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अहिंसा की सीख

Posted On September - 29 - 2019

बाल कहानी

ललित शौर्य
स्कूल में गांधी जयंती के कार्यक्रमों की तैयारी चल रही थी। सभी बच्चे बड़े उत्साहित थे। 2 अक्टूबर वाले दिन सुबह प्रभात फेरी निकलनी थी। जिसमें गांधी जी और उनके अनुयायियों को दिखाया जाना था। साथ ही प्रभातफेरी के बाद गांधी जी के जीवन पर आधारित एक नाटिका का मंचन भी होना था।
रोहन और राकेश दोनों अच्छे दोस्त थे और अभिनय के उस्ताद भी। स्कूल के सभी कार्यक्रमों में वे दोनों ही अभिनय करते। वे लगभग सारे महापुरुषों का अभिनय कर चुके थे। उनमें कौन उन्नीस है कौन बीस पता ही नहीं चल पाता। दोनों अपने अभिनय में किसी भी प्रकार की शिकायत का मौका ही नहीं देते थे। इस बार भी दोनों गांधी जी का अभिनय करने के लिए उत्सुक थे। दोनों चाहते थे कि ये अभिनय करने का मौका उसे ही मिले। पर अभी स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि अभिनय कौन करेगा। ‘इस बार गांधी जी का अभिनय मैं करूंगा। वैसे भी इस रोल के लिए मैं ही परफेक्ट हूं।’, रोहन ने राकेश से कहा।
‘तुम कैसे कर लोगे अभिनय। मैं करने दूंगा तब तो। इस बार मैं बनूंगा गांधी जी। सारे बच्चे भी यही चाहते हैं।, राकेश ने थोड़ा चिढ़कर कहा। ‘किसे क्या बनना है ये बच्चे तय नहीं करेंगे। ये प्रियांशी मैम तय करेंगी। हमें उनसे बात करनी चाहिए समझे। वैसे बनूंगा तो मैं ही।’ रोहन बोला।
‘हां… हां । पूछ लेना मैम से। वो मुझे ही सेलेक्ट करेंगी देख लेना।’ राकेश गुस्से में बोला।
‘गुस्सा किसे दिखा रहे हो।’ रोहन ने राकेश का कॉलर पकड़ते हुए कहा।
‘ये सब क्या है। तुमने मेरा कॉलर कैसे पकड़ लिया। छोड़ों नहीं तो एक जोर का पड़ेगा गाल पर।’ राकेश ने कॉलर छुड़ाते हुए कहा। इसके बाद दोनों वहीं पर आपस में लड़ने लगे। वे एक दूसरे को मुक्के-घूंसे भी लगाने लगे। बात आगे बढ़ती तब तक एक बच्चा प्रियांशी मैम को बुलाकर ले आया। मैम ने उन्हें डांटते हुए अलग किया, और पूछा, ‘क्या बात है। ये इस तरह क्यों लड़ रहे हो तुम दोनों।’
राकेश ने कहा, ‘मैम लड़ाई रोहन ने शुरू की।’
‘नहीं मैम राकेश झूठ बोल रहा है , पहले शुरुआत इसी ने की थी।’ रोहन बोला।
‘अब ये बताओ झगड़ा हो किस बात पर रहा है।’ मैम ने पूछा।
‘मैम गांधी जयंती पर गांधी जी के अभिनय करने को लेकर बात हो रही थी। इसी कारण ये सब हुआ।’ राकेश ने कहा।
‘अच्छा तो ये बात है। तुम दोनों गांधी जयंती के मायने समझते हो। गांधी जी के बारे में पता है कुछ तुम लोगों को।’, मैम बोली।
रोहन और राकेश दोनों के सर शर्म के मारे झुक गए।
‘गाँधी जी ने अपना सारा जीवन शांति और अहिंसा को समर्पित कर दिया। वो किसी भी तरह की हिंसा के पक्षधर नहीं थे। वो लड़ाई-झगड़ा बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे। तुम दोनों में उनके अभिनय को लेकर प्रतिस्पर्धा हो रही है। लेकिन एक में भी गांधी जी वाला गुण नहीं है। केवल गांधी जी के अभिनय करने से कोई लाभ नहीं है। उनके गुणों को आत्मसात करना ही सच्चा अभिनय है। अगर उनके विचार तुम्हारे भीतर नहीं आये तो क्या फायदा ऐसे अभिनय का। वैसे देखा जाए तो तुम दोनों में से कोई भी उनका अभिनय करने योग्य नहीं है।’ मैम ने कहा। मैम की बातों को सुनकर दोनों ने एक स्वर में सॉरी मैम कहा।
इसके बाद राकेश रोहन से कहने लगा भाई तुम कर लो अभिनय। मैं अगली बार कर लूंगा। यही बात रोहन भी राकेश से बोल रहा था।
ये सुनकर प्रियांशी मैम को अच्छा लग रहा था। उनकी बातों का असर दोनों पर साफ दिखाई दे रहा था। मैम ने कहा, ‘तुम दोनों ही गांधी जी का अभिनय करोगे।’ ‘वो कैसे।’। ‘एक प्रभाती फेरी के समय और एक नाटिका के समय। इस बार दो गाँधी जी बनेंगे।’ मैम ने कहा। मैम की बातों को सुनकर दोनों के चेहरों पर मुस्कुराहट दौड़ गई। इस निर्णय से दोनों बहुत खुश थे। जीवन में दोनों ने गांधी जी की शिक्षा और उनके दिखाए गए मार्ग पर चलने का संकल्प भी ले लिया था।


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