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कहां गुम हो गई मैलोडी

Posted On September - 21 - 2019

असीम चक्रवर्ती
आजकल के दौर में न संगीत में कोई दम है और न ही गाना हिट होता है। संगीतकार सिचुएशन मेंं नहीं डूबते। बॉलीवुड जगत में आज के दौर के विवेक ओबेराय, रितेश देशमुख, अभिषेक बच्चन, बॉबी देअोल, इमरान हाशमी, इमरान खान समेत कई ऐसे हीरो हैं, जिन्हें न के बराबर संगीत का साथ मिला है। वरना एक दौर था जब राजेंद्र कुमार, जितेंद्र, जॉय मुखर्जी, विश्वजीत जैसे कई हीरो सिर्फ एसडी बर्मन, सी. रामचंद्र, शंकर-जयकिशन, ओपी नैयर चित्रगुप्त, उषा खन्ना, सोनिक ओमी जैसे महान संगीतकारों की छत्रछाया में रहकर बेहद चर्चित हीरो बन बैठे थे। असल में यह वह दौर था, जब एक फिल्म के कम-से-कम चार-पांच गाने बेहद कर्णप्रिय होते थे।
हम उस पुराने दौर में नहीं जाना चाहते मगर दौर बदला तो म्यूजिकल फिल्मों की कमी साफ नज़र आने लगी। आज आलम यह है कि किसी फिल्म का एक गाना हिट होता है, तो सभी झूमने लगते हैं।
धैर्य ज़रूरी
शुरुआत राहुल देव बर्मन के एक वक्तव्य से। कभी पंचम दा ने संगीतमय फिल्मों के बारे में कहा था कि ऐसी फिल्मों की सुर रचना में बहुत धैर्य की जरूरत पड़ती है। जब तक आप फिल्म के हर सिचुएशन में नहीं डूबते हैं, बेहतर सुर रचना की बात भूल जाइए। मुश्किल यह है कि कई बार कुछ सिचुएशन के गानों के सृजन में बहुत वक्त लग जाता है। तभी आपके धैर्य की जरूरत होती है। कई बार मैंने किसी फिल्म के सारे गाने चंद बैठक में बना दिए पर किसी एक गाने में मैं अटक गया। कई दिनों के सृजन के बाद ही वह गाना मेरे मन-मुताबिक बन पाया।
याद आते हैं नदीम-श्रवण
इस प्रसंग में फिल्मकार महेश भट्ट ने हाल में बेहद जहीन संगीतकार नदीम-श्रवण के बारे में बहुत दिलचस्प बातें बतायीं। इन दिनों अपनी एक सुपरहिट फिल्म सड़क का सड़क-2 का रीमेक बना रहे भट्ट बताते हैं, ‘वह बड़े संजीदा होकर अपनी तैयार धुनों को बार-बार सुनते थे। ‘दिल है कि मानता नहीं’ की शूटिंग शुरू हो चुकी थी। नदीम से हमने टाइटल सॉन्ग जल्द देने के लिए कहा। उसका कहना था कि अभी हम इस गाने की धुन से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं। हमें उसमें सुपरहिट वाली बात नज़र नहीं आ रही है। बाद में इस जोड़ी ने इस फिल्म का जो जबरदस्त हिट ‘टाइटल ट्रैक’ दिया, उसे बताने की जरूरत नहीं है। आपको मैलोडी चाहिए तो वह थोड़े धैर्य और इंतजार के बाद ही मिलेगी।’
भंसाली प्रयासरत
फिल्मकार सत्यजित रे, राजकपूर सहित कई निर्देशकों को संगीत की अच्छी समझ थी। इस मामले में भंसाली नए दौर के एक श्रेष्ठ उदाहरण के तौर पर सामने आते हैं। उन्होंने अपनी फिल्म ‘खामोशी’ से लेकर ‘पद्मावत’ तक अपनी हर फिल्म को म्यूजिकल बनाया। संगीत को लेकर उनका आत्मविश्वास इस कदर है कि ‘रामलीला’ से उन्होंने खुद अपनी फिल्मों का संगीत देना शुरू किया है। उनकी पिछली दोनों फिल्मों ‘रामलीला’ और ‘बाजीराव मस्तानी’ के संगीत की काफी सराहना हुई। वह आज भी म्यूजिकल फिल्म बनाकर टिके हुए हैं।
पद्मावती का संगीत
उनकी पिछली फिल्म ‘पद्मावत’ का संगीत आज एक साल बाद भी लोगों की जुबान पर है। 3 घंटे और 13 मिनट की इस फिल्म में कुल पांच गाने हैं। भंसाली के मुताबिक संगीत सृजन उनके लिए एक कठिन प्रकिया है। वह बताते हैं—चूंकि मैं म्यूजिकल नोट के साथ फिल्में बनाता हूं।
टी सीरीज़ भी पिछड़ा
