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कुदरती खेती कमाल की

Posted On September - 2 - 2019

राजकिशन नैन
कुदरत ने महामूल्यवान संपदा के रूप में जो चीजें हमें उपहार में दी हैं, उनमें धरती यानी माटी की महिमा सबसे ज्यादा है। धरणी धन से परिपूर्ण है, इसीलिए बड़ों ने इसे वसुंधरा कहा है। मेरी मां सवेरे खाट छोड़ते ही सबसे पहले तीन बार धरती को मैया कहकर चुचकारा करती और इससे सुखी जीवन के लिए इन शब्दों में प्रार्थना किया करती-
‘धरती माता तू सूद्धी, तेरे से बड़ा न कोय।
तेरे ऊपर पग धरै तो सुख में वासा होय।।’
किसान होने के नाते मेरे पिता का भी खेत की माटी से उतना ही मोह था, जितना चातक का मेघ से होता है। वे नित्य खेत की माटी को मस्तक पर लगाया करते और खेती को सारे जहान की माता कहा करते। खेती का सारा काम वे अपने हाथों से किया करते और बांगरू की एक कहावत अकसर दोहराया करते-
‘खेती, पाती, बीनती अर घोड़े का तंग।
अपने हाथ सम्हारिये, लाख लोग हों संग।’
कीट-पतंगों और पशु-पक्षियों के साथ भी उनका अपार स्नेह था। उनका विचार था कि वह किसान भाग्यवान होता है, जिसके घर और खेत में पशु-पक्षियों का गुजर-बसर होता है। इस संबंध में वह एक देसज कहावत कहा करते थे-
‘पसु, पखेरू जीव बिन बंजर होज्या खेत।
जी कै नेड़ै राखियो, तकियो इनका हेत।।’
वे बैलों की हिफाजत बड़े जतन से करते थे। उन्हें खूब खिलाते-पिलाते थे। वे खुद भूखे रह जायें तो रह जायें, मगर बैलों को हरगिज भूखा न रहने देते थे। वे बैलों को किसान के अगले पांव बताया करते। वे गर्व से कहा करते कि एक गठरी भूसे के एवज में बैल सारा दिन छाती फाड़कर हल खींचते हैं। उनका अटल विश्वास था कि गऊ के जायों के खुरों के स्पर्श से हर्षित होकर धरा सोना उगलती है। मेरे पिता पारंपरिक खेती के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने जीते-जी अपने खेत में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होने दिया। हरित क्रांति को वे विदेशियों की भ्रांतकारी चाल कहा करते थे। चौपाल-चर्चा के दौरान वे जोर देकर कहा करते थे कि रासायनिक खादों, कीटनाशकों, संकर बीजों तथा कृषि की आयातित तकनीक से पुश्तैनी धंधों से जुड़े देहातियों और खेतिहर लोगों का कदापि भला नहीं होगा। आज गांवों और किसानों की जो दर्दनाक दुर्दशा हमें देखनी पड़ रही है और उसके लिए हरित-क्रांति ही उत्तरदायी है। शहरीकरण व औद्योगीकरण के हिमायतियों और कुदरती खेती का खातमा करने वाले कृषि वैज्ञानिकों ने तरक्की के रास्ते पर देश को दौड़ाने की जल्दबाजी ने गांवों को हाशिए पर धकेलकर अन्नदाता को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दिया है। राजनीतिक पार्टियों ने कृषि और किसानों की जो उपेक्षा की है उसका खमियाजा समूचा देश भुगत रहा है। हम जहर बो रहे हैं और ज़हर खा रहे हैं। हमारे बड़ों ने जिस माटी को मां का दर्जा दिया, उसकी बेहुरमती करने में हमने कोई कसर बाकी नहीं रखी है। हम माटी का मान रखने की बजाय उसे नीची निगाह से देखते हैं तथा अन्न व जल रूपी अमृत उगलने वाली जमीन में सैकड़ों प्रकार के घातक रासायनिक खाद व कीटनाशक ठूंस-ठूंसकर उसे बंजर बनाने पर उतारू हैं। केवल दो कोड़ी की खातिर हमने जमीन की समस्त गरिमा नेस्तनाबूद कर दी है। हमारी संस्कृति में क्षणिक लाभ के लिए धरती के दोहन को अधर्म कहा गया है। धरती की जैव संपदा को नष्ट करके हम अपनी अगत में डले बो रहे हैं। हमारा कैसे निस्तार होगा? अन्न प्रदूषण से हमारा शरीर कंडम हो गया है। जल प्रदूषण से हमारे प्राणों पर संकट आन पड़ा है। भू-प्रदूषण से हमारा धर्म भ्रष्ट हो गया है। वायु प्रदूषण से हमारा धैर्य लुप्त हो गया है और पर्यावरण प्रदूषण से हमारी धारणा-शक्ति नष्ट हो गई है। हमें और सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारा जीवन जमीन के सहारे चल रहा है और इसमें किसी भी तरह की लापरवाही की छूट नहीं दी जा सकती।
