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आध्यात्मिक यात्रा में सहायक मुद्राएं

Posted On September - 15 - 2019

डॉ. रमेश पुरी
सत्संग, ध्यान, कीर्तन, सद्साहित्य का अध्ययन, चिंतन-मनन तो आध्यात्मिक यात्रा में सहायक हैं ही, मुद्राएं भी बहुत उपयोगी हैं। अन्य चीज़ों के लिए तो खास तरह के वातावरण या अलग-से समय की आवश्यकता होती है, लेकिन कई मुद्राएं आप कहीं भी, कभी भी आजमा सकते हैं। इनमें समय भी कम लगता है। इन विशेष मुद्राओं से सभी आठ तात्विक मुद्राओं (ज्ञान, वायु, आकाश, शून्य, पृथ्वी, सूर्य, इन्द्र और वरुण मुद्राएं) के लाभ समेकित रूप से प्राप्त होते हैं। मन पर नियंत्रण स्थापित होता है और जीवन में शुचिता के भाव प्रबल होते हैं। आज की आपाधापी भरी जिंदगी में, जहां आदमी आध्यात्मिक अनुभव तो लेना चाहता है, लेकिन समयाभाव उसे कचोटता है, ये मुद्राएं बेहद प्रभावी हो सकती हैं। एक नजर, ऐसी ही कुछ मुद्राओं पर-

ज्ञान मुद्रा
इससे मस्तिष्क के तंतु सक्रिय होते हैं, मेधा और स्मरण-शक्ति बढ़ने लगती है। बेचैनी, अनिद्रा, उन्माद, चिड़चिड़ापन, क्रोध, नकारात्मकता, कामवासना, एकाग्रता और अवसाद को नियंत्रित करने में भी यह मुद्रा कारगर है। आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह मुद्रा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। गहरे श्वास के साथ इसके अभ्यास से आभा बढ़ती है और शांति का अनुभव होता है।
ऐसे करें : अंगूठे और तर्जनी के अग्र भाग को मिलाएं। शेष उंगलियों को सीधा रखें। धीमी-लंबी-गहरी सांस के साथ 15-15 मिनट चार बार करें।

ब्रह्मांजलि मुद्रा
इसे ध्यान मुद्रा भी कहते हैं। भगवान बुद्ध की पद्मासन वाली तस्वीर इसी मुद्रा में है। इसके अभ्यास से पूरा स्नायुमंडल शांत होता है और अनावश्यक चिंता, अनिद्रा, दुःस्वप्न जैसी समस्याएं दूर होती हैं। स्थिरता आती है, मन एकाग्रचित्त करना आसान होता है और साधना में प्रगति होती है। यह मुद्रा पांचों तत्वों के बीच संतुलन स्थापित करती है। इससे प्राण-शक्ति जगती है, तंत्रिका तंत्र संबंधी गड़बड़ियां ठीक होती हैं और शरीर तथा मन से नकारात्मक तत्व दूर होते हैं।
ऐसे करें : पद्मासन या सुखासन में बैठें। गोद में बायीं हथेली पर चित्र के अनुसार दायीं हथेली ऊपर की तरफ रखें। बायें अंगूठे पर दायां अंगूठा रखें।
कितनी देर : 45 मिनट करें।

कुंडलिनी मुद्रा
इस मुद्रा के नियमित अभ्यास से नाभि के ठीक नीचे स्थित स्वाधिष्ठान चक्र सक्रिय होने से आध्यात्मिक और सृजनात्मक शक्ति जाग्रत होने लगती है। यह मुद्रा कुंडलिनी जागरण यानी ऊर्जा को ऊपर के चक्रों की ओर ले जाने में सहायक है।
ऐसे करें : दोनों हाथों की मुट्ठियां बनाएं। बाएं हाथ की मुट्ठी नीचे और दाएं हाथ की मुट्ठी उसके ऊपर रखें। अब बाएं हाथ की तर्जनी उंगली को दाएं हाथ की मुट्ठी में इस प्रकार बंद करें कि उसका शीर्ष दाएं अंगूठे को छूने लगे। इस अवस्था में मुट्ठियों को नाभि के ठीक नीचे रखें, आंखें बंद कर ध्यान लगाएं।
कितनी बार : 15-15 मिनट तीन बार।

उत्तरबोधि मुद्रा
इसे योनिमुद्रा भी कहा जाता है। यह मुद्रा चिंतन-मनन में खासतौर से उपयोगी है। इससे भीतरी शक्तियों का उत्थान होता है, प्रेरणा मिलती है और मन विश्राम की अवस्था में आ जाता है।
ऐसे करें : दोनों हाथों की उंगलियों को एक-दूसरे में फंसा कर दोनों अंगूठों और तर्जनी उंगलियों को मिलाएं। अंगूठों की दिशा नीचे की ओर रहे और तर्जनी उंगलियां ऊपर की ओर हों। इस अवस्था में हाथों को मणिपुर चक्र यानी नाभि के पास रखें। लेटकर, जितनी देर सहजता से हो, करें। हाथों को इस प्रकार रखें कि अंगूठे तो सीने पर रहें, लेकिन तर्जनी उंगलियों की दिशा ऊपर की ओर हो।
कितनी देर : 15-15 मिनट तीन बार।

