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जीवनदायिनी पहल

Posted On September - 11 - 2019

मरुस्थलीकरण के खिलाफ वैश्विक मुहिम

यह सुखद है कि गरीबी, भुखमरी, खाद्य सुरक्षा, जल संकट और जैव विविधता के लिये संकट पैदा करने वाले मरुस्थलीकरण के विरुद्ध पूरी दुनिया में साझी सोच बन रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट चेताती है कि मरुस्थलीकरण व सूखे के कारण दुनिया में सत्तर करोड़ लोग 2050 तक पलायन के लिये मजबूर होंगे। इन चिंताओं के बीच यह सुखद है कि मरुस्थलीकरण के खिलाफ नयी साझा सोच भारत भूमि से उभरी है। ग्रेटर नोएडा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र संघ मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन यानी यूएनसीसीडी की 14वीं बैठक में दुनिया के दो सौ देशों ने भागीदारी की है। एक उम्मीद जगाने वाली घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की कि भारत वर्ष 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर बंजर भूमि को उपजाऊ बनायेगा। यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत में वर्ष 2015-2017 के बीच वन भूमि के दायरे में आठ लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई है। साथ ही प्रधानमंत्री ने दोहराया कि भारत ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ को पूरी तरह खत्म करने पर प्रतिबद्ध है जो निश्चय ही भू-क्षरण की वजह बन रहा है। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक के प्रयोग को रोके बिना भूमि की उत्पादकता को हासिल करना संभव नहीं होगा। उन्होंने पूरी दुनिया से ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ को अलविदा कहने का आह्वान किया। उन्होंने पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और भूमि क्षरण की चुनौती से मुकाबले के लिये हरसंभव सहयोग देने का वायदा भी किया। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रधानमंत्री की घोषणा का प्रभाव देश के नीति-नियंताओं की रीतियों-नीतियों व क्रियान्वयन तंत्र पर भी नजर आए। नि:संदेह उपजाऊ भूमि का मरुस्थलों में तबदील होना संपूर्ण मानवता के लिये बड़ी चुनौती है, जिससे निपटने के लिये विश्वव्यापी सहयोग व पहल जरूरी है। अन्यथा कालांतर यह एक प्राकृतिक आपदा का रूप ले सकता है। दरअसल, यह संकट हमारी खाद्य सुरक्षा व जीवन की गुणवत्ता से भी जुड़ा है।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर-सरकारी समिति यानी आईपीसीसी ने हाल ही में अपनी एक रिपोर्ट में चेताया था कि दुनिया की 23 फीसदी कृषि योग्य भूमि का विभिन्न कारणों से क्षरण हो चुका है। चिंता की बात यह है कि भारत में ऐसी भूमि का प्रतिशत तीस है। इस जटिल समस्या से जूझने के लिये व्यापक स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है, जिसमें इस आपदा से निपटने के लिए ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के साथ ही खेती के तौर-तरीकों में बदलाव की सख्त जरूरत है। व्यावसायिक खेती में अंधाधुंध रासायनिक खादों के उपयोग से भी भूमि के बंजर होने का प्रतिशत बढ़ा है। आज भूमि प्रबंधन से जुड़ी रीति-नीतियों में भी बदलाव की अावश्यकता महसूस की जा रही है। खेती योग्य भूमि के बंजर होने का घातक परिणाम यह भी है कि इससे पूरी दुनिया में गांवों से शहरों की तरफ पलायन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में हर रोज दो लाख लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं जो पहले से ही जनसंख्या दबाव से चरमराती नागरिक सेवाओं की स्थिति को और विस्फोटक बनाएगा। इससे करोड़ों लोगों को शहरों में दूसरे दर्जे के नागरिकों जैसा जीवनयापन करना पड़ सकता है। इस चुनौती से मुकाबले के लिये पूरी दुनिया को गंभीरता से सोचना होगा। दरअसल, मरुस्थलीकरण की चुनौती से मुकाबला सिर्फ सरकारी कोशिशों से ही संभव नहीं है। इसमें समाज की रचनात्मक भूमिका बेहद जरूरी है। आम लोगों व कृषि व्यवसाय से जुड़े लोगों को इस बाबत जागरूक करने की जरूरत है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत की मेजबानी में हुए यूएनसीसीडी के 14वें शिखर सम्मेलन से मरुस्थलीकरण से जूझने के लिये कोई व्यावहारिक व दूरदर्शी सोच सामने आयेगी। यदि ऐसा होता है तो नि:संदेह यह मानवता के लिये बड़ी उपलब्धि होगी।


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