिए बाध्य किया जा सके, क्योंकि वे तो व्यवस्था यानी सिस्टम से मिलकर ही खराब सड़कें और बदतर इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करते हैं।
दुनिया में सख्ती ऐसी भी
ट्रैफिक नियमों को लेकर अन्य देशों में भी काफी सख्ती और भारी-भरकम जुर्माना है। लिथुआनिया में तो ट्रैफिक नियमों को लेकर इस कदर सख्ती है कि राजधानी विनियस में वहां के मेयर ने ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर एक कार को टैंक से सरेराह कुचल दिया था। कार चालक का कसूर इतना था कि उसने साइकिल लेन में कार पार्क कर दी थी। कुछ साल पहले का यह मामला दुनियाभर में सुर्खियों में रहा था।
सिंगापुर में शराब पीकर ड्राइविंग पर साढ़े 3 लाख जुर्माना
अमेरिका में कार चलाते समय सीट बेल्ट नहीं पहनने पर 25 डॉलर यानी करीब 1800 रुपये जुर्माना भरना पड़ता है। ड्राइविंग लाइसेंस नहीं होने पर 500 से 1000 डॉलर यानी 72 हजार रुपये तक दंड देना होगा। इस मामले में 3 साल तक ड्राइविंग लाइसेंस की जब्ती और जेल की सजा का भी प्रावधान है। अमेरिका के इलिनोइस, आयोवा और न्यू हैम्पशायर जैसे कुछ राज्यों में दुपहिया वाहन चालकों को हेलमेट पहनने से छूट हासिल है। लेकिन बाकी राज्यों में हेलमेट पहनना जरूरी है और ऐसा नहीं करने पर 30 से 300 डॉलर यानी 21 हजार रुपये तक जुर्माना है। शराब पीकर ड्राइविंग करने पर 90 दिन के लिए ड्राइविंग लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है। वाहन चलाते समय मोबाइल फोन पर बात करना अमेरिका में सबसे ज्यादा जुर्माने का सबब बनता है, क्योंकि इसके लिए हजार डॉलर यानी करीब 72 हजार रुपये देने पड़ सकते हैं। सिंगापुर में भी वाहन चलाते समय फोन से बात करने पर अमेरिका के बराबर जुर्माना लगता है। वर्ष 2018 में सिंगापुर ट्रैफिक पुलिस ने बेसिक थ्योरी ऑफ ड्राइविंग (नौवां संस्करण) जारी किया था। इसके मुताबिक, वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए पकड़े जाने पर चालक को 6 महीने तक की सजा और एक हजार डॉलर यानी करीब 72 हजार रुपये का जुर्माना देना पड़ता है। ड्रंकन ड्राइविंग पर सिंगापुर में 5 हजार डॉलर यानी करीब साढ़े तीन लाख रुपये का जुर्माना है। साथ ही 6 महीने की जेल का भी प्रावधान है। अगर कोई चालक बिना ड्राइविंग लाइसेंस गाड़ी चलाता है तो सिंगापुर में भी उसे इतना ही जुर्माना चुकाना पड़ता है। साथ ही, तीन महीने की जेल का प्रावधान भी है। सीट बेल्ट लगाए बिना वाहन चलाते पकड़े जाने पर करीब साढ़े 8 हजार रुपये (120 डॉलर) का फाइन और तीन महीने जेल की सजा का प्रावधान है। शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों के लिए रूस में भी काफी सख्त कानून है। वहां ड्रंक ड्राइविंग में 50 हजार रूबल यानी लगभग 54,000 रुपये तक जुर्माना और ड्राइविंग लाइसेंस 3 साल के लिए निलंबित करने का प्रावधान है। ड्राइविंग लाइसेंस के बिना गाड़ी चलाने पर 32 हजार रुपये के बराबर जुर्माना किया जाता है। रूस में कार गंदी होने और बेतरतीबी से कार चलाने पर ट्रैफिक पुलिस चालान काट सकती है।


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