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गलती का अहसास

Posted On September - 7 - 2019

याद रही जो सीख

सन्तोष गुप्ता
मेरी मां बहुत ही सहनशील व धार्मिक विचारों वाली थी। वह हमेशा ही दूसरों की सहायता व सेवा के लिए तैयार रहती थी। कभी किसी से लड़ना या ऊंची आवाज़ में बात करना उन्हें आता ही नहीं था और यही सीख वह हमेशा मुझे भी देती थीं।
मेरे सामने वाली पड़ोसन अच्छी भी बहुत थी, पर उसे गुस्सा भी जल्दी आता था। एक बार बच्चों की छोटी सी बात पर वह मुझसे नाराज़ हो गई और बोलचाल बंद हो गई। कुछ दिन बाद किसी दूसरी पड़ोसन से उसकी लड़ाई हो गई और उसकी आड़ में वह मुझे गालियां देने लगी। शोर सुनकर जब मैं बाहर आई तो वह मुझे देखकर और ज्यादा भड़क गई और गंदे शब्द बोलने लगी। मैं शांत रही और पलट कर कोई जवाब नहीं दिया पर दिल में बहुत दुखी हो रही थी। मेरे पति कहने लगे कि तुम उदास मत होओ, मैं भाई साहब से खुद बात कर लूंगा।
दोपहर को जब सामने वाले भाई साहब खाना खाने आए तो कुछ देर बाद मेरे पति उनके घर गए। जैसे ही उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो वह दोनों हाथ जोड़े और गर्दन झुकाए इनसे माफी मांगने लगे और खुद ही बताने लगे कि मेरी घरवाली तो बहुत ही शर्मसार हो रही है कि मैंने उन्हें अपशब्द कहे पर उन्होंने पलटकर कोई जवाब नहीं दिया। आप भाभी जी से कहना कि वह अपना मन दुखी ना करें। हम शाम को आपके घर आएंगे और भाभी जी के हाथ की चाय पीकर और माफ़ी मांग कर जाएंगे। उस दिन वे शाम को हमारे घर आए। मुझे बहुत खुशी हुई कि मां की दी हुई सीख के कारण ही यह सब संभव हुआ।


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