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हिंदी फीचर फिल्म : फकीरा

Posted On August - 3 - 2019

शारा

फकीरा 1976 में रिलीज़ हुई थी। सी.पी. दीक्षित द्वारा निर्देशित और एन.एन. सिप्पी द्वारा प्रोड्यूस की गयी फकीरा पूरी तरह मसाला फिल्म थी। ड्रामा, एक्शन, सस्पेंस और गीतों से भरपूर। बॉक्स ऑफिस पर हिट रहने के कारण इसे बाद में (1978) तेलुगू में भी फिल्माया गया, जिसमें कृष्णा और जयाप्रदा थीं। यह वह दशक था, जिसमें अमिताभ बच्चन का फिल्मी गलियारों में खूब सिक्का चलता था। उनकी इस साल ताज़ा-ताज़ा रिलीज़ फिल्म ‘कभी-कभी’ ने बॉक्स ऑफिस पर खूब धूम मचायी थी। बेशक इस फिल्म में भी अमिताभ के साथ शशि कपूर ने भी अभिनय किया था, लेकिन अमिताभ के मुकाबले एक स्वतंत्र हीरो के रूप में फिल्म को हिट कराना टेढ़ी खीर थी। फिर इसी साल रिलीज़ ऋषि कपूर की ‘लैला मजनूं’, परीक्षित साहनी की ‘तपस्या’, धर्मेंद्र की ‘चरस’ और मनोज कुमार की ‘दस नंबरी’ ने बॉक्स ऑफिस पर खूब भीड़ जमा की थी। इन सभी फैक्टर्स के बावजूद अगर यह फिल्म हिट रही तो इसके पीछे कई कारण हैं। उनमें से एक वजह शशि कपूर का मिडल क्लास का चेहरा-मोहरा था। शशि कपूर एक ऐसा कलाकार था, जिसे किसी भी भूमिका से परहेज़ नहीं था। छोटे से रोल में वह अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते थे क्योंकि मूल रूप से वह थियेटर के व्यक्ति थे। अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के नाम पर पृथ्वी थियेटर की स्थापना, उनके थियेटर के प्रति लगाव को दर्शाती है। दरअसल, पिता की विरासत को आगे बढ़ाने का जि़म्मा उन्होंने ही उठाया। अब इस दायित्व को उनकी बेटी संजना कपूर बखूबी निभा रही हैं। विरासत को सहेज कर रखना टेढ़ी खीर है। आर.के. स्टूडियो बिक गया। हालांकि, इसकी स्थापना करने वाले मालिक के बेटों की बॉलीवुड में खूब तूती बोलती है। व्यस्तताओं के बावजूद संजना कपूर पूरी तरह थियेटर से जुड़ी हैं। बेटी के अलावा शशि कपूर के दो बेटे हैं— कुणाल व कर्ण कपूर। कर्ण कपूर तो विदेश में मॉडलिंग का जाना-पहचाना चेहरा है। कुणाल को फिल्मी लाइन में इंट्रोड्यूस करने के लिए शशि कपूर ने रेखा के साथ ‘विजेता’ नामक फिल्म भी बनायी थी। लेकिन उनके नैन-नक्श अंग्रेजों से ज्यादा मिलते हैं, इसीलिए वह यहां चल नहीं पाये। जाहिर-सी बात है कि उनकी मां जेनिफर कपूर विदेशी थीं, जो केंडल परिवार की बेटी थीं। इस परिवार का थियेटर में अच्छा-खासा नाम है। केंडल परिवार जब भारत में अपना थियेटर ग्रुप लेकर आया था, तभी शशि कपूर से उन्हें प्यार हो गया। शशि कपूर ने जुनून, उत्सव, 36 चौरंगी लेन जैसी फिल्में प्रोड्यूस व निर्देशित की थीं, जो कला का शाहकार कही जा सकती हैं। ऐसी फिल्में बनाना उनके ही बूते की बात थीं। लेकिन उत्सव जैसी कला-फिल्म फ्लॉप होने के कारण शशि कपूर काफी घाटे में चले गये थे। लिहाज़ा उन्हें पैसा कमाने के लिए मसाला फिल्मों में भी काम करना पड़ा। ‘फकीरा’ उनमें से एक थी। इससे पहले फिल्म ‘चोर मचाये शोर’ की सफलता को देखते हुए एन.