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एकदा

Posted On September - 10 - 2019

संत की बादशाही
बहुत बड़े संत कनफ्यूसियस अलमस्त शांत-चित्त जंगल में बैठे विश्राम कर रहे थे। उसी ओर से उस राज्य के सम्राट का आना हुआ। सम्राट की कनफ्यूसियस पर दृष्टि गयी। घोड़े से उतरकर कनफ्यूसियस के पास जाकर पूछा, ‘तुम कौन हो, जो इस बीहड़ जंगल में खूंखार जानवरों के बीच इतने इत्मीनान से बैठे हो?’ कनफ्यूसियस ने उत्तर में कहा, ‘सम्राट।’ विस्मित सम्राट ने पुनः पूछा, ‘तुम कैसे सम्राट! सम्राट तो मैं हूं, मेरे पास सेना है, सिपाही हैं, सेवक हैं, राजमहल तथा किले हैं, हीरे-जवाहरात आदि अथाह खजाना है, प्रजा से मुझे देखो कितना मान-सम्मान मिलता है। तुम कितने आत्म-भ्रमित हुए यहां जंगल में बैठे हो एक आलसी की तरह।’ संत कनफ्यूसियस बोले, ‘आलसी वह है, जिसके पास सेवक हैं, सेना भी वही रखता है जो भयभीत है, चोरों के द्वारा धन छीने जाने का भय भी तुम्हें ही है, मुझे नहीं। मेरे साम्राज्य में मुझे न किसी सिपाही की जरूरत है और न किसी सेवक की। धन-दौलत, हीरे-जवाहरात की जरूरत दरिद्र को होती है।’ कनफ्यूसियस में जब राजा ने एक संत देखा तो उसका सिर झुक गया।
प्रस्तुति : बनीसिंह जांगड़ा


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