टी सीरीज की नयी फिल्म ‘मुगल’ म्यूजिक टायकून गुलशन कुमार पर केंद्रित फिल्म होगी। गुलशन कुमार के योगदान के बारे में कुछ बयां करने की ज़रूरत नहीं है। 90 के दशक में उन्होंने मैलोडी को एक नयी परिभाषा दी थी। उस दौर में बहार आने तक, आशिकी, साजन, सड़क, दीवाना, दिल है कि मानता नहीं, हम हैं राही प्यार के आदि ढेरों संगीतमय फिल्में दीं। कई फिल्मों का निर्माण तो उन्होंने सिर्फ संगीत को ध्यान में रखकर किया। पर उनकी मृत्यु के बाद उनके दो बेटे इस मामले में बहुत पीछे रह गए। यह भी कहा जा सकता है कि मैलोडी को लेकर गुलशन कुमार जैसी सोच वह नहीं जुटा पाए। यही वजह है कि गुलशन कुमार की मृत्यु के बाद से उनके बैनर से अभी तक ऐसी कोई फिल्म नहीं आई है, जिसे म्यूजि़कल कहा जा सके। अब सुनने को मिला है कि ‘मुगल’ को पूरी तरह से संगीतमय बनाया जा रहा है।
नयी ‘आशिकी’ में वह बात नहीं
टी सीरीज़ द्वारा दूसरी बार बनाई गई आशिकी का संगीत बेहद लोकप्रिय था। पर उसे श्रेष्ठ कहना वाजिब नहीं होगा क्योंकि आज भी महेश भट्ट द्वारा निर्देशित मूल ‘आशिकी’ के गानों की ही चर्चा होती है। असल में आज के नये दौर के संगीतकार के अंदर वह सृजन क्षमता ही नहीं है। वह पुराने संगीत के चैलेंज को पकड़ ही नहीं पा रहे हैं।
नये संगीतकार नौसिखिये
इधर नये दौर के संगीतकारों ने संगीत का एक नया ट्रेंड शुरू किया है। खुद की काबिलियत पर भरोसा न कर वह दूसरे की काबिलियत का सहारा ले रहे हैं। उसके लिए काफी विवाद भी हो रहा है। हो यह रहा है कि किसी पुराने हिट गाने का री-क्रिएशन के नाम पर कबाड़ा किया जा रहा है। इसका विरोध सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर से लेकर संगीतकार अनु मलिक तक कई महान हस्तियां कर चुकी हैं। लता जी कहती हैं,‘ आप खुद के सृजन में फेल हो गए हैं। अब दूसरों के गाने बिगाड़ रहे हैं। इस पर तो तुरंत ही रोक लगनी चाहिए।’ पर कुछ कानूनी पेचीदगियों के चलते यह चोरी धड़ाधड़ चल रही है।
मैलोडी की समझ नहीं
दिल तो पागल है, दुश्मन, गदर जैसी कई फिल्मों में बेहद सुरीला संगीत दे चुके संगीतकार उत्तम सिंह बताते हैं, ‘मैलोडी कभी कृत्रिम नहीं होती। इसके लिए तो आपको जोड़तोड़ की बजाय पूरी तरह से सुर रचना में डूब जाना पड़ेगा। हर साज या वाद्य यंत्रों की समझ रखनी पड़ेगी। मुझे याद है हमारे दौर में सचिन दा या मदन मोहन जी हमें यह समझाते थे कि वायलिन, सितार या बांसुरी जैसे साज का उपयोग कहां करना पड़ेगा। आज तो ज्यादातर संगीतकारों को इसकी पूरी समझ नहीं है। एक मशीन ही सारी धुन निकाल रही है। ऐसे माहौल में मैलोडी कहां रहेगी?’
ऐसे तैयार होता है सुरीला संगीत
दौर फास्ट फूड का है, मैलोडी न भी हो तो चलता है। परिश्रम और सृजन अब ये दोनों बातें लगभग गायब होने को हैं। बुजुर्ग संगीतकार खय्याम पुराने दौर को याद करते हुए कहते थे, ‘संगीत सृजन बिना धैर्य संभव नहीं हो सकता। हमारे दौर के ज्यादातर निर्माता-निर्देशक अक्सर म्यूजिक सिटिंग में होते थे। फिल्म की पूरी स्िक्रप्ट और एक-एक सिचुएशन हमें बहुत पहले समझा दी जाती थी। और अक्सर ऐसा होता था कि फिल्म की शूटिंग शुरू हाने से पहले फिल्म के सारे गाने बन जाते थे। जाहिर है इसके बाद कुछ भी तबदीली के लिए काफी समय होता था।’
श्रोताओं की रुचि बदली
रेडीमेट और झटपट धुनों ने ही हाल के वर्षो में फिल्म संगीत को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। संगीतकार अनु मलिक बताते हैं, ‘ज्यादा फिल्मों का ऑफर पाने के लिए मैं हिट गाने नहीं बनाता हूं। शुरू से आज तक सिर्फ श्रोताओं का ख्याल मुझे रहता है। इसलिए सिर्फ गिनी-चुनी फिल्में करता हूं। किसी बैंकिंग पर मेरा कोई यकीन नहीं है। आज के श्रोताओं की रुचि इतनी तेज़ी से बदल रही है, ऐसे किसी बैंकिंग की सारी परिभाषा बदल चुकी है। मुझे याद है दत्ता साहब ने अपनी फिल्मों बॉर्डर, रिफ्यूजी, एलओसी, उमराव जान के लिए मुझसे कितनी मेहनत करवाई थी। मैं चाहता हूं कि मेरा हर निर्माता इतना धैर्य और समय लेकर मुझसे हर गाना बनवाये, फिर देखिए कैसे हिट गाने नहीं आते हैं।


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