पंकज मुद्रा
इसे लक्ष्मी और गायत्री मुद्रा भी कहते हैं। इससे जलतत्व बढ़ता है और अग्नि तत्व का संतुलन होता है। यह शारीरिक और मानसिक सौंदर्य बढ़ाने, रक्त संचार ठीक रखने, मस्तिष्क और रीढ़ ठीक करने में उपयोगी है। इसके नियमित अभ्यास से मन शांत होता है और मन को निर्लिप्त रखना आसान होता है। आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करने में यह मुद्रा बहुत कारगर है।
ऐसे करें : चित्र के अनुसार, दोनों हाथों से कमल जैसी आकृति बनाएं। दोनों अंगूठे और छोटी उंगलियां मिली हुई हों। शेष उंगलियां तनी हुई और एक-दूसरे से अलग हों। हथेलियों का निचला हिस्सा सटा हुआ हो।
कितनी देर : 15 से 45 मिनट तक।

सुरभि मुद्रा
इसे धेनु मुद्रा भी कहते हैं। यह मुद्रा नाभिचक्र को व्यवस्थित रखती है। इससे शरीर स्वस्थ रहता है और कुंडलिनी जाग्रत करने में मदद मिलती है। यह मुद्रा अग्नितत्व को शांत करती है और सात्विक भाव पैदा करती है। यह मुद्रा वात, कफ और पित्त- तीनों का संतुलन कर आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करती है। इस मुद्रा का हमेशा प्रयोग करना कठिन है। इसलिए, बेहतर है कि आध्यात्मिक साधना के समय ही इस मुद्रा का प्रयोग किया जाए।
ऐसे करें : एक हाथ की तर्जनी उंगली को दूसरे हाथ की मध्यमा उंगली से स्पर्श करें। दूसरे हाथ की तर्जनी उंगली को पहले हाथ की मध्यमा उंगली से लगाएं। फिर पहले हाथ की अनामिका को दूसरे हाथ की कनिष्ठा से और दूसरे हाथ की अनामिका को पहले हाथ की कनिष्ठा उंगली से मिलाएं। दोनों अंगूठों को अलग रखें। हथेलियों की दिशा नीचे की ओर रहे।
कितनी देर : 15-15 मिनट तीन बार।

गतिशील मुद्रा
गहरे श्वास के साथ इस मुद्रा के अभ्यास से सभी 8 तत्व मुद्राओं और प्राणिक मुद्राओं के लाभ मिलते हैं। एकाग्रता बढ़ती है और निराशा के भाव विदा हो जाते हैं। मन शांत होता है।
ऐसे करें : सुखासन या पद्मासन में बैठें। दोनों हाथ घुटनों पर रखें। हथेलियां ऊपर की ओर रहें। पहले, ज्ञान मुद्रा (अंगूठे और तर्जनी के शीर्ष मिले हुए, बाकी उंगलियां एकदम सीधी) बनाएं और सांस बाहर निकालें। फिर सांस लेते समय दोनों हाथों की उंगलियां खोल दें। सांस भर जाए तो मुंह खोलते हुए ‘ओ’ का उच्चारण करें और जब ध्वनि नाभि तक पहुंच जाए तो मुंह बंद कर सांस छोड़ते हुए ‘म’ का उच्चारण करें। इसी प्रकार, ओ और म का उच्चारण करते हुए, पृथ्वी (अनामिका और अंगूठा मिले हुए), आकाश (अंगूठा और मध्यमा मिले हुए), इन्द्र (अंगूठा तथा कनिष्ठा मिले हुए), वायु (तर्जनी को मोड़कर उसे अंगूठे से हल्का दबाएं), शून्य (मध्यमा को मोड़कर उसे अंगूठे से दबाएं), सूर्य (अनामिका अंगूठे की जड़ में लगाएं) और वरुण (कनिष्ठा अंगूठे की जड़ में) मुद्रा बनाएं। सांस लेना और छोड़ना जितना गहरा होगा, ओ और म का उच्चारण भी उतना ही लंबा होगा और लाभ उसी अनुपात में बढ़ता जाएगा।
कितनी देर : लगभग आधा घंटा।
(डॉ. पुरी ओशोधारा नानक धाम, मुरथल से जुड़े हैं और मुद्रा चिकित्सा पुस्तक के लेखक हैं।)


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