एन. सिप्पी ने उन पर दोबारा विश्वास करके ‘फकीरा’ में अनुबंधित किया था। शशि कपूर को उनके चेहरे की मासूमियत के लिए याद किया जाता है। याद कीजिए ‘जब जब फूल खिले’ फिल्म का वह शिकारे वाला हातो, जिसे नन्दा से प्यार हो जाता है। या फिर ‘वक्त’ फिल्म में बलराज साहनी (लाला) का छोटा बेटा बबलू। अभिनय में विविधता के कारण उन्हें ढेरों पुरस्कार मिले हैं। दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड के अलावा उन्हें सरकार ने पद्म भूषण से भी नवाजा था। इसके अतिरिक्त अन्य पुरस्कार भी उनकी झोली में गये, जिनमें फिल्म फेयर भी शामिल है। वह हरफन मौला कलाकार थे। उन्होंने फिल्में प्रोड्यूस भी कीं और निर्देशित भी। अभिनय भी किया और पटकथा भी लिखी। उन्होंने कई अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया, जिनमें सिद्धार्थ भी एक है। बात यहां शशि कपूर की इसलिए हो रही है क्योंकि यह फिल्म पूरी तरह शशि कपूर की है, वह भी मसाला फिल्म। इस फिल्म में डैनी, शशि कपूर का खोया हुआ भाई बना है। जब डैनी फिल्म साइन करने लगे तो उनके मन में आशंका थी कि नेपाली नैन-नक्श होने के कारण वह शशि कपूर के भाई नहीं लगेंगे। इसलिए हो सकता है कि दर्शक उन्हें भाई के रूप में रिजेक्ट कर दें लेकिन निर्देशक के भरोसा दिलाने पर उन्होंने फिल्म साइन की। निर्देशक का भरोसा तब रंग लाया जब डेनी अपने बिछुड़े भाई शशि से क्लाइमेक्स में मिलता है तो दर्शक सिनेमाहॉल में ही तालियां पीटने लगते हैं। रही-सही कसर गीतों ने पूरी कर दी। सारे के सारे गाने सुपरहिट। रवीन्द्र के संगीत के आगे गीतकार भी बौने पड़ गए। इसमें शबाना शशि की हीरोइन थीं।
कुल मिलाकर ‘फकीरा’ में एक सफल फिल्म के सभी मसाले हैं। इसीलिए तो सर्वोत्तम कला निर्देशन के लिए एस.एस. समेल को फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। फली मिस्त्री को सर्वोत्तम सिनेमैटोग्राफर अवॉर्ड मिला। जबकि ‘सुनके तेरी पुकार’ गीत के लिए महेंद्र कपूर को मेल सिंगर तथा हेमलता का फीमेल सिंगर के तौर पर नामांकन हुआ। सभी गाने खूब सुरीले थे। फिल्म बॉलीवुड की कहानी ‘खोया-पाया’ पर आधारित है। दो भाइयों विजय व अजय के बचपन में ही आग में माता-पिता दम तोड़ देते हैं। होता यूं है कि उनका जर्जर मकान आग पकड़ लेता है, जिसमें अजय और विजय का बाप जलकर मर जाता है। बीमार पड़ी असहाय मां अपने पति को बचा नहीं पातीं और खुद भी मर जाती है। उसके बाद दुनिया दोनों भाइयों को जीने नहीं देती और दोनों बिछुड़ जाते हैं। विजय (शशि कपूर) बहुत बड़ा दादा बन जाता है। वह अपने पार्टनरों पोपट और नीलम की मदद से अमीरों को लूटता है और गरीबों की मदद करता है। इसीलिए लोग उसे ‘फकीरा’ कहते हैं। एक दिन जिस गीता नामक लड़की की वह मदद करता है, उसे अपने अड्डे पर ले जाता है। गीता (शबाना) से उसे प्यार हो जाता है और वे दोनों चुपके से शादी कर लेते हैं, बिना जाने कि गीता पुलिस कमिश्नर की बेटी है और फकीरा को जाल में फंसाकर गिरफ्तार करने आयी है। उधर, अपराध जगत का डॉन चिमनभाई फकीरा को मारने के लिए तूफान नामक गुंडे की ड्यूटी लगाता है, लेकिन वह भी फकीरा का दोस्त बन जाता है। बाद में पता चलता है कि तूफान तो उसका खोया हुआ भाई अजय है।

निर्माण टीम
प्रोड्यूसर : एन.एन. सिप्पी
निर्देशक : सी.पी. दीक्षित
कहानी एवं पटकथा लेखक : एस.एम. अब्बास, आर.के. बनर्जी, ध्रुव चटर्जी
सिनेमैटोग्राफी : फली मिस्त्री
संगीत : रवीन्द्र जैन
सितारे : शशि कपूर, शबाना आज़मी, असरानी, डैनी डेन्जोंगपा, अरुणा ईरानी, इफ्तिखार आदि।

गीत
दिल में तुझे बिठा के : लता मंगेशकर
चल चला चल फकीरा : महेंद्र कपूर
तोता, मैना की कहानी तो पुरानी : लता मंगेशकर, किशोर कुमार
सुन के तेरी पुकार : हेमलता
आधी सच्ची आधी झूठी तेरी प्रेम कहानी : लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी
हम तो झुक झुक के : महेंद्र कपूर, किशोर कुमार, अजीज, भूषण मेहता
ये मेरा जादू जो होके काबू : आशा भोसले


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