मैं प्रकृति का अदना-सा अरदली हूं और खेती-बाड़ी का काम करता हूं। मैं पिछले दस साल से पांच एकड़ जमीन में कीटनाशकोंं के बिना कुदरती यानी असली खेती कर रहा हूं। हमने तय किया है कि किसी भी सूरत में हम अपने खेत में कृत्रिम खाद और कीटनाशक दवा नहीं डालेंगे। कृषि में कीटनाशकों के इस्तेमाल को रोकने की यह पहल हमारे घर व खेत में आशा की संजीवनी लेकर आयी है। हमारे खेत में केंचुओं की तादाद बढ़ गई है। खेत में खड़े वृक्षों पर कोयल और बुलबुल गीत गाने लगी हैं। पीपल पर लक्ष्मी के वाहन उल्लू का परिवार बस गया है तथा मोर वहां रात्रि विश्राम की खातिर आने लगे हैं। फलोंं और सब्जियों का रंग विस्मय की हद तक चटक हो गया है। पड़ोसियोंं के मुकाबले गेहूं और धान के दानोंं का आकार और वजन बढ़ने लगा है। यही नहीं, खेत में बनी कुईं का पानी और अधिक मीठा हो गया है। खेत में उगने वाले खरपतवार को हम हमेशा खुरपी और दराती से निकालते हैं। मेरे ताऊ देसू कहा करते-
‘बांध कुढारी, खुरपी हाथ।
लाठी हंसुआ, राखै साथ।।
काटै घास अर खेत निरावै।
सो पूरा किसान कहावै।।’
देसी तरीके से अड़ंगा निकालने से किसान के मित्र कीटों की प्राण हानि नहीं होती। गाय के गोबर, मूत्र और घास-पात को गला-सड़ाकर गोबर की खाद हम खुद बनाते हैं। गोबर की खाद खेत के लिए उतनी ही जरूरी है जितना आदमी के लिए भोजन-पानी। बांगरू की कहावत है-
‘खाद पड़ै तो खेत,
नहीं तो कूड़ा-रेत।’
गोबर की खाद से जमीन में सूक्ष्म जीवाणु, केंचुए और कीड़े-मकोड़े पैदा हो जाते हैं जो माटी को नरम, छिद्रित और पानीदार बनाते हैं। देसी खादों से माटी की गुणवत्ता बढ़ती है तथा इनसे पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता। हरी खाद के लिए हम उड़द, मूंग, मोठ, मटर, अरहर, जौ, ज्वार व जई आदि बोते हैं तथा बिजाई के 45 दिन बाद जमीन जोतकर उसे माटी में मिला देते हैं। धान के अवशेषों की सानी काटकर उसे भी खेत में बिछा देते हैं। वृक्षों की सूखी पत्तियां भी खाद का काम देती हैं। देसी खादों के इस्तेमाल से हमारे खेत में मृदा उर्वरता के लिए जरूरी सभी पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ रही है। हम अपने खेत में घर का शुद्ध बीज इस्तेमाल करते हैं। फसल की पैदावार शुद्ध बीज पर निर्भर है। खाद से भरे खेत में बढ़िया फसल तभी उग सकती है, जब शक्ति से परिपूर्ण बीज बोया जाए। कृत्रिम बीज धरती में गल जाता है, किन्तु निर्दोष बीज सौगुना फलता है। कहावत है –
‘स्वस्थ बीज हीरा-सा चमकै,
पड़ा खेत में हरदम दमकै।’
माटी की ताकत बनाये रखने के लिए हम साल-दो-साल के अंतर पर फसलों की अदला-बदली जरूर करते हैं। एक ही तरह की फसल कई साल लगातार कभी नहीं बोते। एकाध बार हम साल में एक ही साख लेते हैं। दूसरी साख के समय जमीन की जुताई करके उसे खाली छोड़ देते हैं। ऐसा करने से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। गेहूं की पैदावार हमारे खेत में प्रति एकड़ तीस मन के हिसाब से होती है और धान एक एकड़ में पैंतीस मन निकलता है। हम शुद्ध अन्न खाने के आदी हो गये हैं। इसलिए जितना अनाज हो उसी में सबर कर लेते हैं। कुदरती खेती से हमने खोया कुछ नहीं है पर पाया बहुत ज्यादा है। कुदरती खेती से जो अनुभव मुझे मिले हैं, उनके आधार पर मैं यह बात दावे के साथ कह रहा हूं कि हमारी भूमि