बाबा नानक की भक्ति में सराबोर हुआ शहर !    कस्टडी से भागने की कोशिश, केस दर्ज !    उद्घाटन के 9 माह बाद सरकारी अस्पताल में चिकित्सा शुरू !    सेवानिवृत्त पुलिस कर्मचारी आये दिल्ली पुलिस के समर्थन में !    हेलमेट न दस्तावेज, 28 हजार जुर्माना, स्कूटी भी जब्त !    पाक में सुरक्षा दस्ते  पर हमला, 5 की मौत !    मां, 2 बेटियों पर तेजाब डाला, हालत गम्‍भीर !    सीएम के फोन पर धमकी देने का आरोपी काबू !    रातभर चली मुठभेड़ में 2 और आतंकी ढेर !    वृद्ध महिला के उत्पीड़न मामले में हाईकोर्ट ने मांगी स्टेटस रिपोर्ट !    

किताब, घर और मैं

Posted On September - 8 - 2019

उठाती हूं मैं किताब
सास रसोई में बर्तन खड़काती है
ससुर की आंख खुलती और गालियों का तांडव भी
मेरे हाथों में किताब अधिक कसी जाती है।
भूमिकाएं
कितनी आसान होती वे भूमिकाएं
जो होती हैं हू-ब-हू तुम्हारे अपने जैसी।
बहुत कठिन हैं निभाने वे किरदार
जिन्हें निभाने की खातिर
होना पड़ता किसी और की तरह।
खाली जगहें
ये खाली जगहें भी अजीब हैं
कई वार डरते-डरते छोड़ देते हैं खाली
और खाली जगहें रह जातीं सिर्फ खाली ही।
कुछ खाली जगहें,
सदैव खाली ही रहती हैं नियतिवश।
खाली रहकर भी भरीपूरी होतीं
ये अजीब खाली जगहें।
कविता
युद्ध में से जन्मती कविता
कविता युद्ध को जन्म देती
कविता युद्ध में हथियार बनती
हथियारों को युद्ध देती है कविता।
द्वंद्व
अधिक से अधिक हो, मेहमान कमरे में सामान
कम से कम आएं, घर में मेहमान
सामान और मेहमान का यह कैसा द्वंद्व है?
अनुवाद : फूलचंद मानव


Comments Off on किताब, घर और मैं
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.