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छोटी नदी, बड़ा महत्व

Posted On September - 16 - 2019

ब्लॉग चर्चा

मंजीत ठाकुर
बहुत समय से सुनते आए हैं कि नदियां किसी भी सभ्यता का आधार रही हैं और उसकी धमनियों की तरह होती हैं। दुनिया की महान सभ्यताएं नदी घाटियों में विकसित हुई हैं। आप चाहे सिंधु-गंगा घाटी की मिसाल लें या दजला-फरात की। एक नदी अपने इलाके की संस्कृति की वाहक होती है और अपने साथ एक इतिहास और सांस्कृतिक विरासत लेकर चलती है। भारतीय साहित्य में नदियां मौजूद हैं। ऋग्वेद से ही हमारे साहित्य में नदियों का उल्लेख है। धार्मिक महत्व तो खैर है ही। बहुत दुखद है कि हम नदियों को बचा नहीं पा रहे हैं। हम जल्दी ही दुनिया में जल संकट का सामना करने वाले देशों में होंगे। वैसे हम जब भी नदी शब्द कहते हैं तो दिल्ली वालों को यमुना याद आती है (गाद से भरी, काली) और किसी को गंगा। लेकिन इसके साथ ही हम उन छोटी नदियों को भूल जाते हैं। इन छोटी नदियों में से कई बड़े शहरों का शिकार बन गई हैं। इनमें से कुछ तो शहर के अपशिष्ट प्रवाह को बहाने के काम आने वाले नालों में बदल गई हैं। इन छोटी नदियों पर हमारा ध्यान तभी जाता है जब घटिया ड्रेनेज सिस्टम की वजह से बरसात के मौके पर इन नदियों का पानी सड़कों पर आकर जमा हो जाता है।
हमें याद रखना चाहिए कि एक सुचारु नदी तंत्र भारत की बाढ़ जैसी आपदाओं से बचाव का एक रास्ता हो सकता है। इन दिनों बनारस बहुत चर्चा में है। हाल के हिंदी लेखकों की नौजवान पीढ़ी ने अस्सी घाट को भी बहुत तवज्जो दे दी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवी दुर्गा ने शुम्भ-निशुम्भ नामक असुरों का वध करने के बाद जहां अपनी तलवार फेंकी थी, उस स्थान पर ही महादेव कुंड बना और इससे निकले पानी से ही असि (बाद में अस्सी) नदी का उद‍्गम हुआ। तलवार को संस्कृत में असि कहते हैं। यह अस्सी नदी पहले अस्सी घाट के पास गंगा में मिलती थी, पर गंगा कार्य योजना के बाद से इसे मोड़ कर लगभग दो किलोमीटर पहले ही गंगा में मिला दिया गया। यही नहीं, सरकारी फाइलों में भी इसे अस्सी नदी नहीं बल्कि अस्सी नाला का नाम दे दिया गया है। आज की पीढ़ी को पता नहीं होगा कि अपनी विरासतों को सहेजने में जितनी उदासीन हमारी सरकार है, उतने ही हम भी हैं। और जिस नाले में हम मूलमूत्र विसर्जित करके प्रकारांतर से गंगा में भेज रहे हैं, वह नदी थी और वाराणसी के वातावरण के लिए आवश्यक थी। पर जिस देश में गंगा की ही फिक्र कम है, उसमें बेचारी वरुणा और असि की क्या बिसात। वरुणा भी साथ में ही काल का ग्रास बन रही है। पर क्या यह मुमकिन है कि जिन नदियों के नाम पर वाराणसी शहर बसा, उन नदियों के विलुप्त होने के बाद कुछ बचा रह जाएगा। कोई शहर लाख शिव के त्रिशूल पर बसा हो, पर बिना पानी के जड़े सूख ही जाएंगी।

साभार : गुस्ताख डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम


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