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इजिप्ट में गुरु नानक की बिसरी निशानियां

Posted On September - 8 - 2019

यह तस्वीर है कायरो सिटाडेल की। इसी के भीतर महल में है ‘अल-वली-नानक मुकाम’ चबूतरा (इनसेट) , जहां गुरु नानक ने प्रवचन किये थे ।

पंकज चतुर्वेदी
यह गुरु नानक देव जी के प्रकाशोत्सव का 550वां साल है। भारत ही नहीं, सारी दुनिया में सिख पंथ के अनुयायी गुरु जी की स्मृतियों को सहेजने में लगे हैं। लेकिन, अरब दुनिया के सबसे बड़े देश इजिप्ट या मिस्र, जहां गुरु नानक देव कई दिन रहे, वहां उनकी यादों को संरक्षित रखने में न तो मिस्र की सरकार की कोई रुचि है और न ही भारत सरकार का ध्यान उस तरफ गया। यह सभी जानते हैं कि नानक जी ने 4 बड़ी यात्राएं कीं, जिन्हें ‘गुरु नानक देव की उदासियां’ कहा जाता है। उनकी ये यात्राएं देश-दुनिया के संत-विचारकों से मुलाकात करने, जाति-धर्म से ऊपर उठ कर मानवता की सेवा का संदेश देने के लिए थीं। उनकी एक उदासी अरब की थी, वे मदीना भी गये। उनकी यह यात्रा बलूचिस्तान, कराची, हिंगलाज, काबुल, समरकंद, बुखार, तेहरान, सीरिया, तुर्की, रूस, बगदाद, मक्का की थी। इसी उदासी के दौरान गुरु नानक देव काहिरा, मिस्र भी गये थे, लेकिन आज उनकी स्मृति के कोई निशान नहीं हैं। सन 1519 में कर्बला, अजारा होते हुए गुरु नानक और भाई मर्दाना कैकई नामक आधुनिक शहर में रुके थे, यह मिस्र का आज का काहिरा या कायरो ही है। उस समय यहां का राजा सुल्तान माहिरी करू था, जो खुद गुरु जी से मिलने आया था और उन्हें अपने महल में ठहराया था।
ताजुद्दीन नक्शबंदी फ़ारसी/अरबी के एक लेखक थे। वे गुरु नानक देव की मध्य-पूर्व यात्रा के दौरान उनके साथ दो साल रहे थे। वे हर दिन की डायरी भी लिखते थे। उनकी वह पांडुलिपि 1927 में मदीना की एक लाइब्रेरी में मिली थी। ताजुद्दीन की इस पांडुलिपि को मुश्ताक हुसैन शाह ने खोजा था। बाद में वे सिख बन गये और संत सैयद प्रितपाल सिंह (1902-1969) के नाम से जाने गये।

क्रूर खलीफा को दिखाई राह
ताजुद्दीन की पांडुलिपि में बताया गया है कि गुरु नानक दजला नदी के किनारे चलते हुए, कुफा होते हुए कैकई शहर पहुंचे थे। वहां के खलीफा या सुलतान माहिरी करू के आध्यात्मिक सलाहकार पीर जलाल ने सबसे पहले गुरु नानक के अरबी में शब्द सुने, फिर उनसे अनुरोध किया कि वे उनके जिद्दी और क्रूर खलीफा को सही राह बताएं। कहते हैं कि गुरु नानक देव जी की वाणी का खलीफा पर ऐसा असर हुआ कि उसने बाबा नानक को अपने महल में ठहराया। नानक जी वहां दो दिन रुके, कायरो से दूर अलेक्स्जेन्द्रिया की सूफी मस्जिद में भी नानक जी एक दिन रुके थे।

अल-वली-नानक
सन 1885 के आसपास सूडान लड़ने गयी भारतीय फौज की सिख रेजिमेंट के 20 सैनिक उस स्थान पर गए थे, जहां गुरु महाराज ठहरे थे। वहां उन्होंने अरदास की और प्रसाद भी वितरित किया था। यह स्थान आज के मशहूर पर्यटन स्थल कायरो सिटाडेल के भीतर मोहम्मद अली मस्जिद के पास कहीं राज महल में है। इस महल को सुरक्षा की दृष्टि से आम लोगों के लिए बंद किया हुआ है, इसमें एक चबूतरा है, जिसे ‘अल-वली-नानक मुकाम’ कहते हैं, यहीं पर गुरु नानक ने अरबी में कीर्तन और प्रवचन किया था। इस समय किले का बड़ा हिस्सा बंद है। यहां पुलिस और फौज के दफ्तर हैं। किले के बड़े हिस्से को सेना, पुलिस और जेल के म्यूजियम में बदल दिया गया है। इस किले से स्वेज नहर के लिए रास्ता था, अभी भी वहां विशाल कुआं और दरवाजा है, गुरुजी का स्थान- ‘अल-वली-नानक मुकाम’ वहीं है। आज सिटाडेल एक व्यस्त पर्यटन स्थल है। यहां की सुल्तान अल नासिर मोहम्मद मस्जिद की छत भारत से लाए गये चंदन से बनी है और निर्माण के 800 साल बाद भी यह खुशबू और ठंडक दे रही है। यह बात वहां के गाइड बताना नहीं भूलते, लेकिन इससे बमुश्किल 20 मीटर दूर स्थित बाबा नानक की स्मृति के बारे में कोई जानता नहीं, बताता नहीं।

स्मृतियों को सहेजने की जरूरत
एक तो लोगों को इस पावन स्थान के महत्व की जानकारी नहीं है, दूसरा हमने इजिप्ट सरकार से यह सूचना साझा नहीं की। भारत, सिख मत और गुरु नानक देव की स्मृतियों के लिहाज से यह बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। भारत सरकार इस संबंध में इजिप्ट सरकार से बात करे, तो श्रद्धालु गुरु नानक देव के इस पावन स्थल के करीब से दर्शन कर सकेंगे। यहां जानना जरूरी है कि इजिप्ट यानी मिस्र की राजधानी काहिरा या कायरो अरब दुनिया का सबसे बड़ा शहर है। यहां ईसाइयों की बड़ी आबादी है, कोई 12 फीसदी। हिन्दू-सिख-जैन-बौद्ध यानी भारतीय मूल के धर्म अनुयायी बेहद कम दिखते हैं, या तो नौकरी करने वाले या लिखने-पढ़ने आये लोग ही गैर मुस्लिम-ईसाई मिलते हैं। ऐसा नहीं कि वहां हिन्दू धर्म के बारे में अनभिज्ञता है। वहां हिंदी फिल्में बेहद लोकप्रिय हैं और हर दूसरा आदमी यह जानने को जिज्ञासु रहता है कि हिन्दू महिलाएं बिंदी क्यों लगाती हैं या मांग क्यों भरती हैं, भारत का भोजन या संस्कार क्या-क्या हैं। एक युवा ऐसा भी मिला जिसके परबाबा सिख थे और काम के सिलसिले में मिस्र आये थे। एक युवा ऐसा भी मिला जिसका नाम नेहरू अहमद गांधी है, उसके बाबा का नाम गांधी है और उन्होंने भारत के प्रति दीवानगी के चलते पोते का नाम नेहरू रखा। कायरो के नये बने उपनगर हेलियोपोलिस में एक हिन्दू मंदिर की संरचना और ग्यारवीं सदी के सलाउद्दीन के किले यानी सिटाडेल में गुरु नानक देव के प्रवचन देने और ठहरने की कहानियां यहां भारतीय धर्म-अध्यात्म के चिन्हों को जिंदा रखे हैं।


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