अन्नपूर्णा है। यह सिर्फ हवा, पानी और सूरज की रोशनी के सहारे ही उत्तम अनाज पैदा करने में सक्षम है। इसमें ऊपर से रासायनिक खाद और कीटनाशक डालने की कतई जरूरत नहीं है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा थोपे जा रहे हाइब्रिड बीजों, रासायनिक खादों और कीटनाशकों ने हमारी हजारों वर्ष पुरानी कृषि संस्कृति को तबाह कर डाला है। हमारे खेतों, खलिहानों, बाग-बगीचों, घरों, कस्बों व नगरों में प्राणलेवा विषैले रसायनों की असहनीय बदबू भर गई है। कैंसर समेत सैकड़ों नयी-नयी बीमारियां हमें प्रतिदिन हो रही हैं। वातावरण में प्राणवायु की कमी और आबोहवा बिगड़ने के कारण मानव समेत तमाम प्राणियों का जीवन संकट में पड़ गया है। हमें याद रखना चाहिए कि जमीन केवल मनुष्यों को ही भोजन और आश्रय नहीं देती, बल्कि दूसरे जीवों तथा वनस्पतियों को भी आहार और ठिकाना देती है। धरती पर आदमी के अलावा लाखों किस्म के जीव-जन्तु और वनस्पतियां हैं। इनमें से प्रत्येक की सैकड़ों-हजारों नस्लें और किस्में हैं। यह जैव संपदा हम और हमारी आगामी पीढ़ियों के लिए बेहद उपयोगी है। सजीव खेती एक मात्र ऐसी पद्धति है, जिससे जल, मिट्टी, पर्यावरण और जीव-जगत का संरक्षण होता है। पर चिंता यह है कि कुदरती खेती को अपनाने के लिए किसान तैयार नहीं हैं। मेरे अपने गांव में मेरे सिवाय किसी भी दूसरे किसान ने कुदरती खेती शुरू नहीं की है।
हरित क्रांति के बाद
पंजाब व हरियाणा समेत हिंदी पट्टी के जिन राज्यों में पहले-पहल हरित-क्रांति को अपनाया गया, वहां के किसान आज सबसे ज्यादा बीमार, दुखी, दरिद्र और फटेहाल हैं। समृद्धि की बजाय हरित क्रांति ने इन राज्यों में गुरबत, असंतोष और हिंसा के इतने ज्यादा बीज बो दिए हैं, जिनका दुनिया में कहीं भी कारगर इलाज नहीं है। इन राज्यों को अब बीमार जमीनों, कीटों से ग्रस्त फसलों, दलदली बंजर इलाकों और कर्जदार किसानों के लिए जाना जाता है। पंजाब व हरियाणा में कैंसर, शुगर, दिल और गुर्दे की बीमारियों ने महामारी का रूप ले लिया है। गांव के गांव कैंसर की चपेट में हैं। बठिंडा से बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन ‘कैंसर ट्रेन’ के नाम से जानी जाती है। हरित-क्रांति से मोटी कमाई करने वालों में कृषि रसायन उद्योगों, विशाल पेट्रो-रसायन कंपनियों, कृषि मशीनरी निर्माताओं, नदियों पर बांध बनाने वालों और बड़े-बड़े भू-स्वामियों का नाम सबसे ऊपर है। इनकी करनी से देश में पानी की उपलब्धता और भूमि के उपजाऊपन में कमी आयी है। भू-क्षरण बढ़ा है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में वृद्धि हुई है। कीटों के प्रति असुरक्षा बढ़ी है। सूक्ष्म पोषक तत्व कम हुए हैं। किसानों का खेती से मोह घटा है। विस्थापन बढ़ा है तथा बेरोजगारी में इजाफा हुआ है। दुर्भाग्यवश कृषि नीति निर्धारकों ने इस भीषण संकट पर अभी भी चुप्पी साध रखी है। सच यह है कि भारतीय कृषि का नीति निर्धारण शुरू से ही उन लोगों के हाथों में रहा है, जिन्हें खुद ही खेती-बाड़ी और किसान के विकट हालातों की कोई जानकारी नहीं है। किसान कुंठित है, उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। मेरे विचार से हरित-क्रांति से बर्बाद हुए खेतों को हम प्राकृतिक साधनों के इस्तेमाल से धीरे-धीरे ठीक कर सकते हैं। इसके लिए हमें अपनी मौजूदा उत्पादन तकनीक को पूरी तरह बदलना पड़ेगा। पैदावार की मौजूदा तकनीक के जो घातक परिणाम निकल रहे हैं, वे किसी से छुपे नहीं है। रासायनिक खेती से छुटकारा पाने का सबसे अच्छा विकल्प कुदरती
खेती है।


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