आयुष्मान कार्ड बनाने के बहाने 90 हजार की ठगी !    चुनाव के दृष्टिगत कानून व्यवस्था की स्थिति पर की गई चर्चा !    पंप कारिंदों के मोबाइल चुराए, किशोर काबू !    कपूरथला के गांव में 50 ग्रामीण डेंगू की चपेट में !    उमस से अभी राहत नहीं, 5 दिन में लौटने लगेगा मानसून !    गोदावरी नदी में नौका डूबने से 12 लोगों की मौत !    शताब्दी, राजधानी ट्रेनों में दिखेंगे गुरु नानक के संदेश !    ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब से तेल की आपूर्ति हुई आधी !    सरकार मैसेज का स्रोत जानने की मांग पर अडिग !    अर्थशास्त्र का अच्छा जानकार ही उबार सकता है अर्थव्यवस्था : स्वामी !    

अस्तित्व की सहज स्वीकृति

Posted On September - 9 - 2019

ब्लॉग चर्चा

हिमांशु कुमार पांडे
बहुत वर्षों पहले से एक बूढ़े पुरुष और स्त्री की आकृति के उन खिलौनों को देख रहा हूं, जिनके सिर और धड़ आपस में स्प्रिंग से जुड़े हैं। जब भी उन खिलौनों को देखता हूं, वे अपना सिर हिलाते मालूम पड़ते हैं। अपने बचपन में भी कई बार अपने दादा-दादी को देख न पाने की टीस इन्हीं खिलौनों से मिटा लिया करता था। बहुत-सी बातें जो अम्मा-बाबूजी से व्यक्त नहीं कर पाता था, इन्हीं खिलौनों वाले दादा-दादी से कहता और उनका प्रबोध ले लिया करता था। इन खिलौनों वाले दादा-दादी का बड़ा ऋण है मेरे इस व्यक्तित्व पर। इन खिलौनों का सिर सदैव सहमति के लिए हिलता है। यद्यपि केवल एक अंगुली के विपरीत धक्के से इनके सिर के कम्पन की दिशा बदली जा सकती है, पर न जाने क्यों मानव-मन की अस्तित्वगत विशेषता के तकाजे से हर बार अंगुलियां इनके सिर सहमति के लिए ही कम्पित करती हैं। मैं सोचता हूं कितना अच्छा होता—हर एक सिर इसी तरह सहमति में हिलता, प्रकृति और जगत के रहस्य को निस्पृह भाव से देखता, विधाता की प्रत्येक लीला को सहज स्वीकारता। जो घट रहा है इस संसार में, वह दुर्निवार है तो यह खिलौनों का जोड़ा उसे सहज स्वीकृति देता है—जानता है कि अगम्य है प्रकृति का यह लीला-विधान। जो रचा जा रहा है यहां, कल्याणकारी है, तो सहज ही सिर हिल उठते हैं आत्मतोष में इन खिलौनों के।
यह खिलौने जानते हैं कि संसार अबूझ है—जिह्वा की भाषा से व्यक्त न हो सकने वाला। तो जिह्वा की असमर्थता, भाषा की अवयक्तता उनकी इसी मौन सिर हिलाने की अभिव्यक्ति में प्रकट होती है। शायद इन खिलौनों का सहमति में सिर हिलाना विशिष्टतः बोलना है। भाषा और शब्द का संसार इतना सीमित नहीं कि वह जिह्वा और अन्य वाक‍् अंगों का आश्रय ले। ‘पाब्लो नेरुदा’ की एक कविता ‘द वर्ड’ स्पष्टतया व्यक्त करती है कि शब्द और भाषा का संसार कितना व्यापक हो सकता है, जिसका मतलब कुछ यूं है—मनुष्य के लिए चुप्पी मौत है, केश तक में भाषा का विस्तार है। मुख बिना होंठ हिले बोलता है, हठात आंखें शब्द बन जाती हैं…। शायद यही कारण है कि इन खिलौनों का स्वरूप मुझे अपनी अनुभूतियों की राह से गुजरने के बाद शाश्वत मनुष्य का स्वरूप लगता था, इनका मौन गहरी मुखर अभिव्यक्ति बन जाता था और इनका सत्वर सिर हिलाना मानवता और अस्तित्व की सहज स्वीकृति लगने लगता था। यह सच है कि इनके केश नहीं थे, आंखें भी नहीं थीं, होंठ भी नहीं थे सचमुच के (और इसीलिये यह ‘नेरुदा’ के मनुष्य नहीं थे) पर हो सकता है कि ‘मनुष्य’ को खोजते हुए मेरे इस अतृप्त मानस ने इन्हीं में अपने सच्चे मनुष्य का स्वरूप देख लिया हो।

साभार : ब्लॉग डॉट रमयांतर डॉट कॉम


Comments Off on अस्तित्व की सहज स्वीकृति
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.